भारत का स्टॉक मार्केट अन्य देशों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है। निवेशक भारत को “लिक्विडिटी सोर्स” की तरह उपयोग कर रहे हैं—जहां से पैसा निकालकर वे अन्य बेहतर बाजारों में निवेश कर रहे हैं।

भारत की मुद्रा ने बुधवार को 90 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया, जिससे वित्तीय बाजारों में चिंता गहराने लगी है। चालू वर्ष में रुपये में पहले ही 5% से अधिक की गिरावट हो चुकी है, और ताज़ा फिसलन ने अर्थव्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि घरेलू मैक्रो संकेतक सकारात्मक हैं कि कच्चे तेल के दाम नरम, मुद्रास्फीति 1% से नीचे और GDP वृद्धि 8.2% फिर भी रुपया दबाव में है। वजह घरेलू कमजोरी नहीं बल्कि वैश्विक कारक, भारी डॉलर बहिर्वाह और नीति अनिश्चितता हैं।
पिछले 14 महीनों में FPI ने 1.48 लाख करोड़ रुपये भारतीय इक्विटी से निकाले। भारत का स्टॉक मार्केट अन्य देशों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है। निवेशक भारत को “लिक्विडिटी सोर्स” की तरह उपयोग कर रहे हैं—जहां से पैसा निकालकर वे अन्य बेहतर बाजारों में निवेश कर रहे हैं। इस बहिर्वाह ने डॉलर की मांग बढ़ा दी और रुपये पर दबाव बढ़ाया।
निर्यात में भारी गिरावट जो कि अक्टूबर 2025 में निर्यात 11.8% घटकर 34.4 अरब डॉलर हुआ – 11 महीने का निचला स्तर तेल निर्यात 10.5% घटा और गैर-तेल निर्यात 12% गिरा।
त्योहारी सीजन और सोने की ऊंची कीमतों ने आयात बिल को उछाल दिया है, जिससे डॉलर की मांग और बढ़ गई।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर लंबे समय से स्पष्टता नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक डील पर कोई ठोस घोषणा नहीं होती, अनिश्चितता रुपये पर दबाव बनाए रखेगी।
RBI बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप नहीं कर रहा, केवल अस्थिरता नियंत्रित करने के लिए सीमित डॉलर बिक्री और निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए RBI “सॉफ्ट-टच” रणनीति अपना रहा है। हालांकि इससे आयात महंगा होता है और मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ता है।
शुक्रवार को RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की नीति बयान से बाजार को दिशा मिल सकती है।
कई विश्लेषकों का अनुमान है कि बाजार 91 रुपये प्रति डॉलर तक की बात कर रहा है, लेकिन RBI नीति के बाद 88–89 पर सुधार संभव है।