
बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर है। 2020 में सत्ता के दरवाजे तक पहुंचकर चुक गए तेजस्वी यादव इस बार हर हाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का सपना देख रहे हैं। मगर सवाल ये है कि क्या बिना ‘ट्रिपल एम फैक्टर’ यानी मुस्लिम, महिला और मोस्ट बैकवर्ड वोटर्स को साधे, उनका यह सपना पूरा हो पाएगा? बीस वर्षों से आरजेडी सत्ता से बाहर है और उसकी वापसी की जिम्मेदारी अब पूरी तरह तेजस्वी यादव के कंधों पर है। वे इस बार वही गलती नहीं दोहराना चाहते, जो 2020 में सत्ता की दहलीज पर पहुंचकर रह गए थे। Bihar Election
उनके सामने चुनौती है उस ‘ट्रिपल एम’ समीकरण को अपने पक्ष में मोड़ने की, जिसने दो दशकों से बिहार के सियासी तख़्त पर नीतीश कुमार को टिकाए रखा है। 2025 का विधानसभा चुनाव दरअसल एनडीए बनाम महागठबंधन की जंग बनता जा रहा है, लेकिन जन सुराज और एआईएमआईएम जैसे दल इस मुकाबले को त्रिकोणीय स्वरूप देने में जुटे हैं। ऐसे में हर वोटबैंक की अपनी अहमियत है और बिहार का ‘ट्रिपल एम फैक्टर’ सत्ता की चाबी बन चुका है। Bihar Election
बिहार की सियासत में मुस्लिम वोटरों की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। लगभग 18% मुस्लिम आबादी वाला यह वर्ग किसी भी दल का सियासी गणित एक झटके में बदलने की ताकत रखता है। राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता हार-जीत की तस्वीर तय करते हैं। अब तक यह वोटबैंक पारंपरिक रूप से आरजेडी का मजबूत आधार माना जाता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इस एकता में दरार डालने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। Bihar Election
असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और प्रशांत किशोर की जन सुराज सीमांचल के रास्ते इस वोट बैंक में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में हैं और यही चुनौती अब तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। तेजस्वी ने हाल ही में वक्फ़ कानून पर जो टिप्पणी की, उसे सीमांचल में मुस्लिमों को साधने की रणनीति के तौर पर देखा गया। वहीं, महागठबंधन ने भी संकेत दिया है कि सत्ता में आने पर मुस्लिम समुदाय से एक डिप्टी सीएम नियुक्त किया जा सकता है ताकि यह संदेश जाए कि महागठबंधन ही मुस्लिम समाज की सियासी आवाज है। Bihar Election
पिछले दो दशकों में बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ अगर कोई रहा है, तो वह है महिला मतदाता। यही वह वर्ग है जिसने नीतीश कुमार को बीस साल से सत्ता के सिंहासन पर बनाए रखा। आंकड़े बताते हैं कि बिहार की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है, और वोट डालने के मामले में वे पुरुषों से आगे निकल चुकी हैं यही वजह है कि अब हर राजनीतिक दल के लिए महिला वोट ‘निर्णायक समीकरण’ बन चुका है। नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी दोनों ही इस सच्चाई को भलीभांति समझते हैं। ‘मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना’ से लेकर ‘हर महिला के खाते में 10 हजार रुपये’ तक एनडीए ने महिलाओं को सीधे लाभ पहुंचाने वाली कई योजनाएं चलाई हैं। इस सियासी ‘महिला मोर्चे’ ने ही नीतीश को लंबे समय तक सत्ता में टिकाए रखा।
लेकिन अब तेजस्वी यादव उसी किले पर चोट करने की रणनीति में हैं। उन्होंने महिलाओं को लुभाने के लिए बड़े और ठोस वादों की झड़ी लगा दी है जिसमें 1.32 करोड़ जीविका दीदियों को ₹30 हजार मासिक मानदेय, ₹5 लाख का बीमा, और ₹2 हजार रुपये भत्ता देने की घोषणा शामिल है। साथ ही, महिलाओं को ₹2500 मासिक पेंशन देने का वादा भी किया गया है। यह साफ संकेत है कि आरजेडी अब सिर्फ़ परंपरागत वोटबैंक पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि महिला सशक्तिकरण को अपनी सियासी धुरी बनाकर नीतीश के सबसे मज़बूत वोट आधार में सेंध लगाने की तैयारी में है।
बिहार की सियासत में अगर किसी वर्ग ने सत्ता की दिशा और दशा तय की है, तो वह है मोस्ट बैकवर्ड कम्युनिटी (MBC)। करीब 36 प्रतिशत आबादी वाला यह तबका बिहार का सबसे बड़ा सामाजिक समूह है, जिसमें 114 से अधिक जातियां शामिल हैं केवट, मांझी, कुम्हार, लोहार, नाई, कहार, राजभर, सुनार और धानुक जैसी मेहनतकश जातियां, जो राजनीति में अक्सर निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। इन्हीं जातियों के सहारे नीतीश कुमार ने दो दशक तक सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी, लेकिन अब इस वर्ग में हलचल है और असंतोष के संकेत साफ दिखने लगे हैं। इस बदलते मिज़ाज को भांपते हुए तेजस्वी यादव ने निषाद समाज से आने वाले मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है कि अब आरजेडी भी अति पिछड़ों के भरोसे सत्ता का नया समीकरण लिखना चाहती है।
तेजस्वी ने इन मेहनतकश समुदायों के लिए 5 लाख रुपये का ब्याज-मुक्त ऋण देने का वादा किया है, ताकि वे अपना स्वरोज़गार शुरू कर सकें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें। इसमें नाई, कुम्हार, लोहार, बढ़ई, माली और मोची जैसी पारंपरिक जातियों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। वहीं, राहुल गांधी ने भी इस रणनीति को आगे बढ़ाते हुए अति पिछड़ों के लिए अलग घोषणापत्र लाने की तैयारी शुरू की है। साफ है आने वाले चुनाव में ‘मोस्ट बैकवर्ड फैक्टर’ ही बिहार की सत्ता की असली चाबी बनने जा रहा है।
बिहार की सियासत का खेल अब साफ़-साफ़ तीन मोर्चों पर टिका है मुस्लिम वोट बैंक, महिला मतदाता और मोस्ट बैकवर्ड कम्युनिटी (MBC)। अगर यह तिकड़ी एक सुर में तेजस्वी यादव के साथ खड़ी हो गई, तो सत्ता की चाबी सीधे आरजेडी के हाथ में जा सकती है। लेकिन इस समीकरण का जरा-सा भी हिस्सा डगमगाया, तो नीतीश कुमार और एनडीए एक बार फिर मजबूत वापसी कर सकते हैं। Bihar Election
तेजस्वी के लिए यह सिर्फ एक चुनावी जंग नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता की निर्णायक परीक्षा है वही परीक्षा, जो यह तय करेगी कि क्या वे वाकई अपने पिता लालू प्रसाद यादव की अधूरी विरासत को पूरा करने में कामयाब होंगे, या फिर बिहार की राजनीति में ‘परिवर्तन’ का सपना एक बार फिर अधूरा रह जाएगा। इस चुनाव में मुद्दे भले कई हों, लेकिन असली लड़ाई वोट बैंक की ‘त्रिमूर्ति’ को साधने की है और जो इसे जीत लेगा, वही बिहार की गद्दी पर बैठेगा। Bihar Election