धर्म-अध्यात्म : प्रभु के निकट जाने का श्रेष्ठ उपाय है सत्संग
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 02:34 AM
विनय संकोची
भगवान भक्तों को जितना चाहते हैं, जितना उसका आदर करते हैं, संसार में इतना चाहने वाला, आदर करने वाले कोई है ही नहीं, कोई हो ही नहीं सकता है। भगवान अपने भक्तों को साक्षात कृपा की मूर्ति मानते हैं। भगवान की दृष्टि में भक्तों का महत्व कितना अधिक है, उसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वयं प्रकाशित करते हुए कहा है - 'मेरा भक्त किसी भी प्राणी से बैर भाव नहीं रखता और घोर से घोर दु:ख भी प्रसन्नता पूर्वक सहता है। मेरे भक्तों के जीवन का सार है सत्य। वह समदर्शी और सब का भला करने वाला होता है। उसकी बुद्धि कामनाओं से कलुषित नहीं होती। उसकी बुद्धि स्थिर होती है। उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है।'
इससे आगे श्रीकृष्ण कहते हैं - 'मेरा भक्त स्वयं किसी से किसी प्रकार का सम्मान नहीं चाहता, परंतु दूसरों का सम्मान करता रहता है। उसके हृदय में करुणा भरी होती है और मेरे तत्वों का उसे यथार्थ ज्ञान होता है।'
श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान लीलाधर श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए ये शब्द भक्तों के गुणों को तो उद्घाटित करते ही हैं, साथ ही भक्त होने की एक कसौटी भी निर्धारित करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उपरोक्त गुणों के युक्त व्यक्ति ही भक्त कहलाने का अधिकारी है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि इन तमाम गुणों से युक्त मनुष्य को ही भगवान अपना भक्त मानते हैं।
जीव और परमात्मा का अभिन्न नाता है। जीव परमात्मा का अंश है, इसलिए परमात्मा अंश रूप में सदैव उसके साथ रहते हैं। जीव तो एक ही है, व्यवहार के लिए ही परमात्मा के अंश के रूप में जन्मता है जो वस्तुतः परमात्मा का ही स्वरूप है। यह शास्त्र सम्मत सत्य है कि जीव और ईश्वर बुद्धि और मुक्ति के भेद से भिन्न भिन्न होने पर भी एक ही शरीर में नियंता और नियंत्रित के रूप में स्थिर होते हैं। इस सत्य को स्वीकार न करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि जीव का जीवन जिस शक्ति पर अवलंबित है वह दृश्य तो है ही लेकिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में जीव के भीतर भी अवस्थित है। इस शक्ति को आत्मा अथवा प्राण नाम दे दिया गया है, जिसे जीव महसूस तो कर सकता है परंतु देख नहीं सकता यह सब प्रभु की माया है।
माया के वशीभूत जीव परमात्मा को भुला बैठता है और अपने नियमों के अनुसार जीवन जीने के प्रयास में जुट जाता है। यह प्रयास उसे परम शक्ति से दूर ले जाता है। ऐसे में जीव का अपनी भूल से परमात्मा से केवल स्वार्थ का रिश्ता बचा रहता है। जब भारी संकट आता है, तब जीव को परमात्मा की याद आती है। लेकिन इसके विपरीत जो भक्त होते हैं, इस संसार को भी भुलाकर परमात्मा को याद रखने को प्राथमिकता देते हैं। यही भेद है, यही अंतर है, साधारण मनुष्य और भक्तों में। प्रभु की भक्ति से साधारण भी असाधारण हो जाता है। इसके उलट परम शक्ति को तिरस्कृत विस्मृत करने वाला असाधारण मनुष्य भी जड़ मात्र होकर रह जाता है। उसके जीवित रहते हुए भी उसका अस्तित्व विलुप्त हो जाता है। जो सच्चे भक्त होते हैं वह आत्म जिज्ञासा और विचार के द्वारा आत्मा में जो अनेकता का भ्रम है, उसे दूर कर सर्वव्यापी परमात्मा में अपना मन लगाकर आनंदित होते हैं।
जगत की आसक्तियों के कारण मनुष्य की भगवान से दूरी होती है और बढ़ती चली जाती है। मनुष्य उस परम शक्ति से दूर होता चला जाता है, जिसके उसे निकट होना चाहिए। सांसारिक आसक्तियां कष्ट का कारण बन जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने आसक्तियों से मुक्ति का साधन सत्संग को बताते हुए कहा है - 'संसार में जितने भी आसक्ति हैं उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वश में कर लेता है, वैसा साधन न योग है, न सांख्य, न धर्म पालन और न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग और दक्षिणा से भी मैं वैसा प्रसन्न नहीं होता।'
सत्संग का महत्व समझने वाले भक्त भगवान के बहुत निकट और प्रिय होते हैं, यह शास्त्र सम्मत सत्य है।