
अशोक बालियान सनातन धर्म क्या है ? सनातन धर्म अथवा हिन्दू धर्म कब से स्थापित है। इस विषय पर पढ़ें पूरा सटीक विश्लेषण। यह विश्लेषण प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता व विश्लेषक ने किया है।
भारत में हिन्दू धर्म (सनातन या वैदिक धर्म) अनादि काल से है। भारत को विदेशियों ने हिंदुओं का देश होने के कारण हिंदुस्तान नाम दिया था, लेकिन आरंभिक युगों में इसे भारत कहा जाता था। हिन्दू धर्म में शुरुआत में जातियों के स्थान पर काम के आधार पर चार वर्ग थे। कालान्तर में वर्ग से जातियां बन गई थी और इन सभी जातियों में औपचारिक और नैतिक आचरण के लिए कुछ विशिष्ट रीति-रिवाज और नियम अलग-अलग बन गये थे, फिर भी वे सभी हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों को मानते थे। हिंदू धर्म के वास्तविक सिद्धांतों में जीवन के प्रमुख कर्तव्य, पवित्रता और उदारता का समावेश है। वेद हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धर्मग्रंथ हैं।
हिंदू धर्मशास्त्र की संपूर्ण प्रणाली का सिद्धांत है कि दिव्य आत्मा, ब्रह्मांड की आत्मा के रूप में सभी चेतन प्राणियों में पदार्थ से एकजुट हो जाती है, वह आत्मा पदार्थ के विशेष भागों से अछूती या व्यक्तिगत होती है व ब्रह्मांड सभी को जीवन और गति देता है। हिन्दू धर्म में ब्रम्हा, विष्णु और शिवजी को ईश्वर का प्रतिनिधित्व माना जाता है। हिन्दू धर्म की पौराणिक कथायें भी देवताओं को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती है। हिन्दू धर्म में वेदों को सबसे प्राचीन कहा जाता है और पूजा के लिए प्राथमिक तत्व अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और अंतरिक्ष स्वर्गीय पिंड पहली वस्तुएँ थीं। हिन्दू धर्म में तुलसी व पीपल जैसे कुछ पेड़ों व गंगा जैसी नदियों को पवित्र माना जाता है।हिन्दू धर्म में देवताओं व देवियों की मूर्तियाँ ईश्वर के विभिन्न रूपों व गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं और देवताओं व देवियों की मूर्तियाँ हजारों दंतकथाओं का स्रोत भी है। हिन्दू के अनुसार जैसे ही आत्माएं पदार्थ से जुड़ जाती हैं, वे अपनी नियति के अनुसार कम या ज्यादा तीन गुणों के साथ प्रभावित हो जाती हैं। पहले के रूप में उसके साथ जो चरित्र की उत्कृष्टता को जन्म देता है। दूसरे उसके साथ जो क्रोध, बेचैनी, सांसारिक इच्छा आदि को उत्तेजित करता है और तीसरा वह जो निष्क्रियता, अज्ञानता और इसी तरह की त्रुटियों को जन्म देता है। इस प्रकार व्यक्ति चरित्र का निर्माण होता है और भविष्य की नियति का नियमन होता है। जो लोग बुरे भाग्य के प्रभाव में जीवन में आते हैं, वे पाखंड, घमंड, अभिमान, कठोरता से प्रतिष्ठित हैं। वाणी और अज्ञान वह दिव्य नियति, दिव्य प्रकृति में शाश्वत अवशोषण के लिए है और बुरी नियति उसको सीमित कर देती है।
हिन्दू धर्म में भी दुनिया के अनेकों राष्ट्रों की तरह मूर्ति पूजा की किसी भी प्राचीन प्रणाली की उत्पत्ति है, जबकि उन राष्ट्रों में मनुष्यों के आचरण और रीति-रिवाजों में अंतर होता है। हिन्दू धर्म में इन आविष्कृत किसी भी मूर्ति या छवि का उद्देश्य एक ईश्वर का प्रतिनिधित्व करना था और ये महापुरुषों की कल्पनाओं द्वारा निर्मित मूर्तियाँ या छवियाँ हैं। दुर्गा देवी के 10 हाथ की छवि यह सिखाने के लिए है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। मूर्तियों को सदगुणों के व्यक्तित्व के रूप में और चित्रलिपि को सिद्धांत के माध्यम से शिक्षण के रूप में प्रस्तुत करना भी यही सिखाना है कि मनुष्य में सदगुण होने चाहिए।
Oriental memoirs a narrative of seventeen years residence in India vol 1 By James Forbes 1834 के अनुसार मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धर्मशास्त्र व संविधान है। यह सन 1776 में अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले पहले संस्कृत ग्रंथों में से एक था। मनु का धर्मशास्त्र वेदों से तीन सौ साल पहले लिखे गए थे और इस अवधि से पहले, मौखिक परंपरा द्वारा सौंपी गई हर चीज़ का विवरण शानदार था। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह धार्मिक और नैतिक व्यवस्था अत्यंत प्राचीन है। हिंदू धर्म किसी भी धर्मांतरण को स्वीकार नहीं करता है।
Read More - Noida News : मीडिया की सुर्खी बन गया है गृह मंत्री अमित शाह का नोएडा दौराहिन्दू धर्म में धार्मिक अनुष्ठान करने, प्रार्थना, स्नान व उपवास का विशेष महत्व है। प्रार्थना में खुद से कहा जाता है कि हे मनुष्य! इस नाशवान संसार में किसी भी प्राणी के धन का लालच मत करो। हम सत्य को देख सकें और अपना सम्पूर्ण कर्तव्य जाने। हिंदू एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन उसकी शक्ति का वर्णन करते हुए उसको तरह-तरह के विशेषण देते हैं। Sketches of the mythology and customs of the Hindoos by Forster 1785 के अनुसार हिंदुओं धर्म में मनुष्य के गुणों में धर्मपरायणता, वरिष्ठों की आज्ञाकारिता, दान, आतिथ्य सत्कार, माता-पिता का आदर और जन्म-जन्मांतर के वैवाहिक संबंध उनकी विशिष्ट विशेषताओं में से हैं।
Sanatana Dharmaहमें अपना इतिहास जानना चाहिए क्योंकि इतिहास का ज्ञान न केवल हमें वर्तमान की बेहतर समझ देता है, बल्कि भविष्य की ओर भी संकेत करता है। अतीत के आधार पर ही हम वर्तमान में भविष्य की नींव रख रख सकते है। Sanatana Dharma
(इस विश्लेषण के लेखक एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता और विश्लेषक हैं)