देशभर में लाखों कर्जदारों की नजर अब भारतीय रिजर्व बैंक के अगले फैसले पर टिकी है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वालों के लिए यह हफ्ता अहम रहने वाला है, क्योंकि बुधवार को RBI अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा का परिणाम घोषित करेगा।

RBI Monetary Policy : देशभर में लाखों कर्जदारों की नजर अब भारतीय रिजर्व बैंक के अगले फैसले पर टिकी है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वालों के लिए यह हफ्ता अहम रहने वाला है, क्योंकि बुधवार को RBI अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा का परिणाम घोषित करेगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार ब्याज दरों में राहत मिलेगी या फिर EMI फिलहाल जैसी है वैसी ही बनी रहेगी। मौजूदा हालात को देखते हुए यह संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है कि रिजर्व बैंक अभी रेपो रेट में कोई बदलाव न करे। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, रुपये पर दबाव और महंगाई की आशंका ने केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती बढ़ा दी है। ऐसे में ब्याज दरों में कटौती का रास्ता फिलहाल आसान नहीं दिख रहा।
RBI की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC की बैठक सोमवार से शुरू हो चुकी है। इस बैठक का निष्कर्ष बुधवार को सामने आएगा। जानकारों का मानना है कि रेपो रेट को अभी 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा जा सकता है। इसकी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता लगातार बनी हुई है और भारत पर भी उसका असर साफ दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी और विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव ने हालात को जटिल बना दिया है। जब वैश्विक परिस्थितियां अस्थिर हों और महंगाई का दबाव बढ़ रहा हो, तब RBI आमतौर पर जल्दबाजी में कोई नरमी वाला फैसला लेने से बचता है।
रेपो रेट वह दर होती है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज देता है। बैंक इसी दर के आधार पर अपने ग्राहकों के लिए लोन की ब्याज दरें तय करते हैं। यही वजह है कि जब रेपो रेट में बदलाव होता है, तो उसका सीधा असर आम लोगों की EMI पर देखने को मिलता है।
इसके उलट रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर बैंक अपनी अतिरिक्त नकदी RBI के पास जमा कर सकते हैं। यह भी मौद्रिक नीति का अहम हिस्सा है, लेकिन आम लोगों के लिए रेपो रेट ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका असर सीधे कर्ज की लागत पर पड़ता है।
जब RBI रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है। ऐसे में बैंक इस अतिरिक्त बोझ को ग्राहकों पर डालते हैं और लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की EMI बढ़ सकती है। वहीं अगर रेपो रेट घटता है, तो बैंकों के लिए उधारी सस्ती होती है और वे ग्राहकों को कम ब्याज दर पर लोन दे सकते हैं। ऐसे में EMI घटने की उम्मीद बनती है। लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, उनमें राहत की संभावना कमजोर नजर आ रही है।
इस समय RBI के सामने सबसे बड़ी परेशानियों में एक है कच्चे तेल का महंगा होना। पश्चिम एशिया में जारी तनाव की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है। इसके बाद खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा होने लगता है। यानी तेल की कीमतों में उछाल धीरे-धीरे महंगाई को और बढ़ा सकता है। यही कारण है कि RBI फिलहाल ज्यादा सतर्क दिख रहा है।
हाल के महीनों में महंगाई को लेकर जो राहत दिख रही थी, वह अब कमजोर पड़ती नजर आ रही है। खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी ने केंद्रीय बैंक की चिंता बढ़ा दी है। यदि आने वाले समय में ईंधन और जरूरी वस्तुओं की कीमतें और बढ़ती हैं, तो महंगाई पर काबू पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। क्योंकि अगर महंगाई बढ़ रही हो और उसी समय ब्याज दरें कम कर दी जाएं, तो बाजार में मांग और बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर और दबाव बन सकता है।
रिजर्व बैंक के सामने इस वक्त सबसे मुश्किल काम अर्थव्यवस्था की रफ्तार और महंगाई के बीच संतुलन बनाना है। एक तरफ जरूरत है कि विकास की गति बनी रहे, निवेश और खपत को समर्थन मिले, वहीं दूसरी तरफ महंगाई को भी नियंत्रण में रखना जरूरी है। पिछले कुछ समय में अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए RBI ने नरम रुख अपनाया था, लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय हालात और घरेलू महंगाई के संकेत बदलते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक फिलहाल “देखो और इंतजार करो” वाली नीति पर चल सकता है।