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भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो, लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी एक बड़ी चुनौती अब भी जस की तस बनी हुई है। देश की विकास रफ्तार जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से ईंधन की मांग भी बढ़ रही है।

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India's Energy Dependence : भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो, लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी एक बड़ी चुनौती अब भी जस की तस बनी हुई है। देश की विकास रफ्तार जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से ईंधन की मांग भी बढ़ रही है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और रसोई गैस यानी एलपीजी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में जब भी तनाव, युद्ध या सप्लाई बाधित होने जैसी स्थिति बनती है, तो उसकी चिंता नई दिल्ली से लेकर आम उपभोक्ता तक महसूस की जाती है। यह मामला सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति या व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन आपूर्ति, महंगाई और आम आदमी के मासिक बजट पर पड़ता है।
इन दिनों मिडिल ईस्ट में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने कई देशों की परेशानी बढ़ा दी है। इसका असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है। 20 मार्च को देश में प्रीमियम पेट्रोल की कीमत में 2.09 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय हालात का सीधा असर भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। तेल, जिसे अक्सर ‘काला सोना’ कहा जाता है, केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। खाना बनाने से लेकर परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की तमाम जरूरतों में इसकी अहम भूमिका है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को किस हद तक खुद पूरा करता है और कितनी मात्रा में उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। वित्त वर्ष 2024-25 से जुड़े हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश को अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है। यह निर्भरता भारत की ऊर्जा व्यवस्था को वैश्विक बाजार की उठापटक के प्रति बेहद संवेदनशील बना देती है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने करीब 232.5 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात किया था। वहीं देश की दैनिक खपत लगभग 55 लाख बैरल के आसपास है। भारत जिन देशों से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदता है, उनमें रूस सबसे आगे है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 37 से 40 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसके बाद इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। देश में प्राकृतिक गैस की कुल खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन ही हो पाता है। यानी मांग और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का आयात करना पड़ता है। देश की कुल गैस जरूरत का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। कतर भारत के लिए एलएनजी का सबसे बड़ा स्रोत है और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी करीब 47 से 50 प्रतिशत तक है। इसके अलावा अमेरिका, यूएई और ओमान भी गैस आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रसोई गैस यानी एलपीजी के मामले में भी भारत की स्थिति बहुत मजबूत नहीं कही जा सकती। देश अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। खास चिंता की बात यह है कि इस आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत तक पहुंचता है। यानी अगर इस अहम समुद्री मार्ग पर किसी तरह की बाधा आती है, तो उसका सीधा असर भारत की रसोई गैस आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक चुनौती भी बन जाता है।
भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, ऊर्जा की मांग भी उतनी ही बढ़ रही है। लेकिन जब किसी देश की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयात पर आधारित हों, तो युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। भारत सरकार लंबे समय से ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। India's Energy Dependence
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