"अंकुश" का शाब्दिक अर्थ होता है - लोहे की छोटी नुकीली छड़, जिसे महावत हाथी को वश में रखने के लिए उपयोग में लाता है, रोक, नियंत्रण और दबाव आदि। अगर देखा जाए तो नदी के किनारे भी अंकुश का पर्याय ही हैं। संस्कारों को भी हम अंकुश ही मान सकते हैं। मर्यादा भी तो अंकुश ही है। अंकुश दृश्य - अदृश्य, प्रत्यक्ष - परोक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ अंकुश सांसारिक, सामाजिक, पारिवारिक, जातिगत, आर्थिक, व्यावहारिक, धार्मिक और आध्यात्मिक होते हैं, तो कुछ अंकुश ऐसे होते हैं जिन्हें व्यक्ति स्वयं को नियंत्रित रखने के लिए प्रयोग करता है।
हाथी में बहुत अधिक बल होता है और यदि महावत उसे नियंत्रण में ना रखे, उस पर अंकुश का प्रयोग ना करें तो वह विनाश कर सकता है। लेकिन महावत के अंकुश का स्पर्श मात्र हाथी के बल को सकारात्मक और रचनात्मकता से परिपूर्ण कर उसे समाज के लिए उपयोगी बना देता है। अंकुश को हाथी की स्वतंत्रता के हनन के रूप में भी देखने वालों की कमी नहीं है। लेकिन अंकुश तो अनिवार्य है, आवश्यक है और इसका कोई विकल्प भी नहीं है।
बच्चे पर माता-पिता का, शिष्य पर गुरु का, गुरु पर समाज का, समाज पर संस्कारों का, संस्कारों पर सभ्यता का, अंकुश ही तो सकारात्मक परिणाम देता है। यदि माता-पिता बच्चे को स्वच्छंद छोड़ दें, उसे मनमर्जी करने दें तो उसे शायद ही कोई उद्दंड - उत्पाती बनने से रोक पाएगा। यदि शिष्य पर गुरु अपने वैचारिक सैद्धांतिक और मर्यादित अंकुश का प्रयोग न करे तो वह निश्चित रूप से स्वेच्छाचारी होकर गुरु का नाम खराब करेगा और समाज को तो छोड़ो स्वयं अपने काम तक का भी नहीं रहेगा। यदि गुरु पर समाज का अंकुश, कहें या दबाव नहीं होगा तो शायद वे अपने लक्ष्य से भटक जाएगा। वे सच्चे गुरु, जो संसार को ऋण मात्र समझते हैं और परमात्मा परमेश्वर के ध्यान में लीन रहकर संसार के उद्धार की, कल्याण की कामना करते हैं, वे अपने मन पर नियम, संयम, तप, साधना का अंकुश रखते हैं। मर्यादा का अंकुश नर - नारी को पथभ्रष्ट होने से रोकता है। मर्यादा रूपी अंकुश से नियंत्रित स्त्री - पुरुष दुराचार, भ्रष्टाचार, अनाचार, कदाचार का साया भी अपने ऊपर नहीं पड़ने देते हैं। मर्यादा रूपी अंकुश मनुष्य को अपनी सीमा का उल्लंघन करने से रोकता है और वे रुकते हैं।
अगर कहें कि भय भी अंकुश का ही काम करता है, तो गलत नहीं होगा। भय ही तो है जो व्यक्ति को बुरे काम करने से रोकता है। भय का अंकुश जब बुरे कार्य का परिणाम बताता है, तो गलत रास्ते पर बढ़ता व्यक्ति अपने पांव पीछे हटा लेता है। भय मनुष्य को लक्ष्मण रेखा को लांघने से रोकता है। जो अंकुश को नकारते हैं, जो उसके संकेत को नकारते हैं, नजरअंदाज करते हैं, वे अनायास ही कष्ट कंटक में जा गिरते हैं और दु:ख भोगते हैं।
सुखदाई परिस्थिति आने पर सुखी और दु:खदाई परिस्थिति आने पर दु:खी होने वाला मनुष्य भोगी होता है और यदि अपने बुद्धि - विवेक द्वारा वही व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति पर अंकुश लगा ले, तो वह योगी की श्रेणी में आ जाता है। तब सुखदाई परिस्थिति आने पर या दु:ख की परिस्थितियां उपस्थित होने पर समान बना रहता है, न दु:ख में दु:खी और न खुशी में मतवाला। बुद्धि विवेक का अंकुश इस्तेमाल न करने वाले योगी के बारे में शास्त्र कहते हैं -"भोगी, योगी नहीं होता अपितु रोगी होता है।"
अंकुश को अत्याचार और बंधन मानने वाले तथाकथित प्रगतिशील लोग यह नहीं समझना चाहते कि नियंत्रण में ही भलाई है। सबका कल्याण है। नदी जब बंधन तोड़ कर बहती है, तो विनाश का कारण बन जाती है और जब तक तटों के बंधन में रहती है, तब तक विकास का, कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है, "चलते जाने का नाम ही जीवन है" - यह संदेश जन-जन में प्रसारित करती है। स्वयं पर अंकुश व्यक्ति को परमात्मा के साथ जोड़कर रखता है और परमात्मा के साथ जुड़ने का सीधा सा अर्थ मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होना है। अंकुश ही है जो आत्मा को पुनर्जन्म के जंजाल से बचा कर रखता है। अंकुश आवश्यक है और इसका अन्य कोई विकल्प नहीं है, विकल्प हो ही नहीं सकता है।[