चांदी ‘ओवरबॉट’ जोन में! टारगेट के बाद 1 लाख तक टूट का रिस्क क्यों बढ़ा

जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भाव जरूरत से ज्यादा गर्म हो चुके हैं और अगर अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार अपने-अपने टारगेट जोन तक पहुंचते हैं, तो वहां से मुनाफावसूली और ट्रेंड रिवर्सल का जोखिम बढ़ सकता है।

चांदी रिकॉर्ड हाई पर
चांदी रिकॉर्ड हाई पर
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar20 Jan 2026 11:57 AM
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Silver Price Crash : देश के वायदा बाजार से लेकर दिल्ली सर्राफा बाजार तक चांदी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है, लेकिन इसी तेजी के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है क्या मौजूदा उछाल के बाद चांदी में तेज गिरावट भी आ सकती है? जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भाव जरूरत से ज्यादा गर्म हो चुके हैं और अगर अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार अपने-अपने टारगेट जोन  तक पहुंचते हैं, तो वहां से मुनाफावसूली और ट्रेंड रिवर्सल का जोखिम बढ़ सकता है। बीते एक महीने में कीमतों में लगभग 50% से अधिक उछाल की वजह से यह बहस और तेज हो गई है। 17 दिसंबर को चांदी पहली बार करीब 2 लाख रुपये के आसपास बंद हुई थी, और 19 जनवरी तक 3 लाख के स्तर को छूने की बात कही जा रही है यानी एक महीने में करीब 1 लाख रुपये का जंप। ऐसे में विशेषज्ञ 30% तक की करेक्शन (करीब 1 लाख रुपये या उससे अधिक) की संभावना की तरफ संकेत कर रहे हैं।

पहले समझिए टारगेट जोन क्या है

जानकारों की नजर में चांदी की चाल समझने के लिए इस वक्त दो कंपास सबसे अहम हैं एक ग्लोबल और दूसरा घरेलू। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति औंस का स्तर सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सीमा और तकनीकी टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। मौजूदा भाव अगर वहां तक पहुंचते हैं, तो बाजार में ओवरबॉट (जरूरत से ज्यादा खरीदा हुआ) माहौल और गहरा सकता है यानी छोटे-से ट्रिगर पर भी तेज मुनाफावसूली की गुंजाइश बन सकती है। वहीं भारत के MCX पर 3.25 से 3.30 लाख रुपये का दायरा ‘रेज़िस्टेंस ज़ोन’ की तरह देखा जा रहा है, जहां तेजी की असली परीक्षा होगी। अगर चांदी इस दहलीज पर टिकने के बजाय फिसलती है, तो करेक्शन की रफ्तार बढ़ सकती है और गिरावट एक झटके में ज्यादा गहरी दिख सकती है।

गिरावट की वजहें क्या बन सकती हैं?

चांदी की मौजूदा रैली के पीछे जिन वजहों ने आग लगाई थी, वही अब ब्रेक का काम भी कर सकती हैं। सबसे बड़ा ट्रिगर टैरिफ टेंशन और वैश्विक अनिश्चितता रही, जिसने निवेशकों को सेफ-हेवन की तरफ धकेला लेकिन अगर दबाव के बीच टैरिफ मोर्चे पर नरमी के संकेत मिलते हैं, तो यही सेफ-हेवन ट्रेड ढीला पड़ सकता है और कीमतों पर सीधा दबाव आ सकता है। दूसरी तरफ डॉलर इंडेक्स की संभावित मजबूती भी चांदी की चमक फीकी कर सकती है, क्योंकि डॉलर में रिकवरी अक्सर कीमती धातुओं को नीचे खींचती है। इसके अलावा, जब चांदी जरूरत से ज्यादा महंगी हो जाती है, तो बाजार “रिप्लेसमेंट” की राह पकड़ता है इंडस्ट्री और निवेशक कॉपर-एल्यूमीनियम जैसे विकल्पों की ओर शिफ्ट होने लगते हैं, जिससे मांग घटने का खतरा बढ़ता है। गोल्ड-सिल्वर रेश्यो अगर अपने निचले स्तर से ऊपर की तरफ सामान्य होने लगे, तो संकेत यही होगा कि गोल्ड तुलनात्मक रूप से मजबूत हो रहा है और चांदी में करेक्शन की गुंजाइश बढ़ रही है। ऊपर से तेज उछाल के बाद मुनाफावसूली लगभग तय मानी जाती है यही हवा निकलने वाला दौर कई बार गिरावट को अचानक तेज कर देता है। वहीं फेड रेट-कट की उम्मीदें अगर पहले ही भाव में डिस्काउंट हो चुकी हों, तो आगे बाजार फेड की टिप्पणी और संकेतों पर ज्यादा झटके खा सकता है। इन्हीं फैक्टर्स के जोड़ से विश्लेषकों का आकलन है कि अगर चांदी 3.25–3.30 लाख के पास जाकर फिसलती है, तो 30% तक का करेक्शन संभव है ।

क्या 1980 जैसा इतिहास दोहराया जा सकता है?

इतिहास में बड़े फॉल पहले भी हुए हैं। 1980 में चांदी के भाव पीक के बाद बहुत कम समय में तेज टूटे थे। 2011 में भी ऊंचे स्तरों के बाद करेक्शन देखने को मिला। विशेषज्ञों का तर्क है कि जब बाजार अति-उत्साह में होता है और कीमतें जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो गिरावट भी उतनी ही तेज हो सकती है। हालांकि, आज का बाजार 1980 जैसा हूबहू होगा यह कहना ठीक नहीं, लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि परवलयिक (बहुत तेज) तेजी के बाद करेक्शन का जोखिम बढ़ जाता है।

निवेशक के लिए संकेत: अब किन बातों पर नजर रखें?

  1. 3.25–3.30 लाख का ज़ोन: वहां टिकेगी या वहीं से फिसलेगी?
  2. डॉलर इंडेक्स की दिशा
  3. टैरिफ/जियो-पॉलिटिकल हेडलाइंस
  4. गोल्ड-सिल्वर रेश्यो में बदलाव
  5. वॉल्यूम के साथ प्रॉफिट बुकिंग के संकेतSilver Price Crash


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इतनी चांदी खप कहां रही है? टेक्नोलॉजी ने कैसे बढ़ाई कीमतें

सोलर एनर्जी की रफ्तार बढ़ने के साथ फोटोवोल्टिक सेल्स में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर पेस्ट भी मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है। वहीं EV और ऑटोमोबाइल की दुनिया में वायरिंग, सेंसर, बैटरी चार्जिंग सिस्टम और ऑटोनॉमस टेक की चिप्स तक चांदी की खपत बढ़ती जा रही है।

टेक्नोलॉजी ने बढ़ाई चांदी की डिमांड
टेक्नोलॉजी ने बढ़ाई चांदी की डिमांड
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar20 Jan 2026 11:18 AM
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Silver Price :  सोमवार को MCX पर चांदी ने पहली बार 3 लाख रुपये प्रति किलो का आंकड़ा छूकर बाजार में नई हलचल पैदा कर दी। भाव लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं, इसलिए आम खरीदार के मन में एक स्वाभाविक सवाल उठता है जब चांदी के गहनों का चलन पहले जैसा नहीं रहा, तो कीमतें इतनी तेज़ क्यों भाग रही हैं? दरअसल चांदी की कहानी अब ज्वेलरी तक सीमित नहीं रही टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और इंडस्ट्रियल सेक्टर ने इसे नए दौर की हाई-डिमांड धातु बना दिया है। यही वजह है कि मांग का दबाव बढ़ते ही निवेशकों की नजर भी चांदी पर टिक गई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल में देश में करीब 33 हजार टन चांदी की खपत हुई जिसमें जेवर और सिक्कों के साथ-साथ उद्योगों की जरूरत भी शामिल है। जैसे-जैसे इंडस्ट्रियल मांग का दायरा फैल रहा है, बाजार में यह धारणा मजबूत हो रही है कि चांदी की कीमतों में अभी और तेजी की गुंजाइश बनी रह सकती है।

1) चांदी का इस्तेमाल अब कहां-कहां हो रहा है?

चांदी की असली चमक अब शोरूम की रौशनी में नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों की मशीनों और हाई-टेक लैब्स के सर्किट में दिखाई दे रही है। आज यह धातु ज्वेलरी से आगे बढ़कर आधुनिक अर्थव्यवस्था की वर्कहॉर्स मेटल बन चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी, कैमरा, माइक्रोचिप और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड तक हर जगह चांदी की जरूरत कंडक्टर और कोटिंग के रूप में पड़ती है। सोलर एनर्जी की रफ्तार बढ़ने के साथ फोटोवोल्टिक सेल्स में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर पेस्ट भी मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है। वहीं EV और ऑटोमोबाइल की दुनिया में वायरिंग, सेंसर, बैटरी चार्जिंग सिस्टम और ऑटोनॉमस टेक की चिप्स तक चांदी की खपत बढ़ती जा रही है। मेडिकल सेक्टर में इसकी एंटी-बैक्टीरियल क्षमता के कारण वाउंड ड्रेसिंग, फिल्टर और उपकरणों की कोटिंग जैसी जरूरतें बनी हुई हैं। और परंपरागत तौर पर शगुन, पूजा-पाठ, सिक्के, पायल, बर्तन और धार्मिक वस्तुओं में चांदी की मांग आज भी स्थिर है। यही वजह है कि बढ़ती औद्योगिक जरूरतों और सांस्कृतिक उपयोग के मेल से भारत दुनिया के बड़े चांदी उपभोक्ताओं में लगातार गिना जाता है।

2) मांग अचानक क्यों बढ़ गई?

चांदी की तेजी किसी एक वजह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह कई परतों में बनता दबाव है और हर परत कीमतों को ऊपर धकेलती चली जाती है। दुनिया जिस रफ्तार से ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है, उसी रफ्तार से सोलर प्रोजेक्ट्स का जाल फैल रहा है और हर नए सोलर सेटअप के साथ चांदी की जरूरत बढ़ती जाती है। दूसरी तरफ EV और टेक्नोलॉजी बूम ने इंडस्ट्री की मांग को नया ईंधन दिया है ऑटो, बैटरी, सेंसर और एडवांस्ड चिप्स जैसी जरूरतों में चांदी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। इसी बीच अपूर्ति की टाइटनेस भी बाजार को और संवेदनशील बना रही है खनन उत्पादन में सीमाएं और सप्लाई-चेन की रुकावटें उपलब्धता घटाती हैं तो भाव स्वाभाविक रूप से चढ़ते हैं। महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में निवेशक भी चांदी को सेफ-हैवन की तरह देखने लगे हैं, जिससे खरीदारी का दबाव बढ़ता है। ऊपर से नीतिगत समर्थन भारत समेत कई देशों की ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां मांग को लंबी अवधि का सहारा देती हैं। नतीजा यह कि चांदी की कीमतें क्षणिक उछाल नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल डिमांड के दम पर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ती दिख रही हैं।

3) भारत में चांदी का खजाना कहां है?

भारत की कहानी चांदी के मामले में थोड़ी उलटी है खपत के मोर्चे पर देश आगे, लेकिन उत्पादन के मोर्चे पर सीमाएं साफ दिखती हैं। यहां चांदी की ज्यादातर आपूर्ति किसी अलग सिल्वर माइन से नहीं आती, बल्कि जिंक, लेड और कॉपर की खदानों से बाय-प्रोडक्ट के तौर पर निकलती है यानी चांदी अक्सर मुख्य धातु नहीं, साइड-प्रोडक्शन बनकर साथ आती है। राजस्थान इस लिहाज से सबसे अहम पट्टी मानी जाती है, जहां जिंक-लेड माइनिंग के दौरान बड़ी मात्रा में चांदी भी निकलती है और यहां की खनन गतिविधियां देश की सप्लाई में बड़ा योगदान देती हैं। झारखंड की जमशेदपुर के आसपास की माइनिंग बेल्ट में उत्पादन सीमित स्तर पर बताया जाता है। वहीं कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गोल्ड/कॉपर खनन के साथ चांदी का हिस्सा भी साथ-साथ निकलता है। देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी छिटपुट उत्पादन मौजूद है, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि घरेलू मांग के मुकाबले भारतीय सप्लाई कम पड़ती है और यही कमी आयात पर निर्भरता को बढ़ाती है।

4) भारत किन देशों से चांदी आयात करता है?

घरेलू मांग की रफ्तार इतनी तेज है कि भारत की अपनी आपूर्ति अक्सर कम पड़ जाती है और यहीं से आयात की मजबूरी शुरू होती है। बाजार में आम तौर पर मेक्सिको, पेरू, रूस और चीन जैसे देशों को भारत के प्रमुख सोर्स के रूप में देखा जाता है, जहां से बड़े पैमाने पर चांदी मंगाई जाती है। Silver Price

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भारत गाड़ेगा आर्थिक विकास के झंडे, ट्रंप की धमकी बेअसर

IMF ने अपनी रिपोर्ट में संसोधन करके भारत की GDP की वृद्धि दर को 7.3 प्रतिशत कर दिया है। IMF ने वर्ष-2026-27 के लिए भारत के ग्रोथ अनुमान को 6.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है।

भारत का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर
भारत का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर
locationभारत
userआरपी रघुवंशी
calendar19 Jan 2026 06:45 PM
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India economic growth 2026 : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी तथा भारी टैरिफ का भारत के ऊपर कोई असर पडऩे वाला नहीं है। भारत आर्थिक विकास के झंडे गाडऩे वाला है। दुनिया की तमाम बड़ी-बड़ी एजेंसी दावा कर रही हैं कि भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश बनने की दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की बढ़ती हुई  अर्थव्यवस्था के ऊपर अपनी सहमति की मोहर लगा दी है।

IMF का बड़ा दावा, 7.3 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा भारत

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानि IMF एक प्रतिष्ठित संगठन है। IMF ने सोमवार 19 जनवरी 2026 को भारत को लेकर बड़ी रिपोर्ट जारी की है। IMF ने भारत के लिए जारी की गई अपनी रिपोर्ट में भारत के घरेलू, सकल उत्पाद यानि कि GDP की दर को बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है। अक्टूबर में IMF ने भारत की DGP दर को 0.7 प्रतिशत कम पर आंका था। IMF ने अपनी रिपोर्ट में संसोधन करके भारत की GDP की वृद्धि दर को 7.3 प्रतिशत कर दिया है। IMF ने वर्ष-2026-27 के लिए भारत के ग्रोथ अनुमान को 6.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है।

उम्मीद से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया है भारत ने

भारत की अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है और इस अवधि में विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक रही है। 6 जनवरी को जारी सरकार के पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, FY26 में भारत की GDP वृद्धि 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो IMF के संशोधित अनुमान के काफी करीब है। IMF का यह अपग्रेड ऐसे समय में आया है, जब विश्व बैंक ने भी भारत की विकास संभावनाओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है. वॉशिंगटन स्थित विश्व बैंक ने हाल ही में भारत के लिए FY26 के विकास दर अनुमान को बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया था। इसके बाद के वर्षों में लगभग 6.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। विश्व बैंक ने मजबूत घरेलू मांग, उपभोग में लचीलापन और निवेश गतिविधियों में सुधार को इसके प्रमुख कारण बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी कारकों, घरेलू मांग और संरचनात्मक सुधारों के चलते तेजी से आगे बढ़ रही है। IMF और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा किए गए ये संशोधित अनुमान भारत की आर्थिक मजबूती और वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हैं।

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में बड़ा दावा

इस दौरान SBI की एक रिसर्च रिपोर्ट में बड़ा दावा किया गया है। सोमवार 19 जनवरी 2026 को जारी SBI रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को आजादी के बाद 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में करीब 60 साल लगे। इसके बाद देश ने महज 7 साल में 2014 में 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का आंकड़ा छू लिया। इसके पश्चात 2021 में भारत 3 ट्रिलियन डॉलर और 2025 में 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गया। इससे साफ है कि समय के साथ भारत की आर्थिक गति लगातार तेज हुई है। एसबीआई के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा कि भारत अगले दो वर्षों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में भी अग्रसर है। उन्होंने बताया कि भारत ने 2009 में आजादी के 62 साल बाद पहली बार 1,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय हासिल की थी।

2026 तक 3,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय का अनुमान

डॉ. घोष के अनुसार, इसके बाद 2019 में प्रति व्यक्ति आय 2,000 डॉलर के स्तर तक पहुंची और 2026 में इसके 3,000 डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि दर दुनिया के कई देशों की तुलना में बेहतर रही है, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत हुई है।

भारत के लिए जरूरी है 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर

SBI रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत को 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के तहत उच्च आय वाला देश बनना है, तो प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) को हर साल औसतन 7.5% की सीएजीआर से बढ़ाना होगा। डॉ. घोष ने बताया कि पिछले 23 वर्षों में भारत की प्रति व्यक्ति जीएनआई करीब 8.3% की दर से बढ़ी है, जिससे यह लक्ष्य हासिल करना संभव प्रतीत होता है। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि भविष्य में उच्च आय वाले देशों की सीमा (थ्रेशहोल्ड) बढ़ सकती है। यदि यह सीमा 13,936 डॉलर से बढ़कर 18,000 डॉलर हो जाती है, तो भारत को 2047 तक उच्च आय वाला देश बनने के लिए प्रति व्यक्ति आय को लगभग 8.9% सालाना की दर से बढ़ाना होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जनसंख्या वृद्धि और महंगाई को ध्यान में रखते हुए अगले 23 वर्षों तक भारत को डॉलर के लिहाज से अपनी नॉमिनल जीडीपी करीब 11.5% की दर से बढ़ानी होगी। India economic growth 2026


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