बुधवार को अचानक हालात बदल गए और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। बाजार में यह बदलाव इतना तेज था कि निवेशकों और विशेषज्ञों को भी हैरानी हुई। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का एक बड़ा कदम माना जा रहा है जिसने बाजार की दिशा ही बदल दी।

पिछले कुछ दिनों से दुनिया भर के बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव की वजह से लोगों को डर था कि तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है लेकिन बुधवार को अचानक हालात बदल गए और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। बाजार में यह बदलाव इतना तेज था कि निवेशकों और विशेषज्ञों को भी हैरानी हुई। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का एक बड़ा कदम माना जा रहा है जिसने बाजार की दिशा ही बदल दी।
बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 0.26% गिरकर 87.57 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई, जबकि अमेरिकी WTI कच्चा तेल करीब 0.44% गिरकर 83.08 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। हालांकि असली हलचल इससे पहले रात के कारोबार में देखने को मिली जब ब्रेंट और WTI के फ्रंट-मंथ फ्यूचर्स 11% से ज्यादा गिरकर बंद हुए। यह गिरावट इतनी बड़ी थी कि इसे पिछले चार सालों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक माना जा रहा है।
तेल की कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का वह प्रस्ताव है जिसमें उसने अपने रणनीतिक भंडार से बड़े पैमाने पर तेल जारी करने की बात कही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, IEA अपने भंडार से 182 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल बाजार में छोड़ सकता है। इसका मकसद साफ है बाजार में सप्लाई बढ़ाकर बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना। इस प्रस्ताव पर संगठन के 32 सदस्य देशों के ऊर्जा अधिकारियों की एक आपात बैठक में चर्चा की गई। उम्मीद है कि सदस्य देशों की सहमति मिलने के बाद इस योजना को लागू किया जा सकता है। हालांकि नियम के मुताबिक अगर एक भी सदस्य देश इसका विरोध करता है तो यह योजना टल सकती है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी यानी IEA एक वैश्विक संगठन है जिसका मुख्यालय फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित है। इसकी स्थापना 1974 में की गई थी। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखना है। जब भी तेल की सप्लाई में कोई बड़ा संकट आता है तब यह संगठन सदस्य देशों के साथ मिलकर बाजार को स्थिर करने के लिए कदम उठाता है। IEA, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के तहत काम करता है और सरकारों तथा ऊर्जा कंपनियों के साथ मिलकर ऊर्जा को सुरक्षित, सस्ता और टिकाऊ बनाने की दिशा में काम करता है।
इस संगठन में कुल 32 सदस्य देश हैं। इनमें अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा जैसे बड़े देश शामिल हैं। इसके अलावा भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे 13 सहयोगी सदस्य भी इसके साथ जुड़े हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारत को जल्द ही IEA का पूर्ण सदस्य बनाए जाने पर भी चर्चा चल रही है। हाल ही में सदस्य देशों ने ब्राजील, कोलम्बिया, भारत और वियतनाम को संगठन से और गहराई से जोड़ने पर सहमति जताई है।
तेल बाजार में उतार-चढ़ाव का एक और दिलचस्प कारण सामने आया। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर दी, जिसमें कहा गया था कि अमेरिकी नौसेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक तेल टैंकर को सुरक्षित बाहर निकाला है। हालांकि बाद में यह पोस्ट हटा दी गई और व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई ऑपरेशन हुआ ही नहीं था। लेकिन इस छोटी सी गलती ने बाजार में भ्रम पैदा कर दिया और कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ गया।