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कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से कई देशों में पेट्रोल और डीजल महंगा हो चुका है। ऐसे में अब भारत में भी कीमत बढ़ने की आशंका तेज हो गई है। सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल लोगों को राहत देने की कोशिश कर रही हैं लेकिन लगातार बढ़ रहे घाटे ने हालात मुश्किल बना दिए हैं।

पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय से आम लोगों के लिए बड़ी चिंता का विषय रही हैं। अभी तक भारत में ईंधन के दाम स्थिर बने हुए हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात अब नई परेशानी खड़ी करते नजर आ रहे हैं। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया के तेल बाजार को हिला दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से कई देशों में पेट्रोल और डीजल महंगा हो चुका है। ऐसे में अब भारत में भी कीमत बढ़ने की आशंका तेज हो गई है। सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल लोगों को राहत देने की कोशिश कर रही हैं लेकिन लगातार बढ़ रहे घाटे ने हालात मुश्किल बना दिए हैं। अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।
देश की बड़ी सरकारी तेल कंपनियां इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल लगातार नुकसान झेल रही हैं। बताया जा रहा है कि इन कंपनियों को हर महीने करीब 30 हजार करोड़ रुपये तक की अंडर-रिकवरी हो रही है। आसान भाषा में समझें तो कंपनियां जितने दाम में तेल खरीद रही हैं उतने दाम में बेच नहीं पा रही हैं। सूत्रों के मुताबिक पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 25 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान हो रहा है। यही वजह है कि तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। देश का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है। ऐसे में जब मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है तो उसका सीधा असर भारत पर भी पड़ता है। ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच बढ़े तनाव के कारण तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है बल्कि एलपीजी गैस और नैचुरल गैस की सप्लाई पर भी पड़ा है। इसके बावजूद भारत में अभी तक ईंधन की सप्लाई सामान्य बनी हुई है और कहीं कोई कमी देखने को नहीं मिली।
कुछ महीने पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी लेकिन अब यह बढ़कर लगभग 120 डॉलर तक पहुंच गई है। इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने दुनियाभर की सरकारों और तेल कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल और डीजल बनाने की लागत भी बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सरकार टैक्स कम न करे या कंपनियां नुकसान न झेलें तो ईंधन के दाम बढ़ाना लगभग तय माना जाता है।
केंद्र सरकार ने हालात संभालने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है। पेट्रोल पर अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दी गई जबकि डीजल पर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया गया। सरकार के इस फैसले से लोगों को तुरंत राहत मिली लेकिन दूसरी तरफ सरकार को भी हर महीने हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। माना जा रहा है कि अगर टैक्स में कटौती नहीं होती तो तेल कंपनियों का घाटा और ज्यादा बढ़ जाता।
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है। स्पेन, जापान, इटली, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। कई देशों ने ईंधन बचाने के लिए लोगों को कम यात्रा करने की सलाह दी है। कुछ जगहों पर सरकारों ने राहत पैकेज भी जारी किए हैं। इसके मुकाबले भारत में अभी तक कीमतें स्थिर रहना लोगों के लिए राहत की बात है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे? फिलहाल सरकार कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो लंबे समय तक नुकसान झेलना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि सरकार फिलहाल आम लोगों पर बोझ कम रखने की कोशिश कर रही है।
भारत में अभी पेट्रोल लगभग 94 रुपये और डीजल करीब 87 रुपये प्रति लीटर के आसपास बना हुआ है। सप्लाई भी सामान्य है और कहीं कोई राशनिंग नहीं की गई है लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अस्थिरता को देखते हुए आने वाले समय पर सभी की नजर बनी हुई है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है। फिलहाल राहत जरूर है लेकिन खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है।
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