सोने-चांदी के दामों में आई भारी गिरावट, जानें आज का ताजा भाव

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच सोना-चांदी के दामों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। आमतौर पर संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाने वाला सोना इस बार दबाव में नजर आ रहा है।

सोना-चांदी
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locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar23 Mar 2026 09:58 AM
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Gold Silver Price Today : मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच सोना-चांदी के दामों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। आमतौर पर संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाने वाला सोना इस बार दबाव में नजर आ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि इस साल की अब तक की बड़ी बढ़त भी लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत करीब 3.8 फीसदी लुढ़ककर 4,320 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई। लगातार आठ कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। इसे 1983 के बाद की सबसे बड़ी साप्ताहिक कमजोरी भी माना जा रहा है।

आज क्या रहे सोना-चांदी के ताजा भाव

घरेलू वायदा बाजार में भी अंतरराष्ट्रीय कमजोरी का सीधा असर देखने को मिला। एमसीएक्स पर चांदी की कीमत करीब 6 फीसदी या 13,606 रुपये टूटकर 2,13,166 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई। वहीं, सोने का भाव भी लगभग 5 फीसदी या 7,115 रुपये गिरकर 1,37,377 रुपये प्रति 10 ग्राम तक फिसल गया। उधर, सिंगापुर बाजार में स्पॉट गोल्ड 3.3 फीसदी की गिरावट के साथ 4,343 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखा। चांदी भी 3.4 फीसदी टूटकर 65.61 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। प्लैटिनम और पैलेडियम जैसी दूसरी कीमती धातुओं में भी नरमी देखी गई, जिससे साफ है कि दबाव केवल सोने-चांदी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा बुलियन बाजार इसकी चपेट में है।

आखिर क्यों टूट रहे हैं सोने के दाम?

सोने में आई इस तेज गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण महंगाई और ब्याज दरों को लेकर बदली हुई बाजार धारणा है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक, खासतौर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यह संकेत दे चुके हैं कि फिलहाल ब्याज दरों में जल्द कटौती की उम्मीद कम है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने की आशंका मजबूत होती है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं। यही स्थिति सोने के लिए नकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि सोना ब्याज देने वाला एसेट नहीं है। बाजार के जानकारों का कहना है कि सोने में आई इस कमजोरी के पीछे “फोर्स्ड सेलिंग” भी एक बड़ी वजह है। जब शेयर बाजार और अन्य निवेश साधनों में नुकसान बढ़ता है, तो कई निवेशक अपने घाटे की भरपाई के लिए सोना बेचने लगते हैं। 28 फरवरी के बाद से बने युद्ध जैसे हालात के बीच यही पैटर्न देखने को मिला है। निवेशकों की इस मजबूर बिकवाली ने सोने की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना दिया, जिसकी वजह से गिरावट और तेज हो गई।

ईरान-अमेरिका तनाव से बाजार में बेचैनी

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने को लेकर चेतावनी दिए जाने और ईरान की जवाबी प्रतिक्रिया ने बाजार की बेचैनी को और गहरा कर दिया है। इस टकराव ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। आमतौर पर ऐसे समय में सोना मजबूत होता है, लेकिन इस बार महंगाई, ऊंची ब्याज दरों और बिकवाली के दबाव ने इसकी पारंपरिक सुरक्षित निवेश वाली छवि को कमजोर कर दिया है।

तकनीकी संकेत क्या कहते हैं?

तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक, तेज गिरावट के बाद सोना अब “ओवरसोल्ड” जोन में पहुंचता दिख रहा है। 14-दिवसीय आरएसआई इंडिकेटर 30 के नीचे चला गया है, जिसे आमतौर पर जरूरत से ज्यादा बिकवाली का संकेत माना जाता है। ऐसे में संभावना है कि आने वाले समय में सोने में सीमित रिकवरी या शॉर्ट टर्म उछाल देखने को मिले। हालांकि, यह पूरी तरह भू-राजनीतिक हालात, तेल की कीमतों और केंद्रीय बैंकों के रुख पर निर्भर करेगा। Gold Silver Price Today

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ऊर्जा के मामले में कितना मजबूत है भारत? आंकड़े बता रहे हकीकत

भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो, लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी एक बड़ी चुनौती अब भी जस की तस बनी हुई है। देश की विकास रफ्तार जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से ईंधन की मांग भी बढ़ रही है।

भारत की बढ़ती ऊर्जा निर्भरता
भारत की बढ़ती ऊर्जा निर्भरता
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar21 Mar 2026 11:10 AM
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India's Energy Dependence : भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो, लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी एक बड़ी चुनौती अब भी जस की तस बनी हुई है। देश की विकास रफ्तार जितनी तेज हो रही है, उतनी ही तेजी से ईंधन की मांग भी बढ़ रही है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और रसोई गैस यानी एलपीजी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में जब भी तनाव, युद्ध या सप्लाई बाधित होने जैसी स्थिति बनती है, तो उसकी चिंता नई दिल्ली से लेकर आम उपभोक्ता तक महसूस की जाती है। यह मामला सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति या व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन आपूर्ति, महंगाई और आम आदमी के मासिक बजट पर पड़ता है।

वैश्विक उथल-पुथल से भारत कितना प्रभावित हो सकता है

इन दिनों मिडिल ईस्ट में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने कई देशों की परेशानी बढ़ा दी है। इसका असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है। 20 मार्च को देश में प्रीमियम पेट्रोल की कीमत में 2.09 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय हालात का सीधा असर भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। तेल, जिसे अक्सर ‘काला सोना’ कहा जाता है, केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। खाना बनाने से लेकर परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की तमाम जरूरतों में इसकी अहम भूमिका है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को किस हद तक खुद पूरा करता है और कितनी मात्रा में उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

कच्चे तेल के मामले में भारत की सबसे ज्यादा निर्भरता

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। वित्त वर्ष 2024-25 से जुड़े हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश को अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है। यह निर्भरता भारत की ऊर्जा व्यवस्था को वैश्विक बाजार की उठापटक के प्रति बेहद संवेदनशील बना देती है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने करीब 232.5 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात किया था। वहीं देश की दैनिक खपत लगभग 55 लाख बैरल के आसपास है। भारत जिन देशों से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदता है, उनमें रूस सबसे आगे है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 37 से 40 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसके बाद इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।

प्राकृतिक गैस में भी आत्मनिर्भर नहीं है भारत

कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। देश में प्राकृतिक गैस की कुल खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन ही हो पाता है। यानी मांग और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत को एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का आयात करना पड़ता है। देश की कुल गैस जरूरत का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। कतर भारत के लिए एलएनजी का सबसे बड़ा स्रोत है और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी करीब 47 से 50 प्रतिशत तक है। इसके अलावा अमेरिका, यूएई और ओमान भी गैस आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

एलपीजी के लिए भी बाहर से आता है बड़ा हिस्सा

रसोई गैस यानी एलपीजी के मामले में भी भारत की स्थिति बहुत मजबूत नहीं कही जा सकती। देश अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। खास चिंता की बात यह है कि इस आयात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत तक पहुंचता है। यानी अगर इस अहम समुद्री मार्ग पर किसी तरह की बाधा आती है, तो उसका सीधा असर भारत की रसोई गैस आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक चुनौती भी बन जाता है।

ऊर्जा सुरक्षा क्यों बनी हुई है बड़ी चिंता

भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, ऊर्जा की मांग भी उतनी ही बढ़ रही है। लेकिन जब किसी देश की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयात पर आधारित हों, तो युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। भारत सरकार लंबे समय से ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। India's Energy Dependence

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8th Pay Commission: सुझाव देने की डेडलाइन बढ़ी, अब ऐसे भेजें अपनी राय

केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनर्स और अन्य हितधारकों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। 8वें वेतन आयोग से जुड़े सुझाव भेजने की समय सीमा बढ़ा दी गई है, जिससे अब अधिक लोगों को अपनी राय रखने का मौका मिलेगा।

8th Pay Commission अपडेट
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locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar21 Mar 2026 10:52 AM
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8th Pay Commission : केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनर्स और अन्य हितधारकों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। 8वें वेतन आयोग से जुड़े सुझाव भेजने की समय सीमा बढ़ा दी गई है, जिससे अब अधिक लोगों को अपनी राय रखने का मौका मिलेगा। सरकार इस समय वेतन, पेंशन और भत्तों से जुड़ी नई नीतियों पर काम कर रही है और इसी क्रम में 18 बिंदुओं वाली प्रश्नावली के जरिए सुझाव मांगे गए हैं। पहले इन जवाबों की अंतिम तिथि 16 मार्च थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 31 मार्च 2026 कर दिया गया है। ऐसे में कर्मचारी, पेंशनभोगी और अन्य संबंधित पक्ष अतिरिक्त समय के साथ अपने सुझाव दर्ज करा सकेंगे। आयोग को मिलने वाले ये फीडबैक भविष्य की वेतन संरचना, पेंशन व्यवस्था और भत्तों से जुड़े फैसलों को आकार देने में अहम भूमिका निभाएंगे।

18 सवालों वाली प्रश्नावली के जरिए मांगी गई राय

सरकार ने 8वें वेतन आयोग के लिए 18 प्रश्नों का एक विस्तृत प्रारूप जारी किया है। इस प्रश्नावली का उद्देश्य अलग-अलग वर्गों से सुझाव लेकर नीतियों को ज्यादा व्यवहारिक और व्यापक बनाना है। इच्छुक लोग 31 मार्च 2026 तक इन सभी सवालों के जवाब ऑनलाइन दे सकते हैं।

MyGov पर उपलब्ध है प्रश्नावली

8वें वेतन आयोग की प्रश्नावली भरने के लिए MyGov पोर्टल पर जाना होगा। इसके लिए इच्छुक व्यक्ति अपने मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी के माध्यम से लॉगिन कर सकते हैं। लॉगिन प्रक्रिया OTP के जरिए पूरी होगी। इसके बाद वे प्रश्नावली भरकर अपने सुझाव जमा कर सकते हैं।

कौन-कौन भेज सकता है सुझाव?

आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 8वें वेतन आयोग की इस प्रक्रिया में कई श्रेणियों के लोग और संस्थाएं भाग ले सकती हैं। इनमें मंत्रालयों और विभागों के कर्मचारी, केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारी, न्यायिक अधिकारी, अदालतों के कर्मचारी, नियामक निकायों के सदस्य, सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के संघ व यूनियन, पेंशनर्स, शोधकर्ता, शिक्षाविद और अधिकृत नोडल या उप-नोडल अधिकारी शामिल हैं।

आयोग ने साफ किया है कि सुझाव केवल MyGov पोर्टल के माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे। कागज पर भेजे गए जवाब, ईमेल से भेजी गई राय या PDF फाइल के रूप में जमा किए गए सुझावों पर विचार नहीं किया जाएगा।

ऐसे करें ऑनलाइन आवेदन

जो लोग 8वें वेतन आयोग के लिए अपनी सिफारिश या राय देना चाहते हैं, उन्हें MyGov पोर्टल पर जाकर पहले लॉगिन या साइन अप करना होगा। इसके लिए मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी का उपयोग किया जा सकता है। इसके बाद 6 अंकों का OTP दर्ज करना होगा। सत्यापन पूरा होने के बाद 18 प्रश्नों वाली प्रश्नावली खुलेगी, जिसमें जवाब भरकर सब्मिट किया जा सकता है। आयोग के अनुसार, जवाब देने वाले लोगों की पहचान गोपनीय रखी जाएगी। प्रश्नावली के जवाबों का विश्लेषण सामूहिक रूप से किया जाएगा और किसी व्यक्ति का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।

8वें वेतन आयोग का दायरा क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जनवरी 2025 में 8वें वेतन आयोग की घोषणा की थी। इसके बाद 3 नवंबर 2025 को वित्त मंत्रालय ने इसे औपचारिक रूप से अधिसूचित किया। सरकार पहले ही आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) को मंजूरी दे चुकी है। इन शर्तों के तहत आयोग को केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन, पेंशन और अन्य भत्तों में संशोधन के लिए अपनी सिफारिशें देने हेतु 18 महीने का समय दिया गया है।

आयोग में कौन-कौन हैं शामिल?

8वें वेतन आयोग की अध्यक्षता न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। वहीं प्रो. पुलक घोष और पंकज जैन इसके अन्य सदस्य हैं। यह समिति केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स के हितों को ध्यान में रखते हुए नई सिफारिशें तैयार करेगी। 8th Pay Commission

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