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सरकारी तेल कंपनियों ने पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की है। महज 11 दिनों के अंदर चार बार दाम बढ़ाए गए। इसी तरह CNG की कीमतों में भी कई बार इजाफा हुआ। दिल्ली में CNG करीब 6 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो चुकी है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं तो आम लोगों को उम्मीद होती है कि भारत में भी पेट्रोल, डीजल और CNG के दाम कम होंगे। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। हाल के दिनों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। एक तरफ वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई वहीं दूसरी तरफ भारत में पेट्रोल-डीजल और CNG के दाम बढ़ा दिए गए। ऐसे में लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तेल सस्ता हो रहा है तो देश में ईंधन महंगा क्यों हो रहा है?
सरकारी तेल कंपनियों ने पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की है। महज 11 दिनों के अंदर चार बार दाम बढ़ाए गए। इसी तरह CNG की कीमतों में भी कई बार इजाफा हुआ। दिल्ली में CNG करीब 6 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो चुकी है। इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्यपूर्व एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव को माना जा रहा है।
बहुत से लोग यह सोचते हैं कि अगर आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता हुआ है तो उसी दिन पेट्रोल-डीजल के दाम भी कम हो जाने चाहिए लेकिन असल में ऐसा नहीं होता। भारत में आज जो पेट्रोल और डीजल बिक रहा है वह कई हफ्ते या महीनों पहले खरीदे गए कच्चे तेल से तैयार हुआ होता है। तेल कंपनियां पहले से तय अनुबंधों के जरिए तेल खरीदती हैं और उसकी डिलीवरी बाद में होती है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तुरंत आई गिरावट का असर भारत में तुरंत दिखाई नहीं देता।
अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में ज्यादातर कारोबार फ्यूचर ट्रेडिंग के जरिए होता है यानी जो कीमत स्क्रीन पर दिखती है, वह भविष्य की डिलीवरी के लिए होती है। भारतीय कंपनियां 15 दिन से लेकर कई महीनों तक के अनुबंध पर तेल खरीदती हैं। ऐसे में जिस दिन वैश्विक बाजार में कीमत गिरती है उस दिन भारत में इस्तेमाल हो रहा तेल पहले के महंगे सौदों का हिस्सा हो सकता है। इसलिए घरेलू कीमतें सीधे उसी दिन के अंतरराष्ट्रीय रेट से तय नहीं होतीं।
भारत अपनी जरूरत का तेल किसी एक देश से नहीं खरीदता। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, भारत अलग-अलग देशों और अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल का मिश्रण खरीदता है। इसे इंडियन बास्केट कहा जाता है। इसमें कम सल्फर वाला ब्रेंट क्रूड और दुबई-ओमान जैसे देशों का तेल शामिल होता है। भारत रूस, यूएई, वेनेजुएला और अमेरिका जैसे देशों से भी तेल खरीदता है। यही वजह है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड सस्ता होने के बावजूद भारतीय बास्केट महंगी बनी रहती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस ब्रेंट क्रूड की चर्चा होती है उसकी कीमत और भारतीय बास्केट की कीमत हमेशा एक जैसी नहीं होती। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC की रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय ऐसा भी रहा जब ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन भारतीय रिफाइनरियों के लिए तेल की कीमत उससे ज्यादा चल रही थी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत को वास्तविक तौर पर महंगा तेल खरीदना पड़ रहा था।
मध्यपूर्व में जारी भू-राजनीतिक संकट का असर भारत की तेल कंपनियों पर भी पड़ा है। सरकार के मुताबिक कीमतें बढ़ाने से पहले तेल कंपनियों को हर दिन करीब 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा था। दाम बढ़ने के बाद यह घाटा कुछ कम जरूर हुआ है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इसी वजह से कंपनियां धीरे-धीरे कीमतें बढ़ा रही हैं ताकि नुकसान को कम किया जा सके।
जब तक तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह कम नहीं होता और पहले खरीदा गया महंगा तेल बाजार में इस्तेमाल होता रहेगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई छोटी गिरावट का फायदा सीधे आम लोगों तक पहुंचना मुश्किल माना जा रहा है। यही वजह है कि कई बार कच्चा तेल सस्ता होने की खबरें आने के बावजूद भारत में पेट्रोल, डीजल और CNG के दाम बढ़ते नजर आते हैं।
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