इस संसार में विरले ही होंगे, जो कामना से रहित हों। कामना का अर्थ 'अपने मन की हो जाना' है। मेरे मन की हो जाए, यही तो कामना है और जहां कामना का आधिपत्य हो वहां भक्ति और भगवान का वास नहीं होता है, क्योंकि कामना करने वाला संसार में मन लगाता है और जिसका मन संसार में लगा हो उससे भगवान दूर हो जाते हैं। शास्त्र कहते हैं कि कामना ही दु:ख का कारण है। इस बात को अधिकांश लोग जानते भी हैं और मानते भी हैं लेकिन इसका त्याग नहीं कर पाते। कामना का त्याग किए बिना कोई सुखी हो ही नहीं सकता है।
सुख प्राप्ति की चाहना से, सुख प्राप्ति की कामना से व्यक्ति अपने मार्ग से भटक जाता है और उस दिशा की ओर अग्रसर हो जाता है जहां सुख पाने की लालसा उसे दु:खों के दलदल में उतर जाने को विवश कर देती है। एक सुख की कामना अनेकानेक दु:खों का कारण बनती है। इस बात को लोग जानते तो है लेकिन मानने को तैयार नहीं होते हैं। इस सत्य को स्वीकार करने में कामना ही तो बाधा बनती है। संत महापुरुषों का कथन है कि कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य अपने कर्तव्य से, अपने स्वरूप से और अपने इष्ट से विमुख हो जाता है और नाशवान संसार के सम्मुख हो जाता है। कामना व्यक्ति को यह सोचने समझने का अवसर नहीं देती की कामना मात्र से कोई भी वस्तु अपनी नहीं हो सकती और अगर हो भी जाती है तो उस सदा सर्वदा साथ नहीं रहती है।
जब-जब व्यक्ति संयोगजन्य सुख की कामना करता है, तब-तब उसका जीवन कष्टमय हो जाता है। लोग इस बात को समझने का प्रयास ही नहीं करते हैं कि इच्छा के अनुसार सब को सब कुछ कभी नहीं मिलता है और जो कुछ मिलना होता है वह बिना इच्छा, बिना कामना के भी प्राप्त हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि कामना व्यर्थ है। कामना भटकाव का पर्याय है और यदि यह सांसारिक वस्तुओं के लिए है तो लोग इस बात को क्यों नहीं समझते कि जैसे बिना चाहे तमाम तरह के सांसारिक सुख मिलते हैं, ऐसे ही बिना चाहे सुख भी मिलते हैं। फिर कामना से, इच्छा से लाभ ही क्या है।
कामना अशांति की जननी है। कोई कामना की, कोई इच्छा की और वह पूरी नहीं हुई तो व्यक्ति बेचैन हो जाता है, उसकी शांति भंग हो जाती है। जो चाहो वह मिल जाए, जैसा सोचा वैसा हो जाए, जब तक यह कामना बनी रहेगी तब तक शांति तो नहीं मिल सकती है। कामना शांति की बैरन जो ठहरी। ऋषियों की वाणी है कि कुछ चाहने से कुछ मिलता है या नहीं मिलता है, परंतु कुछ न चाहने से, कामना रहित रहने से तो सब कुछ मिल जाता है, मिलता है। यह तर्क का नहीं अनुभव का विषय है।
व्यक्ति दूसरों से सहयोग की कामना करता है, व्यक्ति दूसरों से अच्छा कहलाने की इच्छा रखता है लेकिन वह दूसरों की कामना पूर्ति में सहयोग करने की इच्छा नहीं रखता है। वह अच्छा कहलाने की कामना तो पाल लेता है, लेकिन अच्छा बनने की दिशा में कदम बढ़ाने से बचता है। प्रशंसा योग्य न होने के बावजूद प्रशंसा पाने की इच्छा अवसाद का कारण बनती है, जो प्रशंसा योग्य होता है, वह प्रशंसा पाने की कामना से परे रहता है। तो...कामना से कुछ होता नहीं है। उसके लिए सद्प्रयास की आवश्यकता होती है। ऐसे सद्प्रयास की जो कामना रहित हो।
इस अटल सत्य को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि कामना त्याग से जो सुख प्राप्त होता है वह सुख कामना की पूर्ति से भी नहीं मिलता है वैसे भी जिसे हम हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते, अपना नहीं बना सकते उसकी इच्छा करने उसकी कामना करने और उसे पाने से क्या लाभ?