
बिहार की सियासत में महज चार फीसदी वोटों ने तेजस्वी यादव को सत्ता के दरवाज़े तक पहुंचाकर रोक दिया था। अब पाँच साल बाद वही तेजस्वी उस अधूरे सफ़र को मुकाम तक पहुंचाने के लिए यूपी के अखिलेश यादव की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ रणनीति को अपना सियासी ब्रह्मास्त्र बना चुके हैं। अखिलेश की तरह यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ गैर-यादव पिछड़ों को जोड़ने का यह प्रयोग क्या बिहार की राजनीति में भी करिश्मा दिखा पाएगा? यह वही इम्तिहान है जो तय करेगा कि 20 साल का सत्ता वनवास खत्म होगा या नहीं। Bihar Assembly Elections 2025
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘एम-वाई प्लस गैर-यादव ओबीसी’ के सटीक गणित से बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी। मुस्लिम-यादव वोटबैंक को मज़बूती से थामे रखते हुए उन्होंने पिछड़े वर्गों में नई सेंध लगाई और यही रणनीति अब तेजस्वी यादव ने बिहार के रण में उतारी है। महागठबंधन ने तेजस्वी को सीएम का चेहरा और मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम पद का उम्मीदवार बनाकर सामाजिक साझेदारी का एक नया सियासी मॉडल पेश किया है। सहनी के ज़रिए मल्लाह, निषाद और अत्यंत पिछड़ी जातियों को साधने की कोशिश की जा रही है यानी बिहार में ‘सोशल इंजीनियरिंग 2.0’ की शुरुआत हो चुकी है। Bihar Assembly Elections 2025
बिहार की सियासत में जातीय समीकरणों का गणित जितना पेचीदा है, उतना ही असरदार भी। तेजस्वी यादव जहां राज्य की सबसे बड़ी आबादी करीब 15 फ़ीसदी यादव वोटबैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं मुकेश सहनी मल्लाह समाज (करीब 5.5%) के ऐसे नेता हैं, जिन्होंने खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ के रूप में स्थापित कर एक ठोस जनाधार तैयार किया है। सहनी लंबे समय से अपनी जाति को अनुसूचित वर्ग में शामिल कराने की मांग उठाकर सामाजिक रूप से सक्रिय रहे हैं। महागठबंधन की रणनीति भी इसी पर टिकी है यादव वोटों को एकजुट रखना और सहनी के जरिए एनडीए के परंपरागत निषाद वोट बैंक में सेंध लगाना। राज्य की लगभग 70 सीटों पर यादव और 30 सीटों पर निषाद समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं, ऐसे में तेजस्वी-सहनी की जोड़ी महागठबंधन की सियासी रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बन गई है।
बिहार की सियासत में यादवों के बाद अगर किसी जाति का सबसे गहरा राजनीतिक प्रभाव है, तो वह कुशवाहा या कोइरी समुदाय का है। करीब 4.2 फ़ीसदी आबादी वाला यह वर्ग लगभग 25 विधानसभा सीटों पर जीत-हार का फैसला करता है। यही वह वोटबैंक है, जिसने कभी नीतीश कुमार को दो दशक तक सत्ता की कुर्सी पर टिकाए रखा, लेकिन अब वह पकड़ ढीली पड़ती नज़र आ रही है। तेजस्वी यादव ने इस सियासी रिक्ति को तुरंत भांप लिया है। उन्होंने इस चुनाव में कुशवाहा समाज से एक दर्जन से ज़्यादा उम्मीदवार उतारकर साफ संदेश दिया है कि अब उनकी राजनीति ‘यादव से आगे’ बढ़ने को तैयार है। यह वही रास्ता है, जिस पर चलकर अखिलेश यादव ने यूपी में बीजेपी के समीकरणों को चुनौती दी थी।
महागठबंधन ने इस बार उम्मीदवारों के चयन में जातीय संतुलन और सामाजिक समीकरण की बारीकी से सर्जरी की है। आरजेडी, कांग्रेस, मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी, वामदल और सीपीआई (माले) सभी ने अपने-अपने कोर वोटबैंक को साधने पर फोकस रखा है। आरजेडी ने जिन 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें 51 यादव, 19 मुस्लिम, 16 कुशवाहा, 4 निषाद और 3 धानुक प्रत्याशी शामिल हैं। कांग्रेस ने भी अपने 61 उम्मीदवारों में 21 सवर्ण, 11 दलित, 7 अति पिछड़ी जातियों और 3 कुशवाहा नेताओं को टिकट देकर ‘सबको साथ’ का संतुलन साधा है। Bihar Assembly Elections 2025
वहीं, वीआईपी पार्टी ने 15 में से 5 निषाद प्रत्याशी मैदान में उतारकर अपने पारंपरिक वोटबैंक को मज़बूत करने की कोशिश की है। वामपंथी दलों ने तो ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के सिद्धांत पर अपने उम्मीदवार चुने हैं। कुल मिलाकर, यह गठबंधन बिहार की सामाजिक बहुलता 63% पिछड़ी-अति पिछड़ी, 19.6% दलित और 17.7% मुस्लिम आबादी को एक सियासी एकजुटता में बदलने की कोशिश करता दिख रहा है। Bihar Assembly Elections 2025
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को 41% और महागठबंधन को 37% वोट मिले थे यानी महज चार फ़ीसदी का फ़ासला, जिसने तेजस्वी यादव को सत्ता की चौखट पर रोक दिया। पाँच साल बाद तेजस्वी उसी अंतर को मिटाने के लिए तीन सटीक सियासी तीर चला चुके हैं। पहला मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम उम्मीदवार बनाकर मल्लाह और निषाद वोटबैंक को साधना, दूसरा कुशवाहा समुदाय को टिकट देकर जेडीयू-बीजेपी के ओबीसी गढ़ में सेंध लगाना, और तीसरा—अति पिछड़े वर्गों को गठबंधन सहयोगियों के जरिए अपने साथ जोड़ना। महागठबंधन की रणनीति स्पष्ट है अगर वे एनडीए के महज़ 5 से 10 प्रतिशत ओबीसी वोट अपनी ओर खींचने में कामयाब हो गए, तो बिहार का सत्ता समीकरण पूरी तरह उलट सकता है। Bihar Assembly Elections 2025
यूपी में अखिलेश यादव ने जिस सोशल इंजीनियरिंग से बीजेपी की बढ़त को चुनौती दी, तेजस्वी अब उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यूपी में लड़ाई सत्ता को चुनौती देने की थी, जबकि बिहार में तेजस्वी के लिए यह सत्ता की पुनर्प्राप्ति की लड़ाई है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘अखिलेश फॉर्मूला’ बिहार की ज़मीन पर भी उतना ही कारगर साबित होगा जितना यूपी में हुआ था — या फिर यह सिर्फ एक सियासी प्रयोग बनकर रह जाएगा। Bihar Assembly Elections 2025