Greater Noida News : किसानों का बड़ा आरोप, तानाशाह बन गया है ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण
Officers of the authority are introducing dictatorship by not listening to the agitating farmers
भारत
चेतना मंच
18 May 2023 05:49 PM
- Published by Aman Bhati
ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में शुमार ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अफसरों पर तानाशाही करने का आरोप लगा है। इस आरोप के पीछे इस प्राधिकरण के कार्यालय के बाहर 24 दिन से चल रहा किसानों का धरना है। किसानों का साफ कहना है कि किसानों के साथ इतनी बेरूखी तो अंग्रेजों के शासन में भी नहीं की जाती थी, जितनी अब की जा रही है। पूरे क्षेत्र के किसान अपना सारा कामकाज छोड़कर 24 दिन से प्राधिकरण के दरवाजे पर बैठे हुए हैं, किन्तु प्राधिकरण के अफसर उनकी बात सुनने तक को तैयार नहीं हैं। किसानों का साफ आरोप है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अफसरों की गलत नीतियों के कारण यह प्राधिकरण प्रोपर्टी डीलर बन गया है। प्राधिकरण का काम केवल जमीन बेचकर मुनाफा कमाना रह गया है। प्रोपर्टी की दलाली के इस धंधे में प्राधिकरण के अफसर भी माला-माल हो रहे हैं।
Greater Noida News
क्या है पूरा मामला
सब जानते हैं कि ग्रेटर नोएडा शहर का पूरा अस्तित्व किसानों से अधिग्रहित की गई जमीन पर टिका हुआ है। यदि किसान अपनी जमीन ही नहीं देते तो इस शहर का अस्तित्व ही नहीं होता। इस शहर को बसाने के लिए बनाया गया ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण अब से 22 वर्ष पूर्व वर्ष-1991 में अस्तित्व में आया था। शुरू के वर्षों में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण किसानों का खूब हिमायती थी। किसानों की समस्याओं को प्रमुखता से सुना जाता था। आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में प्राधिकरण के अफसरों ने किसान विरोधी रवैया अपना रखा है। किसानों की एक दर्जन से अधिक जरूरी मांगें अटकी पड़ी हैं। अलग-अलग किसान संगठनों ने इन मांगों के लिए आंदोलन चलाए, किन्तु किसानों को फायदा होने की बजाय कुछ नेता प्राधिकरण के अफसरों की ‘दलाली’ करते माला-माल हो गए। किसानों की समस्या ज्यों की त्यों ही बनी हुई है।
ताजा आंदोलन व मुद्दे
हाल ही में ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण पर सैकड़ों किसान 25 अप्रैल 2023 से दिन-रात धरना दे रहे हैं। धरने के 24 दिन बीत जाने के बाद भी प्राधिकरण के अफसर उनकी मांग पूरी करना तो दूर, उनकी बात तक नहीं सुन रहे हैं। किसानों के इस आंदोलन की अगुवाई अखिल भारतीय किसान सभा नामक संगठन कर रहा है। संगठन के नेता भूपेश वर्मा ने चेतना मंच को बताया कि हमारे संगठन ने प्राधिकरण के अफसरों से लेकर उप्र के मुख्यमंत्री तक को 9 सूत्रीय ज्ञापन दे रखा है। दुर्भाग्य यह है कि अफसर व नेता ज्ञापन पर जरा भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। श्री वर्मा ने कहा कि इस बार किसान पूरी तैयारी करके प्राधिकरण पर आए हैं। जब तक उनकी सभी मांगें नहीं मान ली जातीं, किसान वापस नहीं जाएंगे। उन्होंने तो यहां तक कहा कि सभी किसान एक साल तक आंदोलन चलाने की योजना बनाकर आए हैं। इस बार किसान अपना हक लेकर ही प्राधिकरण से वापस जाएंगे।
किसानों के ज्ञापन की सभी 9 मांगें, आप भी पढ़ें :1. यह है कि शासनादेश संख्या 4/4/1/2011 सीएक्स (1) लखनऊ दिनांक 29 अगस्त 2011 द्वारा ठाकुर जयवीर सिंह माननीय मंत्री जी की अध्यक्षता में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका संख्या 37443/2011 गजराज सिंह एवं अन्य प्रति उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य तथा अन्य रिट याचिकाओं के समेकित रूप से पारित आदेश दिनांक 21/10/2011 के आलोक में क्रियान्वयन हेतु अनुशंसा दिनांक 02/11/2011 में याचीगणों के अतिरिक्त समान रूप से प्रभावित प्राधिकरण क्षेत्र के समस्त कृषकों को उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से आच्छादित करने की सिफारिशें की गई है। यह भी सिफारिश की गई है कि उक्त सिफारिशों को आगामी बोर्ड बैठक में ले जाया जाए। प्राधिकरण ने अतिरिक्त प्रतिकर के संबंध में उपरोक्त समिति की सिफारिश को 91वीं बोर्ड बैठक में अनुमोदित कर अतिरिक्त प्रतिकर का वितरण भी कर दिया है। प्राधिकरण ने दूसरी सिफारिश को आज की दिनांक तक लागू नहीं किया है, जिससे कृषकों में भारी रोष है प्राधिकरण क्षेत्र के लगभग 1,00,000 किसान 10 प्रतिशत आबादी प्लाट के लाभ से वंचित हैं। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि कृषकों के कुल अधिग्रहीत रकबे में से ही 10 फीसदी आबादी प्लाट विकसित कर दिए जाते हैं, जिसके संबंध में कृषक 10 प्रतिशत भूमि के एवज में प्राप्त प्रतिकर एवं विकास शुल्क प्राधिकरण में जमा करते हैं। प्लाट देने से प्राधिकरण पर कोई अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं पड़ता है। लंबा आंदोलन करने के बावजूद प्राधिकरण के अधिकारी किसानों की मांग से सिद्धांतिक सहमत व्यक्त करने के बावजूद उक्त समिति की सिफारिशों को लागू नहीं करना चाहते और टालमटोल कर आश्वासन देकर मामले को खत्म करना चाहते हैं।
2. यह है कि नया भूमि अधिग्रहण कानून 1 जनवरी 2014 से पूरे देश में प्रभावी है। कानून के अनुसार सर्किल रेट अथवा बाजार दर में जो अधिक हो, का ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना एवं शहरी क्षेत्र में दो गुना मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है। कानून के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्राधिकरण क्षेत्र के अधिसूचित ग्रामों में शासनादेश संख्या- 314/77-3-16-163 एम 15 के अनुसार खरीद की प्रक्रिया का निर्धारण किया गया है, परन्तु प्राधिकरण के अधिसूचित ग्रामों में 2014 से आज की दिनांक तक सर्किल रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है, जबकि प्राधिकरण के अपनी आवंटन दरों एवं जिलाधिकारी महोदय ने शहरी क्षेत्र की दरों में हर दो तीन वर्ष के अंतराल पर लगातार बढ़ोतरी की है। इतना ही नहीं, प्राधिकरण ने शासन को पत्र प्रेषित कर प्राधिकरण क्षेत्र के समस्त गांवों को शहरी क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की जिस पर अमल करते हुए शासन ने प्राधिकरण क्षेत्र के अविकसित गांवों को भी शहरी घोषित कर दिया, जिससे 2015 में प्राधिकरण क्षेत्र के अधिकांश गांवों में ग्राम पंचायतें समाप्त हो गई यह कार्य इसलिए किया गया, जिससे कि ग्रामीण क्षेत्र शहरी क्षेत्र में परिभाषित हो जाए। इतना ही नहीं, प्राधिकरण ने शहरी क्षेत्र घोषित करते समय शहरी क्षेत्र की प्रचलित सर्किल दरों को खरीद का आधार नहीं बनाया है। इस तरह प्राधिकरण क्षेत्र के ग्रामों में हो रही खरीद कानून का उल्लंघन कर की जा रही है एवं नए कानून के तहत दिए जाने वाले सभी लाभों से प्रभावित किसानों को वंचित किया जा रहा है। कृषकों की मांग है कि नए कानून के सभी प्रावधानों को प्रभावित किसानों पर लागू किया जाए।
3. आबादी अधिग्रहण के संबंध में 24 अप्रैल 2010 के शासनादेश एवं आबादी नियमावली 2011 यथा संशोधित 2015 के अंतर्गत निस्तारित मामलों में से 1451 मामले एसआईटी जांच के उपरान्त शासन स्तर से किसानों के पक्ष में लीजबैक करने हेतु अनुमोदित किए गए हैं, जबकि नियमावली के अंतर्गत बकाया 533 मामले एवं बादलपुर चौगानपुर के 208 मामले में शासन स्तर से अनुमोदन प्राप्त करना शेष है। अनुमोदन के लिए उक्त मामले शासन स्तर पर चार वर्ष से लंबित है। प्राधिकरण के अधिकारी उपरोक्त प्रकरणों में शासन स्तर पर कोई पैरवी नहीं कर रहे हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी के स्पष्ट निर्देश के बावजूद शासन से अनुमोदन प्राप्त 1451 प्रकरणों की लीजबैक की प्रक्रिया लंबित है। पिछले एक वर्ष में केवल 20-25 मामलों में ही लीजबैक की गई है। हाल ही में 10 गांवों के संबंध में आबादी निस्तारण की सुनवाई गई है, परन्तु अभी तक भी आबादी निस्तारण के मामलों को बोर्ड बैठक से अनुमोदन नहीं किया गया है।
4. आबादी की लीजबैक के 2192 प्रकरणों में से प्राधिकरण ने अपनी महायोजना के अनुसार 211 मामलों में किसानों की आबादी को विकसित जगह से गांव की तरफ कम विकसित जगह पर शिफ्ट किया है। किसानों ने सहयोग किया एवं प्राधिकरण ने किसानों की आबादियों को गांव की तरफ शिफ्ट कर दिया। शिफ्टिंग के संबंध में आबादी नियमावली की धारा पांच में समुचित प्रावधान किए गए हैं, परन्तु शिफ्टिंग के संबंध में नीतिगत निर्णय के संबंध में गठित समिति जिसके अध्यक्ष डॉक्टर अरुण वीर सिंह हैं, ने अपनी अध्यक्षता में शिफ्टिंग प्रकरणों के संबंध में शिफ्टिंग में दिए जाने वाले रकबे को आधा कर देने का मॉडल ड्राफ्ट शासन को प्रेषित किया है, जबकि प्राधिकरण बोर्ड से शिफ्टिंग की आबादियों के संपूर्ण रकबे का अनुमोदन किया जा चुका है। अनुमोदित रकबे को नियमावली के प्रावधनों के अनुसार किसानों के पक्ष में लीजबैक किया जाना है। इसलिए शासन को प्रेषित शिफ्टिंग के ड्राफ्ट को वापस लिया जाकर शिफ्टिंग में अनुमोदित संपूर्ण रकबे को लीज बैक किया जाए।
5. यह है कि किसानों की अधिग्रहीत भूमि के एवज में पुनर्वास हेतु दिए जाने वाले प्लाट का न्यूनतम साइज 56वीं बोर्ड बैठक में 120 वर्ग मीटर निर्धारित था, जिसे 99वीं बोर्ड बैठक में घटाकर 40 वर्गमीटर कर दिया गया एवं 117वीं बोर्ड बैठक में 40 वर्गमीटर को भी समाप्त कर दिया गया। किसानों को दिए जाने प्लाट का न्यूनतम पुन: 120 वर्गमीटर किया जाए।
6. यह है कि प्राधिकरण द्वारा आवासीय योजनाओं में किसानों का 17.5 प्रतिशत कोटा निर्धारित था। यमुना प्राधिकरण में किसान कोटे का प्रावधान अभी भी विद्यमान हैं, परन्तु प्राधिकरण ने किसानों का 17.5 प्रतिशत कोटा समाप्त कर दिया है। किसानों का 17.5 प्रतिशत कोटा पुन: बहाल किया जाए।
7. यह है कि 3 सितंबर 2010 के शासनादेश के अनुसार अधिग्रहण से प्रभावित प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को अनिवार्य रोजगार दिया जाए एवं शासनादेश के अनुसार प्रत्येक प्रभावित परिवार को 120 वर्गमीटर का न्यूनतम प्लाट दिया जाए।
8. यह है कि वर्ष 2011 में पतवाड़ी में किसानों के साथ किए गए समझौते के अनुसार अधिग्रहण से प्रभावित गांव के प्रत्येक भूमिहीन परिवार को 40 वर्ग मीटर का प्लाट दिया जाए।
9. यह है कि किसानों को दिए जाने वालों आबादी प्लाटों पर प्राधिकरण द्वारा पेनाल्टी लगाई गई को समाप्त किया जाए।
तानाशाही का आरोप!
ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के अधिकतर आम नागरिक भी किसानों की मांगों का समर्थन कर रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी तंत्र को प्रत्येक व्यक्ति की बात सुनकर उसका समाधान करना आवश्यक है। इतने सारे किसान रात-दिन प्राधिकरण के दरवाजे पर बैठे हैं और उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। यह तो सरासर तानाशाही है। ऐसी तानाशाही तो अंग्रेजों के राज में भी नहीं होती थी।
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