अन्न्कूट, गोवर्धन पूजा, कान्हा का सच्चा समाजवाद पर्यावरण प्रेम
डॉ शोभा भारद्वाज एवं अंजना भागी
गीता के रचीयता कान्हा, का जन्म जरूर राजा माता पिता से हुआ पर लालन पालन ग्वालों के साथ हुआ यूं धरती से जुड़े होने के कारण ही वे हर परिस्थिति को संभालना बहुत ही अच्छी तरह से सीख गए थे। हम सभी जानते हैं की माखन उनका प्रिय भोजन था । वह भी गोपियों के घर में घुस कर मटकी को तोड़कर निकाल कर खाना। उसके पीछे भी ये उद्देश्य था कि मखहन दूध को जमाकर मथ कर तब कहीं प्राप्त होता है। फिर उसे भी मटकी को तोड़ कर निकाल कर खाना । यानि की यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में शांति तथा धैर्य से जुटा रहे तो माखन जैसे स्वादिष्ट फल की प्राप्ति होती है वृन्दावन में सदा इन्द्र कि पूजा होती थी । हालांकि कान्हा कभी भी किसी से द्वेष नहीं रखते थे सभी का सम्मान तथा प्यार से मिलते थे । फिर भी गोधूली वेला में कान्हा गाय चरा कर लौट रहे थे सम्पन्न घरों में तरह –तरह के पकवानों की सुगन्ध फैली हुयी थी उन्हें याद आया इंद्र देवता को प्रसन्न करने का आयोजन हो रहा है जिससे उनकी कृपा दृष्टि बृज भूमि पर बनी रहे। सिचाई के लिए समय पर वर्षा हो जिससे भरपूर फसल से खेत खलियान भर जाये | कृषि प्रधान देश है कृषि के लिए वर्षा पर ही निर्भर हैं । रिमझिम बरसता पानी पूरे वर्ष के लिए कुएं तालाब झीले भर देता है जिससे ग्रीष्म ऋतू में भी जल की समस्या नही आती | यदि इंद्र देवता की कृपा नहीं हुई सूखा पड़ गया खेतों में खड़ी फसल सूख जाती है इन्सान जानवर और परिंदे प्यास से तड़फने लगते हैं धरती की ऊपरी परतें सूख जाती हैं | कई बार इन्सान को ज़िंदा रहने के लिए अपना घर बार स्थान छोड़ कर परदेशी होना पड़ता है| इसी लिए बृज चौरासी कोस में इंद्र का पूजन विधि विधान से करते हैं|
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कन्हैया ने कहा मैंने जब से होश सम्भाला है आयोजन देख रहा हूँ लेकिन यदि बृज में गोवर्धन पर्वत श्रंखलायें नहीं होती तो यह स्थान भी मरूस्थल ही होता । गर्मी से सागर में भाफ के बादल बनते हैं हवायें उन्हें उड़ा कर दूर ले जाती हैं गोवर्धन पर्वत के हरे भरे सघन वन और ऊँचे वृक्षों पर एक नमी रहती हैं जिससे उड़ते घनघोर बादल आकर्षित होते हैं जिससे मुसलाधार बारिश होती है जहाँ पर्वत और वन नहीं है वहाँ बारिश कम होती है मूसलाधार बारिश से गिरिराज की कन्दराओं में पानी भर जाता है बड़ी मात्रा में जल सूखी धरती पी जाती है धरती की प्यास बुझने के बाद नीचे संचित हो जाता है संचित जल से कुएं तालाब झीलें भर जाती है।
यमुना जी उफन कर बहने लगती हैं उनके पाट चौड़े हो जाते हैं । पर्वत से अनेक झरने झरते हैं जिनसे आते जाते राहगीर प्यास बुझाते हैं । यदि वन कम हो जायेंगे या काट दिए जायेंगे बादल कैसे आकर्षित होंगे जिससे ,वर्षा भी कम होती जायेगी ।
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वनों की गोद में जीवन दायनी औषधियां और पेड़ पोधे फलते फूलते हैं यहाँ लकड़ी ही नहीं मिलती रसीले फल और तरह-तरह की जड़ी बूटियाँ भी मिलती हैं जिनसे रोग निवारक औषधियाँ बनती हैं | जल से भरी यमुना बहती हुई जल को दूर-दूर तक ले जाती है | जल से ही जीवन है इसीलिए नदियों के किनारे सभ्यतायें बनती बिगडती हैं | यदि बाढ़ें आती हैं खेती का नुक्सान होता है लेकिन अपने साथ उपजाऊ मिटटी भी ले जाती हैं जिससे अगली फसल शानदार होती हैं | विशाल वृक्षों में अनेक पंछियों का बसेरा होता है |
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वनों मे अनेक जीव जन्तु पलते हैं | कीट जगत , जानवरों एवं पक्षियों की प्रजातियाँ बढ़ती हैं | गिरिराज जी प्रकृति की अचल सम्पदा से भरपूर हैं सुंदर दृश्य मन को मोह लेते हैं। पर्वतों में विचरण करते हैं सुगन्धित स्वास्थ्य वर्धक वायू तन और मन को पुलकित करती है सुबह का सूरज उगता है चारों और प्रकाश फैलता है पक्षी चहचहाने लगते हैं ,कोयल की मीठी कुहुक मन मोह लेती है क्यों न हम ऐसा उत्सव मनाये जिसे बृज भूमि में सदैव याद किया जाये। कन्हैया की ज्ञान भरी बातों से सभी प्रभावित हुये अबकी बार क्यों न गिरिराज जी का मिल कर पूजन किया जाये और सामहिक भोज का आयोजन किया जाए जिसमें हर व्यक्ति बिना किसी भेद भाव के भाग ले सके जिसके घर में जो है वह भोज में समर्पित करे। गोकुल के लोगों का मुख्य व्यवसाय गो पालन , गो चराना और खेती करना था | बृज की गोपिया रोज मथुरा में दूध दही मक्खन बेचने जाती थी। अभी बृज पूरी तरह आत्म निर्भर नही था। गोवर्धन पर्वत पर सामूहिक भोज का आयोजन किया गया जिसमें हर व्यक्ति ,घर ने भाग लिया जिसके घर में जो था जिसकी जो सामर्थ्य थी पका कर लाया घी दूध , छाछ दहीं की कमी नहीं थी अत: खीर कढ़ी तरह-तरह के रायते मीठा दहीं माखन मिश्री चावल अनेक प्रकार की सब्जियां ,दूध से बनी घरेलू मिठाईयाँ बाजरे की अभी कटी थी उसकी स्वादिष्ट खिचड़ी। जिसके घर के बाग़ में गाजर मूली लगी थी वह वही तोड़ लाया । वृन्दावन का कोई घर ऐसा नहीं था जहाँ से कन्हैया ने दही ,माखन चुरा कर स्वयं खाया और ग्वाल बालों को न खिलाया हो। हर घर में उनके पवित्र चरण पड़ें थे हर छींके पर बाल गोपालों के कंधों पर सवार हो कर माखन का भोग न लगाया था | कवि रसखान कहते हैं
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।
अन्न्कूट, गोवर्धन पूजा, कान्हा का सच्चा समाजवाद पर्यावरण प्रेम
भोज में हर वस्तु थी हर घर व्यक्ति की साझे दारी थी। एक चौड़े स्थान को साफ़ किया गया पूरा गोकुल धाम बिराजा सबके आगे पत्तल दोने मिटटी के जरूरत के बर्तन लगा दिए । गये । सबसे पहले अग्र पूजा किसकी हो? गिरिराज जी का आह्वाहन किया गया बीच में कान्हा बिराजे उनका पूजन किया गया | मंद – मंद सुगन्धित पवन बह रही । झरनों की कल – कल संगीत का समा बना रही थी |सबके आग्रह पर उन्होंने मुरली की मधुर तान छेड़ दी सम्पूर्ण वातावरण विभोर हो गया | मुरली की ध्वनि ऐसी अलौकिक थी मानों समय ठहर गया | अब भोज की बारी थी जो भी उपस्थित था सबकी पत्तल में सब कुछ परोसा गया सबने प्रेम से चटकारे ले कर भोजन किया कुछ भी जूठा नहीं छोड़ा | यह गिरिराज जी का भोग था | यह था सच्चा समाजवाद कान्हा का समाजवाद | यह आज के यदु वंशियों का समाजवाद या राजशाही नहीं थी | कोई न बड़ा था न छोटा सभी समान थे | विशुद्ध पर्यावरण प्रेम |