Akshay Tritiya-प्रत्येक शुभ-कर्म का अक्षय फल देती है 'अक्षय तृतीया'
अक्षय तृतीया का पावन पर्व
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 03:50 AM
विनय संकोचीAkshay Tritiya -वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। भारतीय पर्वों में विशेष स्थान व महत्व रखने वाली अक्षय तृतीया को किए जाने वाले प्रत्येक शुभ कार्य का अक्षय फल मिलता है। इस तिथि विशेष की स्वयं सिद्ध मुहूर्त के रूप में मान्यता है। अक्षय तृतीया के दिन बिना पंचांग देखे, बिना मुहूर्त निकलवाए विवाह और गृह प्रवेश जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान भी किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं इस दिन मात्र प्रभु का नाम लेकर भवन भूखंड, वाहन और वस्त्राभूषण आदि की खरीददारी बिना किसी संशय के नि:संकोच की जा सकती है। नए प्रतिष्ठान नई संस्था का शुभारंभ करने के लिए भी यह सर्वोत्तम अबूझ मुहूर्त है।
पौराणिक मान्यता है कि इस पवित्र दिवस यदि मनुष्य अपने अपराधों के लिए प्रभु से सच्चे हृदय से क्षमा याचना करता है, तो भगवान प्रसन्न होकर उसे क्षमा कर देते हैं और प्रसाद स्वरूप उसे सद्गुण प्रदान करते हैं। इसी मान्यता के चलते धर्मभीरू लोग अपने दुर्गुणों को भगवान के श्रीचरणों में अर्पित कर उनसे सद्गुणों का वरदान मांगते हैं। इसी बहाने लोग अपने पापों, अपराधों, दुर्गुणों को याद कर लेते हैं और सुधरने का संकल्प लेते हैं। लेकिन ऐसा करने वालों में से सुधरते कितने हैं यह शोध का विषय है।
इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है। भविष्य पुराण के अनुसार सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ अक्षय तृतीया से ही हुआ था। भगवान श्रीहरि विष्णु के नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी स्वरूप का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। जगतपिता ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव ही इस दिन हुआ। भगवान बद्री नारायण के कपाट भी इसी तिथि को खुलते हैं वृंदावन स्थित श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के चरण दर्शन वर्ष में एक बार अक्षय तृतीया को ही होते हैं। कहा जाता है कि इस दिन महाभारत का युद्ध भी समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।
एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा भगीरथ के प्रयासों से मां गंगा का इस दिन धरती पर अवतरण हुआ था। इसके अतिरिक्त अक्षय तृतीया को ही माता अन्नपूर्णा का भी जन्मदिन मनाया जाता है। अक्षय तृतीया को ही युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी जिसकी विशेषता यह थी कि पात्र का भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। इसी पात्र के बल पर धर्मराज युधिष्ठिर अपने राज्य के गरीब व भूखे लोगों को भोजन उपलब्ध कराया करते थे।
मान्यता है कि अक्षय तृतीया (Akshay Tritiya) के ही दिन सुदामा अपने प्रिय सखा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे थे। गरीब सुदामा श्रीकृष्ण को भेंट करने के लिए एक मुट्ठी कच्चे चावल ही उपहार स्वरूप लाए थे। श्रीकृष्ण ने आग्रह पूर्वक सुदामा की भेंट स्वीकार कर, चावल के दानों को बड़े चाव से खाया और अपने मित्र के झोपड़े को भव्य महल में बदल दिया।
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया को माता रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने 'राम' के रूप में जन्म लिया, जो कालांतर में परशु धारण करने के कारण 'परशुराम' के नाम से विख्यात हुए। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन भगवान परशुराम जी की पूजा कर उन्हें अर्घ्य दिए जाने का बड़ा महत्व है।
जैन मतावलंबियों के लिए भी अक्षय तृतीया का बहुत अधिक महत्व है। कहा जाता है कि इसी दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्रीऋषभदेव भगवान ने चार सौ दिवस की तपस्या पूर्ण करने के पश्चात इक्षु रस (गन्ने के रस) से पारायण किया था। जैन धर्मावलंबियों की मान्यता है कि गन्ने को इक्षु भी कहते हैं, इस कारण से इस तिथि की इक्षु तृतीया व अक्षय तृतीया के रूप में प्रतिष्ठा है।
अक्षय तृतीया (Akshay Tritiya) के शुभ दिन राजस्थान में वर्षा का शगुन निकालने की परंपरा है। शगुन निकालने के साथ वर्षा की कामना भी की जाती है। लड़कियां समूह में घर-घर जाकर शगुन गीत गाती हैं। मालवा में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम्र पल्लव रखकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन कृषि कार्य का शुभारंभ किसानों को समृद्धि देता है। बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया से शुरू होकर पूर्णिमा तक उत्सव का माहौल रहता है।
अक्षय तृतीया को लेकर एक चर्चित व्रत कथा के अनुसार प्राचीन काल में धर्मदास नाम का एक सदाचारी देव और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धावान एक वैश्य था। इस पर्व पर गंगा स्नान के उपरांत धर्मदास ने पूजा अर्चना की और रोग ग्रस्त होने के बावजूद उसने उपवास कर दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहा जाता है कि त्रिदेव ब्राह्मण के वेश धारण कर अक्षय तृतीया के दिन प्रतापी राजा के यज्ञ में शामिल होते थे। मान्यता यह भी है कि कुशावती का यही राजा आगे चलकर चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।