देह, शरीर, अवयव, भाग, गौण या आश्रित, विषय या वस्तु, उपाय या साधन, मन और प्राचीन भारत के एक जनपद को "अंग" कहा जाता है। प्रत्येक प्राणी को अपने प्रत्येक अंग से बेहद प्यार होता है और उन अंगों के बिना रहने की वह कल्पना भी नहीं करता है। मनुष्य को दोनों कान चाहिए, नाक और दोनों आंखें चाहिएं, दोनों हाथ-दोनों पांव चाहिएं, शरीर के तमाम अवयव, तमाम अंग चाहिएं और वो भी एकदम पूर्ण और स्वस्थ चाहिएं। कोई भी अधूरा नहीं चाहिए। किसी को भी विकलांग होना पसंद नहीं।
विकलांगता व्यक्ति को कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में पराश्रित बनाती है और पराश्रय स्वाभिमान को आहत करता है। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो पूर्णांग होते हुए भी पराश्रित होते हैं, न होते हुए भी विकलांग होते हैं। ऐसे लोगों को समाज बोझ के रूप में देखता है।
जैसे हाथ-पैर, आंख-नाक-कान आदि शरीर के अंग हैं, उसी तरह से प्रत्येक व्यक्ति समाज रूपी विशाल देह का अंग होता है। विचित्र स्थिति तो यह है कि सब जानते हैं कि वह समाज के अंग हैं, लेकिन व्यवहार स्वस्थ सशक्त अंग की भांति नहीं करते हैं, इससे समाज के विभिन्न भागों में विकृतियां उभरती रहती हैं, जिसके चलते समाज में असंगतियां- विसंगतियां सिर उठाती रहती हैं। अगर व्यक्ति मानता है कि वह समाज का अंग है, तो एक स्वस्थ अंग की भांति व्यवहार क्यों नहीं करता है? अपना काम सुचारु रूप से क्यों नहीं करना चाहता है।
हम चाहते हैं हमारे प्रत्येक अंग, प्रत्येक अवयव ठीक ढंग से काम करें, हम जैसे उसका उपयोग-उपभोग करना चाहें, वैसा कर पाएं और अधिक से अधिक सुविधा साधन जुटा पाएं। जब कोई अंग ठीक से काम नहीं कर पाता है, तो हम खिन्न हो जाते हैं, दुखी हो जाते हैं, कष्ट में आ जाते हैं और उस अंग को ठीक करने-कराने का प्रयास करते हैं।
समाज भी एक देह है और हम सब उसके अंग हैं। हमारा नैतिक नैसर्गिक कर्तव्य है कि हम समाज की बेहतरी के लिए अपने अंग-कर्म का निर्वाह करें। हम प्रत्येक वह कार्य करें जिससे समाज का रूप निखरे, जिससे समाज स्वस्थ संपन्न समृद्ध रहे। लेकिन होता इसके विपरीत है, हम अपनी देह के लिए, अपने अंगों के माध्यम से समाज से अधिक से अधिक लेना तो चाहते हैं, समाज का अधिकतम दोहन करने का प्रयास रहता है हमारा। परंतु समाज को देने में हमारा दिल दुखता है। न हम धन बांटना चाहते हैं, न हम श्रम बांटना चाहते हैं, न हम खुशी बांटना चाहते हैं और बिना कुछ लिए हमें ज्ञान बांटना गवारा है। जिस वस्तु की हमारे पास अधिकता है, जो हमारे पास जरूरत से कहीं ज्यादा है, उसे भी हम बांटते नहीं हैं। अंग- धर्म का पालन करना हमारी आदत में रहा ही नहीं है।
शायद यही कारण है कि समाज में असमानता रूपी विकलांगता, भेदभाव रूपी अपंगता लगातार बढ़ती जा रही है। हमारे अंग ठीक से काम करें इसके लिए समाज के अंगों को भी स्वस्थ एवं क्रियाशील रखना होगा, नहीं तो सामाजिक विकलांगता बढ़ती चली जाएगी।
सब हो जाएगा, अपने आप हो जाएगा, ऐसा सोचने से कुछ होने वाला नहीं। होगा तो करने से ही और वह भी सबके करने से। सब तब करेंगे जब परस्पर सामंजस्य होगा, आपस में तालमेल होगा, सहयोग की भावना होगी और भावना भी हृदय से होगी, पवित्र होगी। प्रारब्ध होता है, सबका होता है लेकिन प्रारब्ध के सहारे जीवन नहीं काटा जा सकता, नहीं काटना चाहिए। कर्म प्रधान है अगर नहीं होता तो ज्ञानी कदापि यह नहीं कहते कि - "कर्म से व्यक्ति अपने भाग्य को बदल सकता है।" जितना कर्म महत्वपूर्ण है, उतना ही कर्तव्य आवश्यक है।
अपने अधिकार की मांग करने वालों की संख्या आज उनसे बड़ी है, जो अपने कर्तव्य पालन को महत्व देते हैं। मनुष्य चाहे तो प्रत्येक स्थिति - परिस्थिति में अपने कर्तव्य का पालन कर सकता है। कर्तव्य का यथार्थ रूप सेवा बताया गया है। अपने अंगों के माध्यम समाज रूपी देह के अंगों की सेवा करके व्यक्ति अपना कर्तव्य पालन कर सकता है। बहुत लोग हैं जो सेवा अर्थात् कर्तव्य करने में असमर्थ हैं लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग हैं, जो सेवा करा तो रहे हैं लेकिन कर्तव्य पालन अर्थात् सेवा कर नहीं रहे हैं। ऐसे लोगों के कारण समाज का स्वास्थ्य विकृत होता है और संवेदनशील लोगों का मन आहत होता है। "अंग-धर्म" का पालन, निर्वहन आवश्यक है, अनिवार्य है।