धर्म-अध्यात्म : साईं या संसार में मतलब का व्यवहार!
भारत
RP Raghuvanshi
30 Nov 2025 07:02 AM
विनय संकोची
भगवान को प्रेम चाहिए, साधारण प्रेम नहीं अपितु अनन्य प्रेम। अनन्य प्रेम होने पर भगवान को स्वयं प्रकट होकर भक्तों की पुकार सुनने के लिए उपस्थित होना पड़ता है। प्रेम में अपूर्व, अतुलनीय, असीम शक्ति होती है। भगवान शिव का कथन है - 'हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम से प्रकट होहिं मैं जाना' - यहां दो बातें स्पष्ट हैं एक - ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है और दो - प्रभु प्रेम से प्रकट हो जाते हैं।
महाभारत के युद्ध में प्रेम के वश होकर ही भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का रथ हांका, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में झूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के घर भोजन करने का निमंत्रण ठुकरा कर महात्मा विदुर के घर का भोजन प्रेम वश ही तो स्वीकार किया था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने प्रेम के वशीभूत होकर शबरी भीलनी के बेर प्रसन्नता पूर्वक खाए थे। अखिल ब्रह्मांड नायक योगेश्वर श्रीकृष्ण गोपियों के प्रेमपाश में बंधकर नृत्य तक करने लग जाते हैं। ये तमाम घटनाएं बताती हैं कि भगवान को प्रेम चाहिए अनन्य और निश्चछल।
ईश्वर प्रेमी भक्तों के अनुरोध को ठुकराते नहीं हैं। भगवान केवल प्रेम देखते हैं। उन्हें ऊंच-नीच धनी-निर्धन, छूत-अछूत, राजा-रंक आदि से कोई भेद नहीं, जो प्रेम करे भगवान उसी के हो जाते हैं। प्रेम में कहने को ढाई अक्षर हैं लेकिन प्रेम को समझना और नि:स्वार्थ भाव से प्रेम करना बहुत कठिन है। आज हर तरफ स्वार्थ का वातावरण दिखाई देता है। इस सत्य को स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि आज संसार में कोई किसी को प्रेम नहीं करता है, हां अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए प्रेम करने का नाटक जरूर करता है। सच्चा प्रेम दुर्लभ हो चला है। लोग सच्चे प्रेम की परिभाषा तक से परिचित नहीं हैं। और शायद यही कारण है कि लोग मानवता से विमुख होते चले जा रहे हैं।
भगवान गौतम बुद्ध का कहना है - 'समस्त प्राणियों से प्रेम करना ही सच्ची मनुष्यता है।' समस्त प्राणियों की बात तो दूर आज व्यक्ति अपने सगे संबंधियों, इष्ट मित्रों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं। प्रेम में त्याग होना चाहिए। स्वार्थ वश प्रेम का दिखावा करना कदापि प्रेम नहीं माना जा सकता। प्रेम में नि:स्वार्थ भावना और कष्ट रहित व्यवहार ही महत्वपूर्ण होता है। यह एक कटु सत्य है कि अधिकांश परिवारों में माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य परिजनों और निकट जनों का प्रेम केवल फर्ज और रस्म अदायगी बनकर रह गया है। वृद्ध माता-पिता का वृद्ध आश्रम में जाना, भाई-भाई में बोलचाल बंद होना, स्वार्थ पूर्ति के बाद मित्र का दूरी बना लेना, ये तमाम बातें प्रेम के पतन का प्रतीक हैं। कवि गिरधर ने संभवत इन्हीं परिस्थितियों के बारे में लिखा होगा - 'साईं या संसार में मतलब का व्यवहार।'
रहीमदास जी कहते हैं - टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार। रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे
मुक्ताहार।। कवि श्रेष्ठ के परामर्श को व्यवहार में लाकर पारिवारिक और सामाजिक जीवन में हमेशा प्रेम के संबंध को बनाए रखा जा सकता है लेकिन इसके लिए स्वार्थ का त्याग करना होगा दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख समझना होगा, दूसरों के सुख को अपना सुख मानते हुए प्रसन्न होना होगा। लोग पता नहीं इस बात को क्यों समझना नहीं चाहते कि प्रेम करोगे तो प्रेम पाओगे। प्रेम से तो भगवान बस में हो जाते हैं इंसान की तो बात ही क्या है। लेकिन प्रयास तो करना होगा। प्रेम के पौधे को भाव जल से सींचते रहना होगा। अपने से प्रेम करते हुए सब से प्रेम करते रहना होगा।