चिली में खदान हड़ताल और घटती सप्लाई के कारण तांबे की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। जानिए कॉपर प्राइस बढ़ने की वजह, ग्लोबल असर और भारत में ताजा भाव।

इस समय दुनिया के कमोडिटी बाजार में तांबा ने सुर्खियों बटोरी है। चिली की एक बड़ी खदान में हड़ताल, गोदामों में घटते स्टॉक और आने वाले वर्षों में सप्लाई की भारी कमी की आशंका ने तांबे की कीमतों को रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। हालात ऐसे हैं कि तांबे ने पहली बार 13,000 डॉलर प्रति टन का स्तर पार कर लिया है जिससे ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन, इलेक्ट्रिक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चिंता बढ़ गई है।
सोमवार को लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर तांबे की कीमत 4.6 फीसदी की तेजी के साथ 13,042 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई। इससे पहले कीमत 13,045 डॉलर के स्तर को भी छू चुकी थी जो 29 दिसंबर को बने पुराने रिकॉर्ड से भी ऊपर है। वहीं अमेरिका के COMEX बाजार में तांबा 4.6 फीसदी उछलकर 5.9005 डॉलर प्रति पाउंड यानी करीब 13,008 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह सप्लाई से जुड़ी चिंताएं हैं। चिली की कैपस्टोन कॉपर कंपनी की मंटोवर्दे कॉपर और गोल्ड खदान में चल रही हड़ताल ने बाजार की टेंशन और बढ़ा दी है। इस खदान से 29,000 से 32,000 मीट्रिक टन तांबे के उत्पादन की उम्मीद थी। भले ही यह वैश्विक उत्पादन का छोटा हिस्सा हो, लेकिन इससे सप्लाई चेन पर दबाव और साफ दिखाई देने लगा है।
बड़े वैश्विक बैंक और एनालिस्ट भी आने वाले समय को लेकर सतर्क हैं। यूबीएस के विश्लेषकों के अनुसार, साल 2026 में तांबे की मांग में करीब 3 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि रिफाइंड कॉपर की सप्लाई 1 फीसदी से भी कम बढ़ेगी। इसका नतीजा यह होगा कि 2026 में 3 से 4 लाख टन की कमी देखने को मिलेगी जो 2027 तक बढ़कर करीब 5 लाख टन तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि निवेशक और ट्रेडर्स पहले से ही संभावित कमी को कीमतों में शामिल करने लगे हैं, जिससे बाजार में तेज़ी और मजबूत हो गई है।
तांबे की कीमतों में उछाल के पीछे LME के गोदामों में स्टॉक का तेजी से घटना भी एक अहम कारण है। अगस्त के अंत से अब तक LME में तांबे का भंडार करीब 55 फीसदी घटकर 1,42,550 टन रह गया है। जानकारों के मुताबिक, LME सिस्टम से निकलने वाला अधिकांश तांबा अमेरिका भेजा गया है जहां तांबे पर टैरिफ को लेकर समीक्षा चल रही है। हालांकि 1 अगस्त से तांबे को इंपोर्ट ड्यूटी से छूट दी गई है लेकिन अनिश्चितता अब भी बाजार को प्रभावित कर रही है।
तांबे की तेजी का असर सिर्फ इसी मेटल तक सीमित नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे बेस मेटल्स में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिला। एल्युमीनियम 2.3 फीसदी बढ़कर 3,086 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया, जो अप्रैल 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है। जिंक 3,204 डॉलर, सीसा 2,026 डॉलर, निकेल 17,195 डॉलर और टिन 42,785 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया। खासतौर पर टिन में 5.9 फीसदी की तेज़ी कम लिक्विडिटी और शॉर्ट कवरिंग के कारण देखी गई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की तेजी का असर भारत पर भी साफ दिखाई दे रहा है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर तांबे की कीमतों में करीब 1.5 फीसदी का उछाल देखा गया। कारोबार के दौरान तांबा 1,334.70 रुपये प्रति किलो के स्तर तक पहुंच गया। सुबह 10:20 बजे तांबा 1.27 फीसदी की तेजी के साथ 1,326.80 रुपये प्रति किलो पर ट्रेड कर रहा था। पिछले महीने MCX पर तांबे ने 1,392.95 रुपये प्रति किलो का रिकॉर्ड स्तर भी बनाया था। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा हालात में तांबे की कीमतों में तेजी का माहौल बना रह सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तक सप्लाई साइड की समस्याएं बनी रहती हैं और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर से मांग मजबूत रहती है तब तक तांबे की कीमतों में दबाव ऊपर की ओर बना रह सकता है। चिली जैसी बड़ी प्रोड्यूसिंग अर्थव्यवस्थाओं में किसी भी तरह की रुकावट अब पूरे ग्लोबल मार्केट को हिला सकती है। ऐसे में तांबा आने वाले समय में भी उद्योगों और निवेशकों के लिए सबसे अहम मेटल बना रह सकता है।