महाभारत के महासंग्राम में जो योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं, बार-बार अन्याय का विरोध करने के लिए कहते हैं, लेकिन दूसरी और वही श्रीकृष्ण उसे क्रोध से बचने के लिए हमेशा सावधान करते रहते हैं। क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है मोह से स्मृति का भ्रम होता है तथा बुद्धि का नाश हो जाने से मनुष्य कहीं का नहीं रह जाता है।
यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि कोई एक तरफ तो शत्रुओं का नाश करने के लिए कहे और दूसरी तरफ क्रोध से दूर रहने की सलाह दे। परंतु श्रीकृष्ण ने ऐसा किया। श्रीकृष्ण के कथन में बड़ा रहस्य छिपा है, उनके इस कथन में बहुत गहराई है। लोकमंगल, लोककल्याण के लिए अन्याय का विरोध करने और क्रोध के आवेश में किसी का नाश करने के लिए उतावला होने में बहुत बड़ा अंतर है।
भगवान ने अन्याय और अन्याय का साथ देने वालों के विरुद्ध शस्त्र उठाकर युद्ध में कूद पड़ने के लिए अर्जुन से कहा। क्योंकि अर्जुन के इस कृत्य से असंख्य लोगों को अन्याय से मुक्ति मिलने वाली थी। दूसरी ओर भगवान ने अर्जुन को क्रोध से दूर रहने का आदेश दिया। कारण यही था कि क्रोध विवेक का हरण कर लेता है और क्रोधी विवेक हीन व्यक्ति शत्रु का नाश करने के साथ अपने पांव पर भी कुल्हाड़ी मार सकता है। श्रीकृष्ण के आदेश का अक्षरशः पालन करने वाले अर्जुन ने महाभारत में केवल युद्ध किया है, क्रोध कहीं नहीं किया है। अर्जुन ने कहीं अपना विवेक नहीं खोया, उन्होंने सदैव अपना मानसिक संतुलन बनाए रखा। यही कारण है कि अर्जुन जीता है और क्रोध के कारण विवेक को त्याग बैठा दुर्योधन पराजित हुआ है। दुर्योधन महाबली योद्धा था लेकिन उसके बुद्धि कौशल पर क्रोध और अहंकार का पर्दा पड़ा था। उसने जो कदम उठाया क्रोध में उठाया। विवेक खोकर वह लड़ा इसलिए हार गया। क्रोध हारा, संयम एवं विवेक की जीत हुई अविवेक पराजित हुआ।
क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध कई प्रकार का होता है। एक वह जो कुछ पल के लिए आता है और समाप्त हो जाता है। दूसरा वह जो आता है और जाता नहीं है, मन में पसर कर बैठ जाता है। खाते-पीते, सोते-जागते साथ रहता है। भगवान बुद्ध ने इस प्रकार के क्रोध के बारे में बड़ी ही सुंदर बात कही है - 'क्रोध पाले रखना, गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते हैं।' ठीक ही तो कहा है भगवान बुद्ध ने - 'क्रोध करने वाला पहले स्वयं को जलाता है। अपना ही नुकसान करता है। क्रोध न करने का एक उपाय है। यदि हम अपना मुंह बंद रखें और आंखें खुली रखें तो क्रोध से बच सकते हैं। क्रोध करने वाला अपना मुंह खोल लेता है और आंखें बंद कर लेता है। वह सब कुछ देखता होकर भी कुछ नहीं देखता है, बस अनर्गल प्रलाप करता है। कहता नहीं बकता है और बकना उस अवस्था में होता है, जब मनुष्य को इस बात का होश नहीं रहता कि वह किसे क्या कह रहा है, क्यों कह रहा है और जो कह रहा है उसका परिणाम क्या होगा। इससे तो यही लगता है कि क्रोध एक प्रकार का पागलपन है।
जितनी देर हम क्रोध करते हैं उतनी देर, उतने समय, उतनी अवधि की खुशी, अपनी खुशी हम अपने हाथों से नष्ट कर रहे होते हैं। क्रोध से उसके परिणाम कहीं ज्यादा घातक होते हैं। क्रोध वह हवा है, जो बुद्धि के दीपक को बुझा देती है और व्यक्ति अंधकार में भटकता हुआ न जाने किस-किस से टकराता चला जाता है, उलझता चला जाता है।
क्रोध भी करना चाहिए लेकिन परिस्थिति, काल, स्थान और पात्र का ध्यान रखते हुए। क्रोध करने के पीछे लोकमंगल की, जनहित की पवित्र भावना होनी चाहिए। क्रोध को एक सकारात्मक ऊर्जा में बदल कर, उसे समाज में व्याप्त बुराइयों, असमानताओं, कुरीतियों, अन्याय-अत्याचार, दुराचार-कदाचार के विरुद्ध शस्त्र के रूप में उपयोग करना चाहिए।