Dadri News: ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के पूर्व GM रविंद्र तोंगड़, पत्नी कुशल सिंह समेत 14 पर 34 हजार वर्गमीटर जमीन और करीब 5 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी का केस दर्ज हुआ है। मामला दादरी की राजनीति से भी जुड़ा है।

दादरी विधानसभा क्षेत्र में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के महाप्रबंधक (General Manager) रविन्द्र तोंगड़ की खूब चर्चा हो रही है। इस चर्चा का बड़ा कारण यह है कि रविन्द्र तोंगड़ तथा उनका परिवार दादरी विधानसभा क्षेत्र में घूम-घूमकर यह प्रचार कर रहा है कि उनको भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का सीधा आशीर्वाद प्राप्त है। इसी आशीर्वाद के दम पर उनकी पत्नी श्रीमती कुशल सिंह को दादरी विधानसभा सीट से बीजेपी का टिकट मिलने वाला है। इस बीच दादरी क्षेत्र में रविन्द्र तोंगड़ की तुलना नोएडा प्राधिकरण के पूर्व चार्चित GM यादव सिंह के रूप में होने लगी है।
दादरी विधानसभा क्षेत्र में चर्चा है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में तैनात रहते समय रविन्द्र तोंगड़ ने यादव सिंह से भी ज्यादा "मलाई" खाई थी। सबको पता है कि बसपा के कार्यकाल में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का पूरा संचालन रविन्द्र तोंगड़ के इशारे पर ही होता था। इसी कारण रविन्द्र तोंगड़ के हिस्से में प्रतिदिन मोटी “मलाई” चाटी थी। सरकार बदलने पर रविन्द्र तोंगड़ को यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरण में तैनात किया गया था। यादव सिंह की तरह CBI तथा गिरफ्तारी के डर से रविन्द्र तोंगड़ ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। नौकरी छोड़ने के बाद रविन्द्र तोंगड़ के बड़े-बड़े महल, बड़ा स्कूल तथा बड़े-बड़े मॉल ग्रेटर नोएडा में चारों तरफ नजर आए। लंबे अरसे तक “गायब” रहने के बाद रविन्द्र तोंगड़ इन दिनों दादरी विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं।
आपको बता दें कि नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों में कथित भ्रष्टाचार और जमीन से जुड़े पुराने विवादों की चर्चा के बीच ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के पूर्व महाप्रबंधक (GM) रविंद्र तोंगड़ का नाम एक नए मुकदमे के कारण सुर्खियों में है। रविंद्र तोंगड़ तथा उनकी पत्नी कुशल सिंह समेत कुल 14 लोगों के खिलाफ करीब 34 हजार वर्गमीटर जमीन और लगभग पांच करोड़ रुपये समेत अन्य रकम की कथित हेराफेरी के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ है। यह मामला नोएडा के सेक्टर-20 थाने में अदालत के आदेश के बाद दर्ज किया गया है। मामले को इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि आरोपी रविन्द्र तोंगड़ की पत्नी कुशल सिंह दादरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा टिकट की दावेदार बताई जा रही हैं। ऐसे में जमीन विवाद से जुड़ी FIR ने दादरी की सियासत में भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायतकर्ता गायत्री हॉस्पिटैलिटी एंड रियलकॉन लिमिटेड के अनुसार, ग्रेटर नोएडा वेस्ट में कंपनी को लगभग 72 हजार वर्गमीटर का GH-11 भूखंड आवंटित किया गया था। फरवरी 2011 में इसकी लीज डीड हुई थी। शिकायत के मुताबिक वर्ष 2013 में परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए करीब 20 हजार वर्गमीटर जमीन को अलग से विकसित करने अथवा सब-लीज करने पर सहमति बनी थी। आरोप है कि इसी प्रक्रिया में तत्कालीन GM रविंद्र तोंगड़ ने अपने पद का कथित दुरुपयोग करते हुए जमीन को इंटाईसमेन्ट इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के नाम सब-लीज कराने में भूमिका निभाई। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि उक्त कंपनी से जुड़े कुछ निदेशक रविंद्र तोंगड़ के करीबी थे और उनकी पत्नी कुशल सिंह को कंपनी में शेयरधारक बनाया गया था।
मामले की शिकायत में गंभीर आरोप लगाया गया है कि निर्धारित रकम का पूरा भुगतान किए बिना ही जमीन के अधिकार हासिल कर लिए गए। शिकायतकर्ता ने बैलेंस शीट, सब-लीज डीड, प्राधिकरण की फाइलों और संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पूरे विवाद में करीब 34 हजार वर्गमीटर जमीन और लगभग पांच करोड़ रुपये समेत अन्य बकाया रकम की कथित हेराफेरी का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने अदालत के निर्देश पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की है। FIR में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराएं लगाई गई हैं।
इस मामले का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यह है कि FIR में नामजद कुशल सिंह को दादरी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की संभावित दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। स्थानीय राजनीतिक हलकों में उनकी दावेदारी को लेकर पहले से चर्चा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जमीन से जुड़े इतने गंभीर आरोपों वाली FIR दादरी में भाजपा की टिकट की दौड़ को प्रभावित करेगी?
नोएडा-ग्रेटर नोएडा की अथॉरिटी में भ्रष्टाचार के मामलों की बात होती है तो पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह का मामला सबसे चर्चित उदाहरणों में रहा है। यादव सिंह के खिलाफ CBI ने भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े और सरकारी पद के दुरुपयोग से जुड़े मामले दर्ज किए थे। उन्हें 2016 में CBI ने गिरफ्तार भी किया था। CBI की जांच में यादव सिंह के कार्यकाल से जुड़े टेंडरों में निजी कंपनियों को कथित लाभ पहुंचाने के आरोप सामने आए थे। एक मामले में 29 निजी फर्मों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये के टेंडर पास किए जाने के आरोप भी लगाए गए थे। यही वजह है कि रविंद्र तोंगड़ के खिलाफ जमीन और धन की कथित हेराफेरी की FIR सामने आने के बाद नोएडा-ग्रेटर नोएडा में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अथॉरिटी के पुराने दौर की जमीन और आर्थिक अनियमितताओं की परतें अब दोबारा खुलेंगी? हालांकि दोनों मामलों की प्रकृति और जांच अलग-अलग है। इसलिए रविंद्र तोंगड़ को यादव सिंह के बराबर या उनसे अधिक भ्रष्ट बताना अभी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। रविंद्र तोंगड़ के खिलाफ फिलहाल FIR और आरोप हैं, अदालत से दोषसिद्धि नहीं हुई है।
रविंद्र तोंगड़ के कार्यकाल को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं। अब नई FIR सामने आने के बाद उनके पुराने कार्यकाल से जुड़े फैसलों, जमीन आवंटन, सब-लीज और कंपनियों के साथ हुए लेनदेन की भी जांच की मांग उठ सकती है। विशेष रूप से यह जांच महत्वपूर्ण होगी कि जिस समय संबंधित जमीन से जुड़े निर्णय लिए गए, उस समय अथॉरिटी की फाइलों में क्या प्रक्रिया अपनाई गई थी, किन अधिकारियों ने अनुमोदन दिया था और संबंधित कंपनियों के बीच आर्थिक लेनदेन किस प्रकार हुआ।
इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पुलिस जांच की होगी। जांच में यह सामने आना बाकी है कि 72 हजार वर्गमीटर के मूल आवंटन से लेकर 20 हजार और 14 हजार वर्गमीटर जमीन की कथित सब-लीज तक कौन-कौन से दस्तावेज तैयार हुए, किसने हस्ताक्षर किए और संबंधित रकम का भुगतान वास्तव में किसके खाते में हुआ। जांच एजेंसियों के लिए कंपनी की बैलेंस शीट, सब-लीज डीड, बैंक लेनदेन, अथॉरिटी की मूल फाइलें और संबंधित कंपनियों की शेयरहोल्डिंग अहम साक्ष्य बन सकती हैं।
पूरे मामले में तीन चीजें एक साथ सामने आ रही हैं हजारों वर्गमीटर जमीन, करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन और दादरी विधानसभा की राजनीति। यही वजह है कि यह मामला महज एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। अब नजर इस बात पर है कि पुलिस जांच कहां तक पहुंचती है, नामजद आरोपियों से पूछताछ होती है या नहीं और जांच में अथॉरिटी के तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका सामने आती है या नहीं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि FIR दर्ज होने के बाद रविंद्र तोंगड़ और उनकी पत्नी कुशल सिंह से जुड़ा यह मामला दादरी की राजनीति और नोएडा-ग्रेटर नोएडा की अथॉरिटी की पुरानी कार्यप्रणाली-दोनों के लिए असहज सवाल खड़े कर रहा है।
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