भारतीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार, 27 मार्च को एक ऐसा झटका दर्ज किया गया, जिसने अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 94 के स्तर से नीचे फिसल गया और कारोबार के दौरान करीब 94.15 तक पहुंच गया।

Indian Currency : भारतीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार, 27 मार्च को एक ऐसा झटका दर्ज किया गया, जिसने अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 94 के स्तर से नीचे फिसल गया और कारोबार के दौरान करीब 94.15 तक पहुंच गया। यह भारतीय मुद्रा का अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की उछलती कीमतों और वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता ने रुपये पर दबाव को और गहरा कर दिया है। यह गिरावट केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर महंगाई, आयात लागत, सरकारी खर्च और आम आदमी की जेब तक महसूस किया जा सकता है।
रुपये में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे सबसे अहम वजह अंतरराष्ट्रीय हालात हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में जब तेल महंगा होता है, तो उसे खरीदने के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है। डॉलर की मांग बढ़ने का सीधा दबाव रुपये पर आता है और वह कमजोर होने लगता है। इसके अलावा, वैश्विक शेयर बाजारों में कमजोरी और बॉन्ड यील्ड में तेजी ने भी निवेशकों का रुख बदल दिया है। ऐसे माहौल में निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की तरफ बढ़ते हैं। इसका नुकसान उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत जैसे देशों की मुद्रा को उठाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संकेतों ने भी बाजार की घबराहट कम नहीं होने दी। अमेरिका की ओर से आए विरोधाभासी बयानों ने निवेशकों के बीच भ्रम और अस्थिरता पैदा की। एक तरफ तनाव कम करने की बातें सामने आईं, तो दूसरी ओर सख्त रुख के संकेत भी दिए गए। इस तरह के मिश्रित संदेश वित्तीय बाजारों में भरोसे को कमजोर करते हैं और नतीजा यह होता है कि निवेशक ज्यादा सतर्क हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में डॉलर मजबूत होता है और रुपया जैसी मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है।
बाजार जानकारों का मानना है कि फिलहाल रुपया उम्मीद और आशंका के बीच झूल रहा है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिलती है, तो रुपये में कुछ सुधार देखने को मिल सकता है। अनुमान है कि यह 1 से 1.5 रुपये तक संभल सकता है। लेकिन जब तक वैश्विक हालात साफ नहीं होते, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहना लगभग तय माना जा रहा है। तकनीकी नजरिए से देखा जाए तो 94.00 से 94.20 का दायरा बेहद अहम माना जा रहा है। यह वह स्तर है, जहां केंद्रीय बैंक की सक्रियता की संभावना जताई जा रही है। दूसरी ओर 92.80 से 93.00 का दायरा रुपये के लिए सहारा देने वाला स्तर बन सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपये का गिरना सिर्फ आर्थिक खबर नहीं है, बल्कि यह सीधे आम लोगों के जीवन पर असर डालने वाली स्थिति है। जब रुपया कमजोर होता है, तो आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इसका असर धीरे-धीरे पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, दवाइयों, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों में दिखाई देने लगता है। यानी रुपये की गिरावट अंततः महंगाई को बढ़ाती है और घर का मासिक बजट बिगाड़ देती है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 75 से 80 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में रुपये की कमजोरी का सबसे पहला और बड़ा असर तेल आयात पर पड़ता है। जब डॉलर महंगा हो जाता है, तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। अनुमान यह है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में हर 1 रुपये की गिरावट से तेल कंपनियों पर करीब 8,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आ सकता है। यही बोझ बाद में ईंधन की कीमतों, परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की महंगाई के रूप में सामने आता है।
कमजोर रुपये का असर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जरूरी क्षेत्रों पर भी पड़ता है। भारत कई महत्वपूर्ण दवाओं और मेडिकल उपकरणों के लिए विदेशों पर निर्भर है। ऐसे में रुपये के गिरने से इनकी लागत बढ़ जाती है, जिसका असर मरीजों की जेब पर पड़ सकता है। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और उनके परिवारों के लिए भी यह चिंता की बात है। फीस, रहने का खर्च, बीमा, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतें सब कुछ महंगा हो जाता है। यही स्थिति विदेश यात्रा करने वालों के साथ भी होती है। होटल, भोजन, लोकल ट्रांसपोर्ट और शॉपिंग तक का खर्च बढ़ जाता है।
जब डॉलर मजबूत होता है और आयात बिल बढ़ता है, तो सरकार पर वित्तीय दबाव भी बढ़ने लगता है। सरकार को कई ऐसे भुगतान करने पड़ते हैं, जिनका संबंध विदेशी मुद्रा से होता है। ऐसे समय में बजट पर दबाव बढ़ने से विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर असर पड़ सकता है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं के खर्च की प्राथमिकताएं बदलनी पड़ सकती हैं। इसका सीधा असर जनता तक पहुंचने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।
रुपये की कमजोरी का एक बड़ा असर देश के चालू खाता घाटे पर भी पड़ता है। जब आयात अधिक और निर्यात अपेक्षाकृत कम होता है, तो देश से ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं। इससे विदेशी मुद्रा संतुलन बिगड़ता है और चालू खाता घाटा बढ़ता है। भारत के मामले में तेल और सोने का आयात विदेशी मुद्रा पर सबसे ज्यादा दबाव डालता है। अगर रुपया इसी तरह दबाव में रहा, तो देश की बाहरी वित्तीय स्थिति पर भी चिंता बढ़ सकती है। Indian Currency