Fake Encounter : गुजरात सरकार को याचिकाकर्ताओं के अधिकार पर संदेह
Gujarat Government doubts the authority of the petitioners
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 03:41 PM
नई दिल्ली। गुजरात सरकार ने 2002 से 2006 तक के फर्जी मुठभेड़ों से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ताओं के साथ सामग्री साझा करने पर सुप्रीम कोर्ट में आपत्ति जताई। सरकार ने कहा कि याचिका दायर करने के उनके अधिकार और मकसद के बारे में गंभीर संदेह है। इन मुठभेड़ों की जांच की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एचएस बेदी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी।
Fake Encounter
पत्रकार और गीतकार ने 2007 में दायर की थी याचिका
शीर्ष अदालत वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीज, प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर और शबनम हाशमी द्वारा 2007 में दायर दो अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच की मांग की गई थी। वर्गीज का 2014 में निधन हो गया था। इन याचिकाओं के दाखिल होने पर न्यायमूर्ति बेदी को 2002 से 2006 तक गुजरात में 17 कथित फर्जी मुठभेड़ मामलों की जांच कर रही निगरानी समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने शीर्ष अदालत को सीलबंद लिफाफे में एक रिपोर्ट सौंपी थी। समिति ने 2019 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और 17 मामलों में से तीन में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की थी।
राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति ए. अमानुल्लाह की पीठ को सोमवार को अवगत कराया कि याचिकाकर्ता उन राज्यों में होने वाली मुठभेड़ों के बारे में चिंतित नहीं हैं। जहां वे खुद रहते हैं, बल्कि उनका ध्यान केवल गुजरात की मुठभेड़ों पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के याचिका दायर करने के अधिकार एवं मकसद के बारे में गंभीर संदेह हैं। क्या इन दस्तावेजों को अजनबियों के साथ साझा किया जाना चाहिए?
Fake Encounter
राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया
शीर्ष अदालत ने 18 जनवरी को इस मामले पर सुनवाई करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया था कि पक्षकारों के वकीलों को सुनने पर यह सामने आया है कि अंततः यह मुद्दा अब बस तीन मुठभेड़ों के इर्द-गिर्द घूमता है। सोमवार को सुनवाई की शुरुआत में जब पीठ ने अपने पहले के आदेश का हवाला दिया तो एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि राज्य सरकार ने कुछ नहीं किया है।
मेहता ने कहा कि जांच या पूछताछ दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत की गई थी। याचिकाकर्ताओं के साथ कोई सामग्री साझा नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में रहने वाले लोगों ने मुठभेड़ों की विशेष अवधि की पहचान की है। अन्य राज्यों में भी मुठभेड़ की घटनाएं हुई हैं, लेकिन याचिकाकर्ता उनके लिए चिंतित नहीं हैं। जब पीठ ने पूछा कि रिपोर्ट पर राज्य का क्या रुख है तो मेहता ने कहा कि हमें रिपोर्ट पर कुछ कहना है।
12 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
प्रशांत भूषण ने दलील दी कि इस मामले में, शीर्ष अदालत ने जांच के लिए एक पूर्व न्यायाधीश को नियुक्त किया था। रिपोर्ट कहती है कि तीन मुठभेड़ फर्जी प्रतीत होती हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई 12 जुलाई के लिए स्थगित करते हुए कहा कि हमें इस मुद्दे का समाधान करना होगा।
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