कण-कण में भगवान व्याप्त है और भगवान का कहीं भी अभाव नहीं है, बस दृष्टि का फेर है। जिनकी दृष्टि संसार पर टिकी होती है, वे भगवान को न देख पाते हैं और न ही पा सकते हैं। इसके विपरीत जिनकी दृष्टि भगवान पर टिकी होती है, उन्हें प्रकृति के प्रत्येक अंश में भगवान के दर्शन होते हैं। संसार प्रतिपल बदलने वाला है और जब मनुष्य उस पर विश्वास करता है, उसके परिवर्तन का हिस्सा बन जाता है, तो स्वत: भगवान से दूर होता चला जाता है। भगवान से दूर होने का अर्थ प्रकाश से अंधकार की ओर जाना है।
संसार अभाव रुप है और भगवान भाव स्वरुप। भगवान के भाव स्वरूप होने का सबसे बड़ा बड़ा प्रमाण यह है कि मनुष्य भगवान को जिस रूप में देखना चाहता है, भगवान उसी रूप में प्रत्यक्ष हो जाते हैं। भगवान उसके भाव के अनुसार अपना रूप बना लेते हैं। भगवान भगत के भाव देखते हैं, उसकी अवस्था, उसका वर्ण, उसका संप्रदाय आदि नहीं देखते हैं और जो सच्चे भक्त होते हैं वे इस बात से ही संतुष्ट रहते हैं कि भगवान हैं, वे यह नहीं सोचते कि कैसे हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि भगवान का स्वरूप क्या है, भगवान कैसे हैं, उनका जीवन यूं ही व्यतीत हो जाता है, सोच में संशय में।
सच्ची भक्त इस सच्चाई को जानते हैं कि अभी तक भगवान का जितना भी जिस रूप में भी, जिनके भी द्वारा वर्णन हुआ है, वह सारे का सारा मिलकर भी भगवान का पूरा वर्णन नहीं है। भगवान असीम हैं और असीम का यदि सम्पूर्ण वर्णन हो गया तो यह असीम कहां रह जाएगा, वह तो सीमित हो जाएगा और यह संभव नहीं है। इसलिए जो भक्त होते हैं वे झगड़े में पड़ते ही नहीं हैं कि भगवान कैसे हैं, उनका स्वरूप कैसा है, वह क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, शयन कैसे करते हैं, कैसे जागते हैं आदि। उन भक्तों के लिए तो इतना ही पर्याप्त है कि परमात्मा है। यही सोच भक्तों को भगवान के पास और पास ले जाता है।
यहां एक बात और समझने व सोचने वाली है कि भक्ति तब प्राप्त होती है, जब व्यक्ति पर भगवान और उसके निष्काम भक्तों की विशेष कृपा व्यक्ति होती है। नारद भक्ति के अनुसार- 'भक्ति मुख्य रूप से भगवत प्रेमी महापुरुषों की कृपा से अथवा भगवत कृपा के लेश मात्र से प्राप्त होती है।' रामचरितमानस के अरण्यकांड में तुलसीदास जी ने भी कहा है-
भगति तात अनुपम सुखमूला।मिलए जो संत होई अनुकूला।।
प्रश्न यह भी है कि भक्ति का प्रसाद किन्हें प्राप्त होता है और कौन है जिन्हें भगवत भक्तों की श्रेणी में रखा जा सकता है। शास्त्रों का कथन है कि जो संपूर्ण जीवों के हितेषी हैं, जिन्हें दूसरों में दोष देखने की आदत नहीं होती है, जो किसी से जाने अनजाने ईर्ष्या नहीं करते हैं, मन और इंद्रियों को वश में रखते हैं, निष्काम और शांत रहते हैं, वह भक्त कहलाने के अधिकारी हैं। इसके अतिरिक्त श्रेष्ठ भगवद्भक्त वे हैं, जो मन, वाणी तथा क्रिया द्वारा किसी को भी कभी पीड़ा नहीं देते हैं और जिनमें संग्रह की प्रवृत्ति नहीं है, जो माता-पिता के प्रति गाय और विश्वनाथ का भाव रखकर उनकी सेवा करते हैं और यतीमों की सेवा में संलग्न रहते हैं, वे श्रेष्ठ भागवत हैं। जो पराई निंदा से दूर रहते हैं, सबके लिए हित कारक वचन बोलते हैं और सब के गुणों को ही ग्रहण करने वाले हैं उन्हें सच्चा भगवद्भक्त माना जा सकता है।