
Bhadra Kaun hai : जब भी हिन्दुओं के महत्वपूर्ण त्योहार आते हैं, जैसे रक्षा बंधन और होली तो अक्सर एक बात सुनने को मिलती है कि इस बार भद्रा का साया है, इसलिए त्योहार को बहुत ही सोच समझ कर मनाया जाए। अक्सर भद्रा जी (Bhadra 2023) रक्षा बंधन के पर्व पर पृथ्वी पर आकर मंडराने लगती है। इनके पृथ्वी पर आने से भाई बहन के पवित्र त्योहार रक्षा बंधन (Raksha Bandhan 2023) की अवधि या तो कम हो जाती है या फिर त्योहार को आगे पीछे करके मनाना पड़ता है। आज हम इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि भद्रा कौन है, यह कहां रहती है और यह कब आती है ?
आपको बता दें कि 30 अगस्त 2023 को पूर्णिमा तिथि सुबह 10 बजकर 58 मिनट से शुरू होगी और 31 अगस्त की सुबह 07 बजकर 05 मिनट तक रहेगी। सब जानते हैं कि सावन मास की समाप्ति पर आने वाले पूर्णिमा पर रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है, लेकिन इस साल भी कहा जा रहा है कि रक्षा बंधन पर्व पर भद्रा का साया रहेगा या यूं कहें कि भ्रदा काल रहेगा और इस काल में राखी बांधने जैसे शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भद्रा का निवास पाताललोक में माना जाता है, लेकिन होलिका दहन और रक्षा बंधन पर्व के वक्त भद्रा पृथ्वी लोक में भ्रमण करने के लिए आ जाती है और कुछ समय के लिए पृथ्वी लोक पर निवास करके पुन: विचरण करती हुई पाताल लोक को चली जाती है। भद्रा भगवान सूर्य और छाया की पुत्री और शनिदेव की बहन है। अपने भाई शनिदेव की तरह ही भद्रा का स्वभाव भी बहुत कठोर माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार दैत्यों को मारने के लिए भद्रा गर्दभ (गधा) के मुख और लंबे पूंछ और 3 पैरयुक्त उत्पन्न हुई। भद्रा काले वर्ण, लंबे बाल, बड़े बड़े दांत तथा भयंकर रूप वाली एक कन्या है। इसका स्वभाव भी शनि की तरह ही कड़क बताया गया है। जन्म लेते ही भद्रा यज्ञों में विघ्न-बाधा पहुंचाने लगी और शुभ कार्यों में विघ्न डालने लगी तथा सारे जगत को पीड़ा पहुंचाने लगी।
भद्रा दुष्ट स्वभाव को देखकर सूर्यदेव को उसके विवाह की चिंता होने लगी और वे सोचने लगे कि इस दुष्ट कुरूपा कन्या का विवाह कैसे होगा ? सभी ने सूर्यदेव के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब सूर्यदेव ने ब्रह्माजी से उचित परामर्श मांगा। ब्रह्माजी ने तब विष्टि से कहा कि- 'भद्रे ! बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो तथा जो व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य करे, तो तुम उन्हीं में विघ्न डालो। जो तुम्हारा आदर न करे, उनका कार्य तुम बिगाड़ देना।' इस प्रकार उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने लोक चले गए। तब से भद्रा अपने समय में ही देव-दानव-मानव समस्त प्राणियों को कष्ट देती हुई घूमने लगी। इस प्रकार भद्रा की उत्पत्ति हुई।
भद्रा स्वभाव से बहुत ही कठोर और उद्दंडी थीं तो उनकी हरकतों से तंग आकर ब्रह्माजी ने उन्हें शाप दिया था कि जो भी भद्रा काल में कोई शुभ कार्य करेगा, उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और उसे अशुभ परिणाम प्राप्त होंगे। यही कारण है कि भद्रा होने पर रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता है।
ज्योतिष के अनुसार, जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है तब भद्रा का वास पृथ्वी पर होता है। चंद्रमा जब मेष, वृषभ, मिथुन या वृश्चिक में रहता है तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में होता है। जब चन्द्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में स्थित होता है तो भद्रा का वास पाताल लोक में होता है।
भद्रा जिस लोक में रहती हैं वहीं प्रभावी होती हैं। इसलिए रक्षांबधन के वक्त चंद्रमा के कुंभ राशि में होने की वजह से भद्रा रहेगी। इसलिए भद्रा के खत्म हो जाने पर ही राखी बांधना उचित होगा।
रक्षा बंधन के दिन राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त अपराह्न काल और प्रदोष काल का समय होता है। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि इस समय में भद्रा, जिसे विष्टि भी कहते है, न पड़े। ग्रंथों में उल्लेख है कि जब ऐसी स्थिति बने तो अपराह्न (दोपहर बाद) काल और प्रदोष काल के बाद, जब भद्रा काल का अंत हो जाए, तब राखी बांधना शुभ रहता है। इस साल 2023 में, भारत के कई जगहों पर, अपराह्न काल और प्रदोष काल के शुभ अवसर में अशुभ विष्टि का छाया पद रहा है, जिस कारण राखी का मुहूर्त रात के 9 बजे के बाद होगा।
नोएडा, दिल्ली एनसीआर - 30 अगस्त 09:02 PM - 31 अगस्त 07:05 AM मुंबई - 30 अगस्त 09:02 PM - 09:10 PM लखनऊ - 30 अगस्त 09:02 PM - 31 अगस्त 07:05 AM कोलकाता - 30 अगस्त 09:02 PM - 31 अगस्त 07:05 AM (Bhadra Kaun hai)