धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ में से अर्थ और काम की लालसा विशेष रूप से इस युग में प्रबल है। लोग इस सत्य को भूल गए हैं कि अर्थ और काम का मूल धर्म ही है। केवल अर्थ या केवल काम जीवन का उद्देश्य नहीं है। इनका त्याग न करें पर इनका ग्रहण भी वहीं उचित है, जहां यह धर्म विरुद्ध न हो, धर्म से ही प्राप्त हो।
श्रीमद्भागवत के अनुसार - "धर्म का फल है संसार के बंधनों से मुक्ति। उससे यदि कोई सांसारिक संपत्ति उपार्जन कर ले तो यह कोई सफलता नहीं है। धन का फल है एकमात्र धर्म का अनुष्ठान, वह न करके यदि उसे कामोपभोग की कुछ सामग्री एकत्रित कर ली गई तो यह कोई लाभ की बात नहीं है। योग की सामग्रियों का भी यह लाभ नहीं है कि इंद्रियों को तृप्त किया जाए, जितने से जीवन निर्वाह हो उतना ही मांग पर्याप्त है। जीवन निर्वाह का भी यह फल नहीं है कि अनेक प्रकार के कर्मों के जंजाल में पड़ा रहे, उसका लाभ तो यही है कि तत्व - जिज्ञासा हो और सत्यानुसंधान करें।
श्रीमद्भागवत का यह उपदेश सर्वथा अनुकरणीय है, परंतु इसका आज के भौतिकवादी संसार में पालन करना आसान नहीं है। धर्म से प्रत्येक व्यक्ति जुड़ा तो रहता है लेकिन उसकी व्याख्या और पालन अपनी सुविधा विश्वास के अनुसार करता है। वैसे अधिकांश लोगों को लगता तो यही है कि वे जिसका पालन कर रहे हैं वही धर्म है। अहिंसा, सत्य, चोरी न करना तथा इंद्रियों को वश में रखना यह चारों वर्णों के लिए समान धर्म मनु ने बताए हैं। धर्म का एक विभाग छांदोग्य उपनिषद में और भगवत गीता के १८ वें अध्याय में वर्णित है - यज्ञ, दान और तप। इन्हीं में ईश्वर के प्रति, मनुष्यों के प्रति और अपने प्रति सब कर्तव्य आ जाते हैं। ये कर्तव्य भी धर्म का ही स्वरूप हैं। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि यह पावन करने वाले हैं और किसी अवस्था में इनका त्याग नहीं करना चाहिए।
धर्म का लक्ष्य है आत्मा का अभ्युत्थान और मुक्ति। मानव आत्म चेतना को समुन्नत करना चाहता है, प्राकृत द्वंद्वों को दूर कर मुक्ति पाना चाहता है - फिर चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय या समुदाय में क्यों न जन्म हो। धर्म का स्वरूप व्यक्ति की पात्रता, समय, स्थान, कार्य के अनुसार निश्चित होता है। जो कार्य एक के लिए विहित धर्म है, वही दूसरे के लिए अधर्म हो सकता है। इस प्रकार धर्म में स्वधर्म और परधर्म का भेद होता है।
कौन सा कर्म कब किसके लिए धर्म है, यह जानने का साधन शास्त्र हैं। इसीलिए धर्म की परिभाषा है - "शास्त्र प्रेरित कर्म ही धर्म है।" आजकल जिस तरह का बेचैनी भरा जीवन मनुष्य का हो गया है, उसमें शास्त्रों का अध्ययन कठिन हो चला है। शास्त्र पुस्तकालय और अलमारियों की शोभा बढ़ाने की वस्तु बनकर रह गए हैं। जो शास्त्र अध्ययन कर रहे हैं और समाज को शास्त्र सम्मत आदेशों उपदेशों के अनुरूप चलाने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें उपेक्षा का दंश झेलना पड़ता है। लेकिन धन्य हैं ऐसे महानुभाव जो भगीरथ प्रयास में जुटे हैं और शास्त्र सम्मत समाज देख पाने के प्रति आशावान हैं।
आज बहुत से तथाकथित प्रगतिशील लोग बड़े गर्व से धर्म से मानव जाति को मुक्त करने की बात कहते नजर आते हैं। लेकिन इसका परिणाम वे कभी नहीं सोचते। मनुष्य अपने धर्म को त्याग देगा तो पशु बन जाएगा। पशु होकर भी धर्म साथ नहीं छोड़ेगा क्योंकि पशु तो अपने धर्म का पालन करते ही हैं। मनुष्य ने जहां धर्म का त्याग किया मानो वो विनाश की ओर चला। धर्म की महत्ता तो इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि भगवान धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं। भगवान धर्म का आधार हैं और भगवान की उपेक्षा सुखदाई तो नहीं हो सकती।