पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उबाल के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल को लेकर बड़ा दांव चला है। सरकार ने पेट्रोल पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को घटाकर सिर्फ 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया है, जबकि डीजल पर यह बोझ पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।

Petrol-Diesel Price : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उबाल के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल को लेकर बड़ा दांव चला है। सरकार ने पेट्रोल पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को घटाकर सिर्फ 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया है, जबकि डीजल पर यह बोझ पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। अब तक पेट्रोल पर 13 रुपये और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर की दर से यह ड्यूटी वसूली जा रही थी। ऐसे समय में यह फैसला इसलिए भी अहम है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अनिश्चितता का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर पड़ रहा है। माना जा रहा है कि सरकार ने यह कदम आम आदमी को राहत देने, ईंधन के मोर्चे पर बढ़ते दबाव को कम करने और महंगाई पर लगाम लगाने के इरादे से उठाया है।
सरकार का यह कदम ऐसे दौर में आया है, जब निजी क्षेत्र की बड़ी ईंधन कंपनी नायरा एनर्जी ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए थे। कंपनी ने पेट्रोल की कीमत में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर तक इजाफा किया था। इसके बाद उपभोक्ताओं और डीलरों दोनों के बीच चिंता बढ़ गई थी। ऐसे में सरकार की ओर से टैक्स कम करने के फैसले को बाजार में राहत देने वाली कोशिश माना जा रहा है, हालांकि तेल की कीमतों में अस्थिरता अब भी बनी हुई है। रूस की ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट से जुड़ी नायरा एनर्जी देशभर में 7,000 से अधिक पेट्रोल पंप संचालित करती है। कंपनी द्वारा दाम बढ़ाए जाने के बाद उसके डीलरों ने नाराजगी और चिंता दोनों जताई हैं। उनका मानना है कि कीमतें बढ़ने से ईंधन की बिक्री पर असर पड़ सकता है। कुछ डीलरों ने विरोध की संभावना भी जताई है। इसके अलावा, बीते कुछ दिनों में सप्लाई में कमी की बात भी सामने आई है, जिससे बाजार में बेचैनी और बढ़ गई है।
सरकार के इस फैसले से उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों के लिए स्थिति आसान नहीं रहने वाली। हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों पर अब कीमतों को नियंत्रित रखने का दबाव बढ़ सकता है। खासकर तब, जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल अब भी महंगा बना हुआ है। ऐसे माहौल में कंपनियों को मुनाफा, आपूर्ति और उपभोक्ता हित तीनों के बीच संतुलन साधना पड़ेगा।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने यही दबाव और तेज कर दिया है। ऐसे में सरकार ने टैक्स घटाकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर कुछ नियंत्रण रखने और महंगाई को सीमित करने की कोशिश की है। यह फैसला केवल ईंधन उपभोक्ताओं के लिए ही नहीं, बल्कि परिवहन और रोजमर्रा की लागत पर भी असर डाल सकता है।
फरवरी के आखिर में अमेरिका और इज़राइल की ओर से ईरान पर हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में तेज हलचल देखी गई। कीमतें अचानक उछलकर करीब 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। बाद में इनमें कुछ नरमी आई और भाव लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गए, लेकिन बाजार अब भी स्थिर नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि आने वाले समय में ईंधन की कीमतों को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है। सरकार के इस फैसले से फिलहाल आम जनता को कुछ राहत जरूर मिल सकती है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। ऊर्जा बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें फिर से चढ़ती हैं, तो पेट्रोल और डीजल के दाम आगे चलकर दोबारा बढ़ सकते हैं। Petrol-Diesel Price