सुमिरन ते मन लाइए जैसे दीप पतंगा।
प्राण तजे हिन एक में जरत न मोड़े अंगा।।
संत कबीर दास जी ने इस दोहे में कहा है कि पतंगा जब दीपक के प्रकाश को देखता है तो वह अपने मन पर काबू नहीं रख पाता, प्रकाश के प्रति अतिशय प्रेम के वशीभूत होकर वह दीपक की ओर चला जाता है। वह प्रकाश की तेज लौ में अपने प्राण गवां देता है परंतु पीछे नहीं हटता।
पतंगा प्राण तो गवां बैठता है, लेकिन उस प्रकाश को पा लेता है, जिससे वह अतिशय प्रेम करता है। वह प्रकाश भी तो उसके प्रेम का सम्मान करते हुए उसे अपने में समा लेता है। यह प्रेम की पराकाष्ठा है।
दूसरी ओर मनुष्य परमात्मा रूपी प्रकाश को पाना तो चाहता है, लेकिन उस तक पहुंचने के मार्ग में पड़ने वाले अंधकार को पार करने का साहस नहीं जुटा पाता है। साहस का अभाव प्रेम में कमी का प्रतीक माना जा सकता है। अंधकार से डरने वाला व्यक्ति प्रकाश तक कैसे पहुंच सकता है? विडंबना यह है कि मनुष्य परमात्मा रूपी प्रकाश को पाना तो चाहता है, लेकिन पतंगे की तरह साहस दिखाने से जी चुराता है।
सत्य तो यह है कि प्रकाश की ओर तेजी से बढ़ते पतंगे की दृष्टि केवल और केवल प्रकाश पर केंद्रित होती है। उसे कुछ और दिखाई ही नहीं देता है, इसलिए वह लक्ष्य पा लेता है। बिना किसी भय के मनुष्य प्रकाश परमात्मा को पाना चाहता है, परंतु वह संसार के माया जाल में फंसा होने के कारण प्रकाश पर ही दृष्टि केंद्रित नहीं कर पाता है, जिस कारण परमात्मा से अनन्य प्रेम नहीं हो पाता है और मिश्रित प्रेम परमात्मा को प्रिय नहीं है।
मिश्रित प्रेम करने वाले मनुष्यों के संबंध में ही तो कबीर दास ने कहा है -
माला फेरत जुग भया गया न मन का फेर।
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर।।
हाथ में माला लेकर भगवान के विग्रह के समक्ष बैठकर भी मनुष्य एक पल के लिए भी संसार को भुला नहीं पाता है। करमाला चलती रहती है, साथ ही संसार माला भी इस बीच एक पल को थमती नहीं है। यह अधूरा प्रेम है, यह मिश्रित प्रेम है और यह परमात्मा को प्रिय नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि सुमिरन कैसे करना चाहिए -
कामिहि नारि पिआरि जिमि
लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
भावार्थ यह कि जिस प्रकार कामी पुरुष अपनी प्रेमास्पद नारी का चिंतन आठों प्रहर करता रहता है और उसे एक पल भी नहीं भूलता, जिस प्रकार लोभी मनुष्य सतत धन का चिंतन करता रहता है, उसे एक पल के लिए भी नहीं भूलता, उसी प्रकार साधक को भी परमात्मा का निरंतर चिंतन करना चाहिए।
कबीर दास जी भी इसी भाव को एक दोहे के माध्यम से दोहराते हैं -
सुमिरन की सुधि यों करो जैसे कामी काम। एक पलक बिसरे नहीं निसुदिन आठों याम।।
तनिक सा भी आध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले तमाम लोगों को, सभी आस्तिकों को इस बात की जानकारी है कि जिसके एक बार के नाम सुमिरन से जीव भवसागर के पार उतर जाता है, वह ईश्वर वरेण्य है, स्मरणीय है, भजनीय है और आत्मसात करने योग्य है। तुलसीदास जी ने भी यही कहा है -
जासु नाम सुमिरन एक बारा।
उतरही नर भवसिंधु अपारा।।
सुमिरन या स्मरण का अपना एक विज्ञान है, एक सिद्धांत है, जो यह कहता है कि हम स्मरण उसी का कर सकते हैं, जिससे हमारा निकट का नाता होता है। भगवान जगत पिता हैं और प्राणी मात्र उनकी संतान, भला इससे ज्यादा निकटता का और क्या रिश्ता हो सकता है। परंतु इस रिश्ते पर संसार भारी पड़ जाता है और हम परमात्मा का ही स्मरण नहीं कर पाते हैं। पतंगे जैसा अतिशय प्रेम नहीं कर पाते हैं, हमारा प्रेम अधूरा रह जाता है।
इन तमाम सच्चाईयों के साथ गलत यह भी नहीं है कि परमात्मा का एहसास हमारे तन में रक्त के साथ हमेशा बना रहता है। हम परमात्मा को कभी भुलाते नहीं हैं, भुला सकते ही नहीं हैं, क्योंकि हम उस परमात्म सत्ता के अंश हैं। हां, संसार में फंसे रहकर हम उसे वैसे याद नहीं कर पाते जैसे कि हमें करना चाहिए। भूख और विपत्ति के समय शिशु केवल एक अपनी मां के लिए ही रोता है माता के प्रति उसका यह प्रेम ही उसे सुख प्रदान करता है। यदि मनुष्य बचपन की अपनी इस मानसिकता को पुनः प्राप्त कर ले, तो वह हमेशा स्वयं को भगवान रूपी माता की गोद में सुख पूर्वक बैठा पाएगा। प्रयास से यह संभव है।