
चुनावी शंखनाद से पहले बिहार की राजनीति में एक नई हलचल शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में सरकारी शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में 'डोमिसाइल नीति' को फिर से लागू करने का ऐलान कर, न केवल युवाओं को बड़ा संदेश दिया है बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र एक सोचा-समझा सियासी दांव भी चला है। TRE 4 और 5 के तहत होने वाली शिक्षक भर्ती में अब केवल बिहार के स्थायी निवासी ही पात्र माने जाएंगे। मुख्यमंत्री ने X (पूर्व में ट्विटर) पर स्पष्ट किया कि शिक्षा विभाग को नियमों में संशोधन कर स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है। Bihar Assembly Election 2025
डोमिसाइल नीति का अर्थ है – किसी राज्य की नौकरियों में स्थानीय निवासियों को प्राथमिकता देना। इसका उद्देश्य बाहरी प्रतियोगियों की भागीदारी सीमित कर, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना है।
इस नीति के तहत:
वही अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हो सकेंगे जो बिहार के स्थायी निवासी हैं।
वैध डोमिसाइल प्रमाणपत्र अनिवार्य होगा।
नीति के दायरे में वे अभ्यर्थी भी आएंगे जिनके अभिभावक राज्य के निवासी हों, अथवा विवाह के उपरांत महिलाएं जो पति की स्थायी निवास पर आधारित पात्रता रखती हों।
नीतीश कुमार के इस ऐलान ने बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने कटाक्ष किया, “हमारी ही नीतियों की कॉपी कर रहे हैं। जल्द ही हमारी 'माई-बहन-मान' योजना को भी लागू करेंगे। इनके पास कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है।” वहीं, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इसे "जनता की जीत" बताया, पर साथ ही आरोप लगाया कि “नीतीश ने 20 वर्षों में छात्रों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया। जब कुर्सी खिसकती दिखी, तब यह निर्णय लिया।
इसके उलट, जदयू और भाजपा ने फैसले को ऐतिहासिक करार दिया। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, "हमने युवाओं के हित में यह बड़ा फैसला लिया है। विपक्ष को पहले अपनी मंशा स्पष्ट करनी चाहिए। भाजपा प्रवक्ता प्रभाकर मिश्रा ने इसे "स्थानीय युवाओं के भविष्य को मजबूत करने वाला कदम" बताया।
डोमिसाइल नीति बिहार के लिए कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ने यह वादा किया था। कुछ समय के लिए नीति लागू भी हुई, लेकिन 2023 में इसे यह कहकर हटा लिया गया कि गणित और विज्ञान के विषयों के लिए योग्य शिक्षक नहीं मिल पा रहे थे। नीति हटने के बाद राज्यभर में छात्रों का व्यापक विरोध हुआ। 'वोट दे बिहारी, नौकरी ले बाहरी' जैसे नारों ने नीतीश सरकार को असहज स्थिति में ला दिया। अब, एक बार फिर उसी नीति की वापसी चुनावी पृष्ठभूमि में हो रही है।
उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों से हर साल बड़ी संख्या में अभ्यर्थी बिहार की परीक्षाओं में शामिल होते थे।
इससे स्थानीय युवाओं को नौकरियों में पिछड़ना पड़ता था।
शिक्षकों के लिए स्थानीय भाषा और बोली की समझ जरूरी होती है, जो बाहरी अभ्यर्थियों में सीमित पाई जाती है।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में डोमिसाइल नीति पहले से लागू है, ऐसे में बिहार में इसे लागू करना तार्किक और आवश्यक था।
बिहार के लाखों स्थानीय युवाओं को सीधे फायदा मिलेगा।
सरकारी नौकरी की प्रतिस्पर्धा में संतुलन आएगा।
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की संभावना है क्योंकि स्थानीय शिक्षक सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से अधिक जुड़े होंगे।
हालांकि, डोमिसाइल लागू होना शिक्षा व्यवस्था का समाधान नहीं है। भर्ती की पारदर्शिता, पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, और शिक्षकों का प्रशिक्षण जैसे पहलुओं पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है। Bihar Assembly Election 2025