
बिहार में अगले कुछ दिनों में बिहार विधानसभा के चुनाव होने है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बिहार की सियासत एक बार फिर जातीय गणित के ताने-बाने में उलझी दिखाई दे रही है। इसी बीच समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव बिहार की धरती पर कदम रखने वाले हैं । उत्तर प्रदेश में अपनी ‘PDA’ (पिछड़ा–दलित–अल्पसंख्यक) रणनीति से नया राजनीतिक समीकरण गढ़ने वाले अखिलेश यादव अब उसी प्रयोग को बिहार में आजमाना चाहते हैं। Bihar Election
लेकिन यहां सवाल बड़ा है क्या तेजस्वी यादव का पुराना ‘MY’ (मुस्लिम–यादव) फार्मूला अब भी उतना असरदार है जितना लालू यादव के दौर में था, या फिर यह समीकरण महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी बनता जा रहा है? बिहार की बदलती सामाजिक बिसात पर MY की पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है, जबकि PDA की समावेशी राजनीति धीरे-धीरे अपने पंख फैला रही है। Bihar Election
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने पूरे जोश के साथ ‘MY-BAAP’ (मुस्लिम यादव, बहुजन अगड़ा आधी आबादी पूअर) का नारा उछाला था मानो वे राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण गढ़ने निकले हों। लेकिन सीट बंटवारे के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने इस नारे की चमक फीकी कर दी। आरजेडी की लिस्ट में 51 यादव (करीब 36%) और 18 मुस्लिम (12%) उम्मीदवारों को टिकट मिला यानी लगभग 48% टिकट सिर्फ MY वर्ग के खाते में। आबादी के अनुपात से यह प्रतिनिधित्व ढाई गुना ज्यादा है। जाहिर है, जब कोई एक वर्ग इतना हावी दिखेगा तो बाकी नाराज होंगे ही। नतीजा यह कि EBC (27%), दलित (16%) और सवर्ण (15%) वोटरों में असंतोष खुलकर झलक रहा है।
इसके उलट अखिलेश यादव का ‘PDA मॉडल’ एक सामाजिक समरसता का संतुलित ब्लूप्रिंट साबित हुआ। यूपी में अखिलेश ने सिर्फ पिछड़ों और दलितों तक सीमित न रहकर सवर्णों को भी राजनीतिक हिस्सेदारी दी यही उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक बढ़त रही। समाजवादी पार्टी ने गैर-यादव OBC को 30% से अधिक टिकट देकर बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में सीधी सेंध लगा दी। यही समावेशी राजनीति अखिलेश को “यादव पार्टी” की छवि से बाहर लेकर आई।
बिहार में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ इसी PDA फार्मूले को तेजस्वी के MY मॉडल में मिलाने की कोशिश थी, लेकिन मामला वहीं अटक गया क्योंकि RJD की राजनीति आज भी उसी पुराने “मुस्लिम–यादव” ढांचे में जकड़ी हुई है। नतीजा यह कि PDA जैसा विस्तृत और समावेशी सामाजिक गठजोड़, बिहार में जमीन नहीं पकड़ सका।
तेजस्वी यादव आज वही गलती दोहरा रहे हैं, जिससे अखिलेश यादव ने 2024 में खुद को बड़ी मुश्किल से निकाला था जातीय घेरे में कैद राजनीति की गलती। अखिलेश ने जब लोकसभा चुनाव में सिर्फ 5 यादव उम्मीदवार उतारे, तो उन्होंने जनता को यह साफ संदेश दिया कि “समाजवादी पार्टी अब केवल यादवों की नहीं, सबकी पार्टी है। यही कदम उनकी छवि बदलने का टर्निंग पॉइंट बना। इसके उलट, तेजस्वी ने 36% टिकट यादवों को देकर वही पुराना डर फिर जगा दिया “जंगलराज की वापसी” का डर, जो बिहार की राजनीति में दशकों से RJD के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार रहा है।
भाजपा ने हमेशा इसी भय को भुनाया है, और अब तेजस्वी की रणनीति ने मानो उन्हें फिर वही मौका दे दिया है। सियासी पंडित मानते हैं कि यह निर्णय RJD को कोर वोट बैंक तक सीमित कर सकता है और महागठबंधन के लिए एक बार फिर विस्तार के रास्ते बंद कर सकता है।
बिहार की सियासी बिसात पर EBC (कुशवाहा, कुर्मी, धानुक) वह वर्ग है, जो आज सत्ता की दिशा तय करने की क्षमता रखता है। आबादी में लगभग 27% हिस्सेदारी रखने वाला यह तबका नीतीश कुमार का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक माना जाता है। बावजूद इसके, आरजेडी ने इन समुदायों को सिर्फ 15–18 टिकट देकर बड़ा राजनीतिक जोखिम उठा लिया है। उदाहरण के लिए, गोपालगंज जैसे कुशवाहा बहुल क्षेत्र में यादव उम्मीदवार और सीवान जैसे धानुक प्रभाव वाले इलाके में मुस्लिम प्रत्याशी उतारना, पार्टी की सामाजिक समझ पर सवाल खड़े करता है। इसी तरह दलित (16%) और पासी (5%) समुदाय को भी लगभग प्रतीकात्मक हिस्सेदारी देकर आरजेडी ने वही गलती दोहराई है, जिससे उसके विस्तार की संभावनाएं सिमट रही हैं। Bihar Election
इसके विपरीत, अखिलेश यादव ने 2024 में इन्हीं वंचित तबकों को 22% टिकट देकर बसपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगा दी थी और समावेशी राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी थी। यही फर्क दोनों नेताओं की रणनीति में दिखता है अखिलेश आगे बढ़ रहे हैं, तेजस्वी ठहरे हुए हैं। लालू यादव के दौर का MY फार्मूला अब बिहार की बदलती सामाजिक संरचना में पुराना पड़ चुका है। राजनीति अब उस दौर से आगे निकल चुकी है, जहां सिर्फ ‘माई’ के सहारे सत्ता मिलती थी। अगर तेजस्वी वास्तव में नया राजनीतिक अध्याय लिखना चाहते हैं, तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि अब बिहार में जीत का रास्ता सिर्फ जाति से नहीं, साझा प्रतिनिधित्व और समावेशी राजनीति से होकर गुजरता है। Bihar Election