
उज्जैन का महाकाल[/caption]
Ujjain Mahakal: माना जाता है कि भगवान शिव को उज्जैन नगरी बेहद प्रिय है । उज्जैन मे भगवान शिव के काफी भक्त निवास करते थे,वही इसी नगरी मे दूषण नामक दैत्य ने बहुत आतंक मचा रखा था। उसके आतंक से बचने के लिये भक्तों ने भगवान शिव की अराधना करने लगे। भक्तों की पूजा और तपस्या से प्रसन्न हो कर महाकाल स्वयं वहा प्रकट हुए और राक्षस का वध किया। इसके बाद भक्तों ने भगवान शिव से हमेशा के लिए उज्जैन में निवास करने की प्रार्थना की और तभी भगवान शिव वहाँ महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।
सभी ज्योतिर्लिंगों मे से महाकाल ऐसा ज्योतिर्लिंग है जिसकी प्रतिष्ठा पूरी पृथ्वी के राजा और मृत्यु के देवता मृत्युंजय महाकाल के रूप में की जाती है। कहा जाता है कि पृथ्वी के केंद्र उज्जैन में इसी शंकु यंत्र पर महाकालेश्वर लिंग स्थित है। यहीं से पूरी पृथ्वी की काल गणना की जाती है।
उज्जैन का महाकाल[/caption]
जब दूषण नामक राक्षस ने आक्रमण किया था। दैत्य के इस आक्रमण से महाकाल ने भक्तों की रक्षा की थी। इसके पीछे राक्षस की राख से अपना श्रृंगार किया और हमेशा के लिए वहीं बस गए। तभी से उज्जैन में भस्म आरती की परंपरा आने लगी है।महाकालेश्वर मंदिर में आरती के समय कपाट बंद हो जाते हैं और केवल मंदिर के पुजारी ही बाबा का शृंगार करते हैं। आजकल बंद कमरे में आरती की पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड भी किया जाता है। महाकाल की भस्म आरती का समय ब्रह्म महूर्त में सूर्योदय से 2 घंटे पहले और शाम को आरती का समय 6.30 से 7 बजे तक ईव आरती की जाती है।