Budget 2026 से टैक्सपेयर्स को बड़ी राहत की उम्मीद है। इस बार जॉइंट टैक्स फाइलिंग, सीनियर सिटिज़न्स के लिए छूट, मेडिकल खर्च और गिफ्ट टैक्स की लिमिट बढ़ने की संभावना है। 12 लाख तक की आय टैक्स-फ्री है लेकिन कैपिटल गेन और परिवार के अंदर संपत्ति बंटवारे में क्लैरिटी की जरूरत है।

केंद्रीय बजट 2026 आज पेश होने जा रहा है और इस बार टैक्सपेयर्स की उम्मीदें सिर्फ टैक्स स्लैब तक सीमित नहीं हैं। पिछले बजट में सरकार ने 12 लाख रुपये तक की आय को लगभग टैक्स-फ्री कर मिडिल क्लास को बड़ी राहत दी थी। उस फैसले से लोगों के हाथ में खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा आया लेकिन इसके बावजूद टैक्स सिस्टम की कुछ ऐसी कमियां अब भी रह गईं जो परिवारों, बुजुर्गों और छोटे निवेशकों को परेशान करती हैं। अब उम्मीद की जा रही है कि बजट 2026 में सरकार इन बारीक लेकिन अहम मुद्दों पर साफ और व्यावहारिक फैसले लेगी।
सीए डॉ. सुरेश सुराणा के मुताबिक, बजट लोगों की खर्च करने की क्षमता और फाइनेंशियल फैसलों पर सीधा असर डालता है खासकर तब जब टैक्स के दायरे में आने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब बड़े ऐलानों से आगे बढ़कर टैक्स सिस्टम को ज्यादा सरल, स्पष्ट और न्यायसंगत बनाया जाए।
भारत में इनकम टैक्स सिस्टम पूरी तरह व्यक्ति आधारित है जबकि हकीकत में परिवार का खर्च और बचत अक्सर पति-पत्नी मिलकर संभालते हैं। डॉ. सुराणा का कहना है कि सिंगल इनकम या असमान आय वाले परिवारों पर इसका अतिरिक्त टैक्स बोझ पड़ता है। अगर अलग-अलग फाइलिंग को डिफॉल्ट रखते हुए एक वैकल्पिक जॉइंट टैक्सेशन सिस्टम दिया जाए तो शादीशुदा जोड़ों को टैक्स प्लानिंग में आसानी होगी। कई देशों में परिवार को एक आर्थिक इकाई माना जाता है और भारत में भी ऐसा विकल्प फायदेमंद साबित हो सकता है।
पिछले बजट में सीनियर सिटिजन्स के लिए ब्याज आय पर TDS न कटने की सीमा बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दी गई थी। लेकिन सेक्शन 80TTB के तहत मिलने वाली टैक्स छूट अब भी सिर्फ 50 हजार रुपये तक सीमित है। डॉ. सुराणा के मुताबिक, इस अंतर की वजह से बुजुर्गों को बेवजह टैक्स और कागजी झंझट झेलनी पड़ती है। उनकी मांग है कि 80TTB की सीमा भी बढ़ाकर 1 लाख रुपये की जाए।
इलाज का खर्च पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है, लेकिन टैक्स में मिलने वाली छूट उसी रफ्तार से नहीं बढ़ी। अभी सेक्शन 80D के तहत बिना हेल्थ इंश्योरेंस वाले सीनियर सिटिज़न्स ही 50 हजार रुपये तक का मेडिकल खर्च क्लेम कर सकते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सुविधा बाकी टैक्सपेयर्स को भी मिलनी चाहिए, लिमिट 1 लाख रुपये की जाए और नई टैक्स रिजीम में भी 80D का फायदा दिया जाए।
नॉन-रिलेटिव से मिले गिफ्ट पर टैक्स छूट की सीमा 50 हजार रुपये है जो साल 2006 से नहीं बदली गई है। महंगाई को देखते हुए टैक्स एक्सपर्ट्स इसे बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये करने की मांग कर रहे हैं ताकि छोटे और असली गिफ्ट्स पर टैक्स का बोझ न पड़े।
परिवार के अंदर संपत्ति के बंटवारे को लेकर अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि इस पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगना चाहिए लेकिन कानून में इसका साफ उल्लेख न होने की वजह से विवाद पैदा होते हैं। मांग है कि इसे इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 47 में साफ तौर पर शामिल किया जाए ताकि अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचा जा सके।
फिलहाल लेट इनकम टैक्स रिटर्न 31 दिसंबर तक ही फाइल की जा सकती है। अगर इसकी समयसीमा 31 मार्च तक बढ़ा दी जाए तो टैक्सपेयर्स को राहत मिलेगी और स्वैच्छिक अनुपालन भी बढ़ेगा। हालांकि 12 लाख रुपये तक की आय पर टैक्स नहीं लगता लेकिन सेक्शन 87A की रिबेट इक्विटी कैपिटल गेन पर लागू नहीं होती। इस वजह से छोटे निवेशकों को टैक्स देना पड़ता है। मांग है कि तय सीमा तक कैपिटल गेन को भी रिबेट के दायरे में लाया जाए।
पिछले साल की बड़ी टैक्स राहत के बाद अब उम्मीद है कि बजट 2026 में टैक्स सिस्टम को और आसान, साफ और व्यावहारिक बनाया जाएगा। जैसा कि डॉ. सुरेश सुराणा कहते हैं बड़ी राहत के बाद अगला जरूरी कदम उन खामियों को दूर करना है जो आज भी टैक्सपेयर्स को परेशान करती हैं। इससे न सिर्फ लोगों को फायदा होगा बल्कि टैक्स सिस्टम पर भरोसा भी मजबूत होगा।