चांदी की कीमतों में ऐतिहासिक तेजी देखने को मिल रही है और वायदा बाजार में इसके दाम 2.07 लाख रुपये के पार पहुंच चुके हैं। इंडस्ट्रियल और निवेश मांग में बढ़ोतरी, सप्लाई की कमी, रुपये की कमजोरी और फेड की संभावित रेट कट जैसे बड़े कारणों से चांदी में जबरदस्त उछाल आया है।

बीते कुछ समय से कमोडिटी बाजार में चांदी ने ऐसा तूफान मचाया है जिसे विशेषज्ञ ‘सफेद आंधी’ कह रहे हैं। देश के वायदा बाजार में चांदी की कीमतें 2.07 लाख रुपये के पार निकलकर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। यह तेजी अचानक नहीं आई है बल्कि इसके पीछे ग्लोबल और घरेलू स्तर पर कई मजबूत कारण काम कर रहे हैं। इंडस्ट्री से लेकर निवेशकों तक हर कोई चांदी की ओर आकर्षित हो रहा है।
सबसे पहले अगर चांदी के प्रदर्शन की बात करें तो हाल के महीनों में इसने सोने को भी पीछे छोड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉमेक्स पर चांदी पहली बार 66 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गई है। मार्च 2026 के वायदा कांट्रैक्ट में यह अपने लाइफटाइम हाई पर कारोबार करती दिखी। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से जब भी कीमती धातुओं में बड़ी तेजी आती है तो चांदी का प्रदर्शन सोने से बेहतर रहता है। लंबे समय तक कमजोर रहने के बाद अब चांदी की जबरदस्त वापसी देखने को मिल रही है।
चांदी की कीमतों में तेजी का दूसरा बड़ा कारण इसकी इंडस्ट्रियल और इंवेस्टमेंट डिमांड में जबरदस्त उछाल है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में चांदी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही निवेशकों ने भी चांदी को सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में अपनाया है। सिल्वर ETF में लगातार मजबूत निवेश देखने को मिल रहा है जिससे बाजार में मांग और ज्यादा मजबूत हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वजह है कि इस साल चांदी की कीमतों में 100 फीसदी से ज्यादा की तेजी का मजबूत आधार तैयार हुआ है।
तीसरा अहम कारण है सप्लाई और प्रोडक्शन में लगातार आ रही कमी। वैश्विक स्तर पर चांदी की सप्लाई लगातार पांचवें साल घाटे में बनी हुई है। खनन लागत बढ़ना, नए प्रोजेक्ट्स की कमी और सीमित उत्पादन ने सप्लाई को कमजोर कर दिया है। जब मांग बढ़ती है और सप्लाई घटती है तो कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक है। यही स्थिति इस समय चांदी के बाजार में साफ दिखाई दे रही है।
चांदी की कीमतों पर करेंसी का असर भी साफ नजर आ रहा है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर हुआ है और इस साल करीब 6 फीसदी तक गिर चुका है। चूंकि चांदी की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में तय होती हैं इसलिए रुपये की कमजोरी का सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है। जानकारों का मानना है कि 2026 की पहली छमाही तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है जिससे चांदी की कीमतों को और सपोर्ट मिल सकता है। इसके अलावा अमेरिका की इकोनॉमिक स्थिति और फेडरल रिजर्व की नीतियां भी चांदी को मजबूती दे रही हैं। हालिया जॉब डेटा और बढ़ती बेरोजगारी दर के संकेत बताते हैं कि फेड आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। ब्याज दरें घटने का मतलब है कि कीमती धातुओं में निवेश और ज्यादा आकर्षक हो जाता है। यही वजह है कि निवेशक पहले से ही चांदी में पोजिशन बना रहे हैं।
एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि चांदी ने कच्चे तेल को भी पीछे छोड़ दिया है। 40 साल बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब चांदी की कीमत कच्चे तेल से ऊपर निकल गई है। यह संकेत देता है कि भविष्य में चांदी सिर्फ ज्वेलरी या निवेश तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि यह ऊर्जा और इंडस्ट्रियल मेटल की तरह रणनीतिक महत्व रखेगी। अगर भारतीय बाजार की बात करें तो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर चांदी ने 2,07,833 रुपये प्रति किलो का लाइफटाइम हाई बनाया है। हालांकि हल्की मुनाफावसूली के कारण इसमें मामूली गिरावट देखने को मिल रही है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गिरावट अस्थायी है। मजबूत फंडामेंटल्स के चलते चांदी आने वाले महीनों में फिर नई ऊंचाइयों को छू सकती है।