संस्कृत का शब्द 'अकिंचन' विशेषण है और उसका शाब्दिक अर्थ होता है - जिसके पास कुछ भी न हो, अति दरिद्र, कंगाल, परिग्रह त्यागी, संग्रह त्यागी, जैन मतानुसार ममता की निवृत्ति।
संसार में असंख्य लोग हैं, जो चर्चा में स्वयं के लिए अकिंचन शब्द का प्रयोग करते हैं। लेकिन इस सत्य को भी स्वीकार करना ही होगा कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को अकिंचन के रूप में प्रस्तुत करना नहीं चाहता है। संसार में प्रतिष्ठित रहने, प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि लोग आपको अकिंचन न समझें और इसी कारण लोग स्वयं को अकिंचन घोषित करने से परहेज करते हैं।
इसका एक पक्ष और भी है, जो साधन संपन्न होते हैं, जो धनवान होते हैं, सुखी-समृद्ध होते हैं, उनमें से बहुत सारे लोग दूसरों को हेय दृष्टि से देखते और अकिंचन मानते हैं। उनका यह सोच उनके अहंकार के कारण प्रकट होता है।
अकिंचनता, दरिद्रता, कंगाली केवल धन की ही हो ऐसा कतई नहीं है। ज्ञानशून्य, विवेकशून्य, अनपढ़ भी तो अकिंचन ही होते हैं। जिसके पास ज्ञान की राशि नहीं, वह सोने-चांदी के ढेर पर बैठकर की दरिद्र ही होता है, अकिंचन ही होता है। बुद्धि हीनता भी दरिद्रता की श्रेणी में ही आती है। वैचारिक दरिद्रता अन्य किसी भी भौतिक अकिंचनता से बड़ी होती है। यदि कुबेर का सारा धन मिलने के बाद भी व्यक्ति में विवेक नहीं है, तो वह बेचारा ही कहा जाता है, अकिंचन ही कहलाता है। यह तो हुई सांसारिक बातें, यदि इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो संसार का प्रत्येक व्यक्ति अकिंचन ही तो है।
यह बात थोड़ा अजीब लग सकती है, यह बात थोड़ा अलग लग सकती है। लेकिन यह है एकदम सत्य और सत्य इसलिए है, क्योंकि संसार में जितने भी मनुष्य हैं, उनके पास अपना कुछ भी तो नहीं है। धन-दौलत, जमीन-जायदाद, कार-बंगले की बात छोड़ दो, मनुष्य का तो शरीर भी उसका अपना नहीं है, उसकी तो सांसे भी अपनी नहीं हैं, उसका तो जीवन भी उसका नहीं है। सारी जिंदगी संग्रह करने, समेटने में लगा रहने वाला मनुष्य एक कण द्रव्य भी अपने साथ परलोक नहीं ले जा पाता है। इससे ज्यादा अकिंचन, उससे ज्यादा बेचारा भला कौन हो सकता है। मनुष्य के पास जो भी वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि है वह सब उसका है ही नहीं वह तो समाज का है। मनुष्य उस वस्तु आदि को अपनी मानकर उससे सुख भोगने लगता है और इससे विवश होकर उसे दु:ख भोगना पड़ता है। मनुष्य यदि स्वीकार कर ले कि उसके पास उसका अपना कुछ भी नहीं है, वह अकिंचन है, उसे जो मिला वह परमात्मा ने संसार को माध्यम बनाकर दिया है तो वह दु:खों से बच सकता है। लेकिन इस सच को कोई स्वीकार करता नहीं है, क्योंकि उसे तो लगता है कि जो कुछ उसके पास है वह सब उसने अर्जित किया है, उसने अपनी मेहनत से कमाया है। धन-संपत्ति, मान-प्रतिष्ठा, घर-परिवार सब उसके अपने हैं। लेकिन वह इस बात को नहीं सोच पाता कि जिन्हें वे अपना मानता है अपना मान रहा है उन्हें अंतिम समय में अपने साथ क्यों नहीं ले जा पाएगा, ऐसा इसलिए क्योंकि इनमे से कोई भी और कुछ भी तो उसका अपना नहीं है।
सच तो यह है कि एकमात्र परमात्मा के अतिरिक्त और सब के सब अकिंचन हैं, दरिद्र हैं, कंगाल हैं, हमारे पास हमारा कुछ भी नहीं है और परमात्मा के पास सब कुछ अपना है। सबका सब कुछ भी तो परमात्मा का ही है। हां, एक बात अवश्य है, हम अच्छे काम करके, दूसरों के काम आकर, बुराई को तिलांजलि देकर, अहंकार त्याग कर, झूठ-पाप से दूर रहकर, अपने सुख से ज्यादा दूसरों के सुख की चिंता करके, माता-पिता-गुरु की सेवा करके और परमात्मा के श्रीचरणों में ध्यान लगा कर जरूर ऐसा 'अनमोल धन' अर्जित कर सकते हैं, जिसके चलते हम परमात्मा की दृष्टि में अकिंचन तो नहीं रहते हैं। बेशक हमें संसार धन अभाव के कारण, सांसारिक सुखों के अभाव के कारण दरिद्र माने लेकिन उपरोक्त अनमोल धन संग्रह के उपरांत परमात्मा और ज्ञानियों की दृष्टि में तो हम संपन्न हो जाते हैं और यही तो हमारे जीवन का लक्ष्य है, होना ही चाहिए।
अपनी अकिंचनता को बिना अहंकार भाव के स्वीकार कर लेने वाला मनुष्य भगवान को बहुत प्रिय होता है और जिसे परमात्मा का प्रेम मिल जाए उसके लिए सब धन धूल के समान हो जाता है।