
रमजान का असली मकसद
रोजे रखने का मकसद अल्लाह में यकीन को और गहरा करना और इबादत का शौक पैदा करना है। साथ ही सभी तरह के गुनाहों और गलत कामों से तौबा की जाती है। इसके अलावा, नेकी का काम करने को प्रेरित करना, लोगों से हमदर्दी रखना और खुद पर काबू रखने का जज्बा पैदा करना भी इसका हिस्सा है। रोजा के दौरान भूखे-प्यासे रहने से दूसरे की भूख और प्यास का पता चलता है।
जकात व फितरा का खास महत्व
सन 2 हिजरी में ही जकात (चैरिटी या दान) को भी जरूरी बताया गया है। इसके तहत, अगर किसी के पास साल भर उसकी जरूरत से अलग साढे 5 तोला सोना या 52 तोला चांदी या उसके बराबर का नगद या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात यानी दान के रूप में गरीब या जरूरतमंद मुस्लिम को दिया जाता है। वहीं, ईद के दिन से ही फितरा (एक तरह का दान है) हर मुस्लिम को अदा करना होता है। इसमें 2 किलो 45 ग्राम गेहूं की कीमत तक की रकम गरीबों में दान की जाती है।
इनको है रोजे से छूट
अगर कोई बीमार हो या बीमारी बढ़ने का डर हो तो रोजे से छूट मिलती है। हालांकि, ऐसा डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए। मुसाफिर को, गर्भवती महिला और बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को भी रोजे से छूट रहती है।
सहरी, इफ्तार और तरावीह
रमजान के दिनों में लोग तड़के उठकर सहरी करते हैं। सहरी खाने का वक्त सुबह सादिक (सूरज निकलने से करीब डेढ़ घंटे पहले का वक्त) होने से पहले का होता है। सहरी खाने के बाद रोजा शुरू हो जाता है। रोजेदार पूरे दिन कुछ भी खा और पी नहीं सकता। शाम को तय वक्त पर इफ्तार कर रोजा खोला जाता है। एहतियात के तौर पर सूरज डूबने के 3-4 मिनट बाद ही रोजा खोलना चाहिए।
फिर रात की ईशा की नमाज (करीब 8 बजे) के बाद तरावीह की विशेष नमाज अदा की जाती है। इस दौरान मस्जिदों में कुरान पढ़ा जाता है। ये सिलसिला पूरे महीने चलता है।
महीने के अंत में 29 का चांद होने पर ईद मनाई जाती है। 29 का चांद नहीं दिखने पर 30 रोजे पूरे कर अगले दिन ईद का जश्न मनाया जाता है।
सैय्यद अबु साद