जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत न हो तो वह वैसे ही बेचैन रहता है, जैसे कोई प्यासा पानी के लिए।
ज्ञान अर्जित करने की चाह रखने वाले व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति का मार्ग तलाशते हैं, तरह - तरह के प्रश्न करते हैं। प्रश्न सब लोग नहीं करते हैं, सभी जिज्ञासु नहीं होते हैं। लेकिन प्रश्न करने वालों के माध्यम से ज्ञान उन लोगों तक भी पहुंच जाता है जो ज्ञान के प्रति उदासीन होते हैं। प्रस्तुत हैं कुछ प्रश्न और उनके उत्तर!
वैराग्य क्या है? : सत - असत और नित्य - अनित्य के विवेचन का नाम विवेक है। विवेक के द्वारा सत - असत और नित्य - अनित्य को पृथक कर दिए जाने पर असत और अनित्य से राग हट जाता है, इसे ही शास्त्रों में 'वैराग्य' कहा है। उसका नाम वैराग्य कतई नहीं है कि मन में भोगों की अभिलाषा बनी रहे और ऊपर से संसार से द्वेष और घृणा करने का प्रदर्शन करते रहें। वैराग्य यथार्थ में आभ्यांतरिक अनासक्ति का नाम है। वैराग्य में राग का सर्वथा अभाव है। यदि लेश मात्र भी राग शेष है तो पूर्ण वैराग्य की कल्पना भी बेमानी है। विवेक में त्रुटि होने पर वैराग्य संभव नहीं है। विवेक की पूर्णता होने पर ही वैराग्य संभव है।
पाप कर्म कौन से हैं? : दूसरों का धन हड़पने की इच्छा, देह को ही सब कुछ मानना, कठोर वचन बोलना, झूठ बोलना, निंदा करना, चोरी करना, हिंसा करना, तन - मन - कर्म से किसी को दु:ख पहुंचाना, पर स्त्री या पर पुरुष से संबंध बनाना, मन जिन्हें करने से मना करे, उन कार्यों को करने का प्रयास करना, भ्रष्टाचार आदि पाप माने गए हैं। वैसे तो परमात्मा का विस्मरण भी पाप माना गया है।
...और पुण्य किन्हें माना गया है? : मन वाणी और देह के अनेक पुण्य कर्म कहे गए हैं। मन के तीन शुभ कर्म हैं - एक : दूसरे के धन की अभिलाषा न रखना, दो - सभी के लिए शुभ चिंतन करना और तीन - ईश्वर व शास्त्रों पर विश्वास रखना। वाणी के चार पुण्य कर्म है, यथा - मधुर बोलना, सच बोलना, पर निंदा न करना और सुसंगत बोलना। शरीर के तीन कर्म होते हैं, परोपकार करना, किसी को पीड़ा न देना और धर्म पत्नी से एक निष्ठा रखना/ पति के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखना। इसके अतिरिक्त वेद में भी दस पुण्य कर्म बताए गए हैं - धृति यानी हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना, क्षमा - बदला न लेना, क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध न करना, दम - उद्दंड न होना अस्तेय - दूसरे की वस्तु हथियाने का प्रयास न करना, शौच - शरीर और आहार की शुद्धता का ध्यान रखना, इंद्रिय निग्रह - इंद्रियों को विषयों में लिप्त ना होने देना, धी - किसी भी बात को अच्छी तरह से समझना, विद्या - धर्म अर्थ काम मोक्ष का ज्ञान, सत्य - झूठ ना बोलना और अक्रोध - क्षमा के बाद भी कोई अपमान करे तो भी क्रोध न करना, इन पुण्य कर्मों के प्रताप से मनुष्य सुखी और प्रतापी होता है।
भोगों को सुख कह सकते हैं? : सुख की चाहना तो सभी की है, लेकिन लोग वास्तविक सुख का अर्थ जानते ही नहीं हैं। लोग भोगों को सुख मान बैठे हैं और यही भ्रम उनके जीवन में कष्ट का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। भोगों की कामना सुख की कामना बिल्कुल भी नहीं है। जब भोग की कामना पूर्ण नहीं होती है तो मनुष्य क्रोध करता है। शास्त्रीय सिद्धांत है कि काम, क्रोध के वशीभूत होकर कोई भी मनुष्य सुखी नहीं रह सकता है। जो कामना के वश में होता है, वह अनर्थ और पापों में प्रवृत्त होता है। परिणाम स्वरूप वह रोग, शोक, अपमान, अपयश व अशांति नाना प्रकार के ताप - क्लेश को प्राप्त होता है। इस प्रकार भोग को सुख मानने वाला वास्तविक सुख न पाकर दु:ख ही पाता है। जो लोग भोगों को दु:ख का कारण और क्षणभंगुर समझते हैं, वही वास्तविक सुख का आनंद लेते हैं।
माया क्या है? : माया जड़ है। यह भगवान की शक्ति पाकर काम करती है। सूर्य के बिना किरण का अपना अस्तित्व नहीं है। सूर्य है तो किरण है और सूर्य नहीं है तो किरण नहीं है। परमात्मा है तो माया है और परमात्मा नहीं है तो माया नहीं है। माया का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वेद शास्त्र कहते हैं, संसार माया से बना है और साथ ही वेद शास्त्र यह भी कहते हैं संसार भगवान से बना है। इन दोनों में से एक भी बात मिथ्या नहीं है। संसार भगवान और माया के मिलने से ही बना है। भगवान माया के एक-एक कण में रहते हैं। भगवान माया में व्याप्त हैं और माया में भगवान की शक्ति है।