गोवत्स द्वादशी 2026 कब है? जानें 5 नवंबर को मनाए जाने वाले इस पर्व की तिथि, शुभ मुहूर्त, गाय-बछड़े की पूजा विधि, व्रत के नियम और धार्मिक महत्व।

Govatsa Dwadashi 2026: हिंदू धर्म में गोवत्स द्वादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। यह पर्व गाय और उसके बछड़े के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर महिलाएं परिवार और संतान की सुख-समृद्धि तथा लंबी आयु की कामना के लिए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से गाय और बछड़े की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। साल 2026 में गोवत्स द्वादशी 5 नवंबर, गुरुवार को मनाई जा रही है। महाराष्ट्र में इसे वसु बारस और गुजरात में वाघ बारस के नाम से भी जाना जाता है। कई स्थानों पर इसे बछ बारस और नंदिनी व्रत के रूप में भी मनाया जाता है।
गोवत्स द्वादशी का पर्व इस साल 5 नवंबर 2026, गुरुवार को मनाया जा रहा है। पंचांग के अनुसार, इस दिन द्वादशी तिथि सुबह से प्रारंभ होकर अगले दिन तक रहेगी। इस पर्व पर प्रदोष काल में गाय और बछड़े की पूजा करना विशेष शुभ माना जाता है।
गोवत्स द्वादशी 2026 का पंचांग
गोवत्स द्वादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लें। इस दिन गाय और उसके बछड़े की एक साथ पूजा करने की परंपरा है। शाम के समय प्रदोष काल में पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है।
सबसे पहले गाय और बछड़े को स्वच्छ जल से स्नान कराएं। उनके माथे पर हल्दी, रोली और चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद फूलों की माला पहनाकर धूप और दीप जलाएं। गाय और बछड़े को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
पूजा के दौरान गाय और बछड़े को गुड़, चना, हरा चारा और अन्य पारंपरिक खाद्य सामग्री खिलाएं। इसके बाद दीपक जलाकर आरती करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गाय की सेवा और उसे भोजन कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
पूजा के दौरान गोवत्स द्वादशी की व्रत कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है। इसके बाद संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। यदि किसी स्थान पर गाय और बछड़े की उपलब्धता नहीं है, तो उनकी प्रतिमा या चित्र के माध्यम से भी पूजा की जा सकती है।
हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गाय में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए गोवत्स द्वादशी पर गाय और उसके बछड़े की पूजा करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन महिलाएं संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। गोवत्स द्वादशी को नंदिनी व्रत भी कहा जाता है। नंदिनी को पौराणिक मान्यताओं में कामधेनु की पुत्री और दिव्य गाय के रूप में वर्णित किया गया है।
यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुओं के प्रति दया, सेवा और संवेदनशीलता का संदेश भी देता है। गाय और बछड़े की पूजा के माध्यम से प्रकृति तथा जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
गोवत्स द्वादशी के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु कुछ विशेष नियमों का पालन करते हैं। हालांकि, इन नियमों में क्षेत्र और परिवार की परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है।
इस दिन क्या करें:
इन बातों का रखें ध्यान:
गोवत्स द्वादशी का पर्व हमें सिखाता है कि जीव-जंतुओं के प्रति दया, सम्मान और सेवा का भाव रखना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास के साथ इस दिन गाय और बछड़े की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
विज्ञापन