दादरी के राजा राव उमराव सिंह गुर्जर का नाम 1857 की क्रांति के इतिहास में आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है ? दादरी रियासत के इस राजा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किस तरह मोर्चा संभाला? गुलावठी में अंग्रेजी सेना के साथ हुए संघर्ष में क्या हुआ था?

Dadri News : दादरी क्षेत्र का इतिहास बहुत पुराना इतिहास है। दादरी क्षेत्रके पुराने इतिहास में सबसे बड़ा नाम आता है दादरी की रियासत के तत्कालीन राजा राव उमराव सिंह का। राजा उमराव सिंह का बलिदान दिवस गुर्जर समाज के द्वारा हर साल मनाया जाता है। इस अवसर पर राजा राव उमराव सिंह का 170 वां बलिदान दिवस मनाया गया। दादरी रियासत के महान क्रांतिकारी एवं अमर शहीद राजा राव उमराव सिंह गुर्जर का 170वां बलिदान दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया। दी गुर्जर विद्या सभा, दादरी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस अवसर पर राजा राव उमराव सिंह गुर्जर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें तथा उनके क्रांतिकारी सहयोगियों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।Dadri News
विज्ञप्ति में कहा गया है कि दादरी रियासत के राजा राव उमराव सिंह गुर्जर और उनके परिवार का भारत की आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति के अग्रदूतों में शामिल बताया गया है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राव साहब ने क्षेत्र के हजारों क्रांतिकारियों तथा मालागढ़ रियासत के नवाब बलिदाद खां के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था। विज्ञप्ति के मुताबिक 30-31 मई 1857 को हिंडन नदी के तट पर गाजियाबाद में अंग्रेजी सेना के साथ भीषण युद्ध हुआ। इसके बाद क्रांतिकारियों ने सिकंदराबाद के कोतवाली और बुलंदशहर जेल पर कब्जा कर लिया तथा तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों से जुड़े परिवारों को बुलंदशहर से बाहर भेज दिया गया। Dadri News
प्रेस विज्ञप्ति में आगे बताया गया है कि जून 1857 में अंग्रेजी सेना के दोबारा बुलंदशहर पर नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास के दौरान गुलावठी में अंग्रेजी सेना और राजा राव उमराव सिंह गुर्जर तथा नवाब बलिदाद खां के नेतृत्व वाली देशी सेना के बीच भीषण संघर्ष हुआ। विज्ञप्ति के अनुसार इस युद्ध में अंग्रेजी सेना को परास्त किया गया। इसके बाद राजा राव उमराव सिंह गुर्जर और नवाब बलिदाद खां ने अपने सहयोगियों के साथ बहादुर शाह जफर द्वितीय को दिल्ली के लाल किले में राजसिंहासन पर विराजमान कराकर उन्हें पुनः देश का बादशाह घोषित किया। Dadri News
28 सितंबर 1857 को गुलावठी में अंग्रेजी सेना और देशी सेना के बीच एक और भीषण युद्ध हुआ। इसमें देशी सेना की हार हुई। विज्ञप्ति में कहा गया है कि नवाब बलिदाद खां अपने सहयोगियों के साथ युद्ध मैदान छोड़कर गंगा पार चले गए, जबकि राजा राव उमराव सिंह गुर्जर अलग पड़ गए और अंग्रेजी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके अगले दिन 29 सितंबर 1857 को राजा राव उमराव सिंह गुर्जर को अंग्रेजों द्वारा बुलंदशहर के 'काला आम चौराहा' पर आम के पेड़ से फांसी दिए जाने का उल्लेख प्रेस विज्ञप्ति में किया गया है। विज्ञप्ति के अनुसार उन्हें कई दिनों तक वहीं लटकाए रखा गया, ताकि लोगों में भय पैदा हो और उनके खिलाफ दोबारा क्रांति न भड़के। इस भीषण युद्ध को लेकर यह भी दावा किया जाता है कि इसी दौर में दादरी, सिकंदराबाद और दनकौर क्षेत्र के करीब 87 अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी दी गई, जिनमें अधिकांश गुर्जर समाज के लोग थे। इस तरह राजा राव उमराव सिंह गुर्जर की शहादत को दादरी क्षेत्र के 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जोड़कर देखा गया है। Dadri News
दी गुर्जर विद्या सभा, दादरी द्वारा संचालित विभिन्न शिक्षण संस्थानों और मिहिर भोज सार्वजनिक पुस्तकालय में भी राजा राव उमराव सिंह गुर्जर के 170वें बलिदान दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इनमें मिहिर भोज बालक इंटर कॉलेज, बालिका इंटर कॉलेज, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बालिका स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बालिका जूनियर हाईस्कूल, प्राथमिक स्कूल, आईटीआई और मिहिर भोज सार्वजनिक पुस्तकालय शामिल रहे। इन संस्थानों में राजा राव उमराव सिंह गुर्जर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें और उनके क्रांतिकारी सहयोगियों को श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम में कॉलेजों की प्रबंध समितियों के पदाधिकारी, प्रधानाचार्य, शिक्षक-शिक्षिकाएं और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। इस दौरान दी गुर्जर विद्या सभा, दादरी के सचिव रामशरण नागर एडवोकेट तथा कार्यकारिणी के अन्य पदाधिकारियों और क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने दादरी कोतवाली के सामने स्थित राजा राव उमराव सिंह गुर्जर की प्रतिमा पर भी माल्यार्पण किया। इस दौरान महान क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। Dadri News
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