
साल था 1989 का भागलपुर दंगा बिहार के इतिहास का सबसे खौफनाक और भयावह अध्याय था। 250 से अधिक गांव राख के ढेर बन गए और 1,800 से ज्यादा जिंदगियां खत्म हो गईं। 36 साल गुजर चुके हैं, फिर भी उस नरसंहार की आग में जलती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की चीखें आज भी उस मिट्टी में गूंजती हैं। पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला, और राजनीतिक गलियारों में कभी-कभी ही उन भयानक घटनाओं का ज़िक्र होता है। Bhagalpur Riots 1989
बिहार की आपराधिक कथा में आज हम ले चलते हैं आपको उस हिस्से की ओर, जब प्रदेश ने स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा देखा। यह वही धरती थी, जो न सिर्फ जातीय संघर्षों बल्कि साम्प्रदायिक हिंसा के कारण भी लाल हो गई। यह कहानी सिर्फ हिंसा की नहीं, बल्कि उस नफरत की है, जिसने इंसानियत को झुलसा दिया। और यह कहानी शुरू होती है उस समय से, जब देश भर में राम मंदिर आंदोलन की आग जोरों पर थी और भागलपुर की गलियां इसी ज्वाला की लपटों में समाने वाली थीं। Bhagalpur Riots 1989
1989 का भारत राम मंदिर आंदोलन की आग में झुलस रहा था, और उसी आग की लपटें 24 अक्टूबर की सुबह भागलपुर तक पहुंच चुकी थीं। शहर की गलियां घंटियों की खनक और ‘जय श्रीराम’ के नारे से गूंज रही थीं, पर हवा में न सिर्फ उत्सव की खुशबू बल्कि एक अजीब सी डर और बारूद की गंध भी थी। कोई नहीं जानता था कि कुछ ही घंटे बाद यह शहर नफरत और हिंसा की सबसे काली दास्तान में बदल जाएगा। दो दिन पहले फतेहपुर गांव में दोनों समुदायों के बीच तनाव की चिंगारी पहले ही फूट चुकी थी। धमकियां, नारे और प्रतिशोध की सरगर्मी ने माहौल जहरिला बना दिया था — और प्रशासन की चुप्पी ने इस जहर को बिना रोके फैलने दिया। वही चुप्पी, कुछ ही घंटों में पूरे शहर को खून की नदी में बदल देने वाली थी। Bhagalpur Riots 1989
24 अक्टूबर को तातारपुर इलाके में निकले एक जुलूस पर कथित पत्थरबाजी ने उस दिन की शांति को हमेशा के लिए तोड़ दिया। देखते ही देखते पूरा शहर आग की लपटों में घिर गया। यह कोई अचानक भड़का दंगा नहीं था, बल्कि पहले से तैयार की गई योजनाओं का हिस्सा था। अतिवादी समूहों ने पहले ही सूचियां बना रखी थीं — “कौन जिंदा रहेगा, कौन मरेगा।” तातारपुर की चिंगारी ने धीरे-धीरे पूरे जिले को लहूलुहान कर दिया। गांव-गांव आग की आगोश में समा गए, और अल्पसंख्यक बस्तियां नरसंहार का केंद्र बन गईं। उस आग ने न केवल घरों और खेतों को भस्म किया, बल्कि हर इंसान के भीतर डर और यकीन की डोर को भी झुलसा दिया। Bhagalpur Riots 1989
कहते हैं, उस भयावह समय में पुलिस और प्रशासन जैसे कहीं गायब हो गए थे। गांवों में माताएं अपने बच्चों को सीने से लगाकर भाग रही थीं, लेकिन नफरत से अंधी भीड़ किसी को बख्शने को तैयार नहीं थी। बच्चों को बेरहमी से दो हिस्सों में काट दिया गया, महिलाओं को दरिंदगी का शिकार बनाया गया, और बुजुर्गों को जिंदा जला दिया गया। तालाबों में, कुओं में और खेतों में लाशें फेंक दी गईं — ताकि कोई निशान न बचे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नरसंहार में 1,874 लोग मारे गए, जिनमें 97% मुसलमान थे। 80,000 से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो गए। भागलपुर की धरती उस समय सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि एक विशाल सामूहिक कब्रगाह बन चुकी थी जहां हर कदम पर इंसानियत का रक्त बह रहा था।
27 अक्टूबर 1989, लोगाई गांव वह दिन जब 116 मुसलमानों को बेरहमी से चुन-चुनकर मारा गया। उनकी लाशें खेतों में दफना दी गईं, और ऊपर से फूलगोभी की फसल बो दी गई, ताकि कोई निशान न रहे। जब सालों बाद जांच के दौरान खेत खोदे गए, तो मिट्टी के नीचे मानव कंकालों की लंबी कतारें उजागर हुईं। उस खौफनाक मंजर को देखकर अफसरों की रूह तक कांप उठी। लोगाई की मिट्टी, उस दिन के खून और दर्द से अब भी चीख रही थी एक ऐसी आवाज़ जो इतिहास को झकझोरती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लोगाई गांव की जमीला उस सुबह अपने चूल्हे पर रोटी सेंक रही थीं। उनके दो छोटे बच्चे भूख से रो रहे थे, तभी उनके पति मुर्तज़ा दौड़ते हुए घर में आए और बोले — “भागो, अब वक्त खत्म हो गया है।” जमीला घबरा गई, लेकिन उसने बच्चों को गोद में उठाया और बिना पीछे मुड़े वहां से भाग निकली। वह दंगों की आग से तो बच गई, लेकिन उनके रिश्तेदार, पड़ोसी और घर के सभी लोग उस दिन खौफनाक हिंसा में लुप्त हो गए। भीड़ ने महिलाओं के जिस्म नोंच डाले, मासूम बच्चों की जान ले ली और बुजुर्गों की सांसें छीन लीं।
दंगे के कई गवाहों और चश्मदीदों का कहना था कि पुलिस केवल मूकदर्शक ही नहीं थी, बल्कि कई जगहों पर वह दंगाईयों की मददगार भी बनी। कुछ इलाकों में तो पुलिस ने हमलावरों को खुले रास्ते तक दिखाए। जब हिंसा चरम पर थी, कानून और प्रशासन कहीं नजर नहीं आए। आखिरकार सेना को बुलाया गया, लेकिन तब तक सब कुछ पहले ही खत्म हो चुका था। जिला प्रशासन और पुलिस के कुछ अफसरों ने यहां तक कि बीएसएफ और सेना को भी गुमराह किया। यह वही बिहार था, जहां उस समय कांग्रेस की सरकार थी और सत्येंद्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे लेकिन उनके कान और आंखें उस भयावह घटना के समय बंद थीं। Bhagalpur Riots 1989
सच की परछाईं कभी छुप नहीं सकती। देर से ही सही, लेकिन वह आखिरकार उजागर हो ही जाती है। भागलपुर दंगों के मामले में भी यही हुआ। धीरे-धीरे उस नरसंहार के असली मास्टरमाइंड, कामेश्वर यादव, का चेहरा सामने आया। कहते हैं कि उसके पास 200 पहलवानों की निजी फौज थी, और वही पूरे दंगों का मुख्य सूत्रधार था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उसने करीब 1,200 मुसलमानों की हत्या करवाई। दंगे के दौरान उसकी फौज की तलवारें चमक रही थीं और भीड़ उसकी जय-जयकार कर रही थी। खुद को बिहार का सबसे बड़ा हिंदू नेता कहने वाला यह व्यक्ति, दरअसल निर्दोषों के खून में लथपथ था। उस दिन उसकी सत्ता और क्रूरता ने भागलपुर को नर्क में बदल दिया।
भागलपुर दंगों की खबरें अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ चुकी थीं। राजनीतिक पटल बदल गया — कांग्रेस गई, जनता दल की सरकार आई, और लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन पीड़ितों के लिए इंसाफ अब भी सिर्फ एक अधूरा सपना था। दंगों के मुख्य दोषी खुलेआम घूमते रहे, कई राजनीतिक मंचों पर सम्मानित किए गए। वहीं, जिनके घर जला दिए गए थे, वे राहत शिविरों में ठंड और भूख से जूझते रहे। जिनके बच्चे हिंसा में मारे गए, उनकी माताएं आज भी ज़िंदा लाशों की तरह दर्द और स्मृतियों के बोझ तले जी रही हैं। उस समय का भयावह दृश्य आज भी बिहार की मिट्टी में गूंजता है।
2005 में जब नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार की कमान संभाली, तो दंगों के पीड़ितों के लिए नई उम्मीद जगी। इसी क्रम में जस्टिस एन.ए. सिंह आयोग का गठन किया गया। 2007 में लोगाई गांव के नरसंहार के 14 दोषियों को सजा मिली, पीड़ितों को मुआवजा और पेंशन देने की प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन उस गांव की मिट्टी में दबी 116 निर्दोषों की लाशें आज भी चीखती हैं — जैसे कह रही हों, “इंसाफ अभी अधूरा है।” न्याय की यह अधूरी कहानी आज भी भागलपुर की धरती पर गूंजती है। Bhagalpur Riots 1989