अनेक लोग सत्संग में जाते हैं और खाली हाथ वापस लौटते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उनकी देह तो सत्संग में उपस्थित रहती है लेकिन उनकी आत्मा, उनका मन संसार में भटकते रहते हैं। जब मन-आत्मा सत्संग में नहीं होते तो भला उन्हें उपदेश और दिव्य संदेश कैसे स्मरण रह सकते हैं। इसी कारण न उनका आचरण बदलता है और न उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन आता है।
लोग सत्संग सुनने जाते हैं लेकिन 'सत्' को महत्व नहीं देते हैं। 'सत्' के साथ संबंध जोड़ने में उनकी कोई रुचि नहीं होती है। 'सत्' नहीं होगा तो केवल 'संग' ही रह जाएगा और जिसके कारण 'संग' हो रहा है - उसके गुण-दुर्गुण व्यक्ति के आचार-विचार में प्रवेश कर जाते हैं। सत्संग का अर्थ ही है 'सत्' का संग और यदि 'सत्' को ही नकार दिया तो कैसा सत्संग?
सत्संग के लिए असत् का त्याग आवश्यक है। असत् को त्यागे बिना सत्संग हो ही नहीं सकता है। सत्संग के लिए सत्-सत्य को अपनाना ही होगा। यह सत्संग की बाध्यता है, अनिवार्यता है। सत्संग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके माध्यम से बिना कुछ किए मानसिक- आध्यात्मिक विकास होता है, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्संग का एक लाभ यह भी है कि व्यक्ति परमात्मा के निकट रहता है, उसका प्रभु में प्रेम निरंतर बढ़ता रहता है। इसका अर्थ यह भी है कि जो व्यक्ति भगवान से प्रेम करता है, तो उसका नाशवान संसार के प्रति प्रेम कम होता चला जाता है, उसका मोह नष्ट होने से वह तरह-तरह के मोह-जनित कष्टों से मुक्त हो जाता है। एक बात और समझने की है कि सत्संग उसे ही प्राप्त होता है जिस पर भगवान की कृपा होती है। कोई यह समझता है कि पुरुषार्थ से सत्संग रूपी महान उपलब्धि को प्राप्त किया जा सकता है, तो यह धारणा निराधार है।
सत्संग के प्रभाव का सीधा संबंध संस्कार से है। जिस व्यक्ति के संस्कार कुसंग के होंगे तो उस पर सत्संग का प्रभाव कम होगा या नहीं पड़ेगा है, लेकिन जो भगवान प्रेमी है और सत्संगी संस्कारों से सज्जित है, उन पर सत्संग का पूरा प्रभाव पड़ेगा। जो व्यक्ति अहंकारी होता है, उस पर भी सत्संग का प्रभाव नहीं पड़ता है। जो मनुष्य कुतर्की होता है, दूसरे की बात को सुनना-सहना जिसे नहीं आता है उस पर भी सत्संग का असर नहीं होता है। एक वह व्यक्ति सत्संग का लाभ नहीं ले सकता, जो सत्संग करने वाले संत महापुरुष विद्वान में दोष तलाशता है। ऐसे तमाम लोग सत्संग में केवल भीड़ के रुप में ही सम्मिलित होते हैं। ऐस लोग सत्संग में बैठकर भी कुसंग को बढ़ावा देने का काम करते हैं।
सत्संग सदाचार का पोषक है। सदाचार की प्रेरणा भूमि सत्संग ही है, ऐसा शास्त्रों का कथन है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है -
मति कीरति गति भूति भलाई, जब जेहिं जतन जहां जेहि पाई। सो जानब सत्संग प्रभाऊ लोकहू वेद ना आप उपाऊ।।
अच्छे गुण, वस्तु या सदाचार को प्राप्त करने का भी एक मात्र साधन, एकमात्र उपाय सत्संग ही है। सर्वविदित है - 'बिनु सत्संग विवेक न होई'। सत्संग से विवेक जागृत होता है, परिष्कृत होता है और विवेक से सदाचार पुष्ट होता है। सदाचार का महत्व विवेक है और विवेक सत्संग से आता है।
सत्संग दो प्रकार का कहा गया है। एक साधु-संतों और सज्जनों का सतत सान्निध्य और दो सत्-साहित्य का अध्ययन, मनन एवं श्रवण। संतों की समीपता का महत्व सूरदास जी ने भी बताया है - 'जिस दिन संत अतिथि के रूप में पधारते हैं, उनके दर्शन करने के साथ ही करोड़ों तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त हो जाता है।' जैसे गुलाब के नीचे की मिट्टी में भी गुलाब की गंध आ जाती है, वैसे ही संतों के सान्निध्य से दुराचारी भी सदाचारी बन जाता है।
सत्संग का दूसरा साधन है सत्-साहित्य का अध्ययन, मनन और श्रवण। सत् साहित्य का संग व्यक्ति का जीवन दर्शन बदल देता है। सत्-साहित्य व्यक्ति को सदाचार की ओर ले जाता है और व्यक्ति सत्य के रंग में रंग जाता है।