नोएडा और दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के साथ प्रदूषण का खतरा बढ़ने लगा है। सरकार ने रोकथाम के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन क्या ये इंतजाम जमीन पर असर दिखा पा रहे हैं?

Delhi News : दिल्ली-NCR में बिगड़ती हवा ने लोगों की सेहत पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। हर साल सर्दियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार और प्रशासन को पहले से पता है कि इस मौसम में हवा जहरीली हो जाती है, तो समय रहते ठोस इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? आखिर कब तक लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर रहेंगे? हालात ऐसे हैं कि लोगों के लिए खुली हवा में सांस लेना भी किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। सुबह घर से निकलते ही धुंध और प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल सर्दियों में यही हाल क्यों होता है ? संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में जीवन जीना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। ऐसे में स्वच्छ हवा कोई सरकारी एहसान नहीं है, बल्कि नागरिकों का अधिकार है। फिर नोएडा समेत पूरे NCR में लोगों को इस अधिकार से वंचित क्यों होना पड़ रहा है? हर साल प्रदूषण बढ़ता है, बैठकें होती हैं, आदेश जारी किए जाते हैं, निर्माण कार्यों पर रोक लगती है और पानी का छिड़काव शुरू हो जाता है। लेकिन कुछ दिन बाद हालात फिर पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल यह है कि क्या प्रदूषण नियंत्रण की पूरी व्यवस्था केवल AQI का आंकड़ा बढ़ने के बाद सक्रिय होने के लिए बनाई गई है? क्या आम लोगों को हर साल जहरीली हवा में सांस लेने के लिए छोड़ देना ही प्रशासन की मजबूरी बन गया है?
नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण बढ़ना कोई नई बात नहीं है। इसके कारण भी किसी से छिपे नहीं हैं। सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण स्थलों से निकलने वाले कण, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना और आसपास के राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं। इसके बावजूद सवाल उठता है कि इन समस्याओं पर सालभर सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती ? निर्माण स्थलों की निगरानी तब क्यों तेज होती है, जब हवा पहले ही जहरीली हो चुकी होती है ? सड़कों की सफाई और धूल नियंत्रण के इंतजाम प्रदूषण गंभीर होने के बाद ही क्यों याद आते हैं ? क्या जिम्मेदार एजेंसियों को हर साल नवंबर का इंतजार रहता है ?
दिल्ली-NCR में प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान यानी GRAP लागू किया जाता है। इसके तहत प्रदूषण बढ़ने पर निर्माण गतिविधियों पर रोक, सड़कों पर पानी का छिड़काव, मशीनी सफाई, डीजल जनरेटर पर नियंत्रण और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर सख्ती जैसे कदम उठाए जाते हैं। CAQM ने 29 सितंबर 2026 को GRAP में संशोधन किया था। वहीं, 30 अक्टूबर के आदेश में 5 से 20 नवंबर तक धूल पैदा करने वाली निर्माण और तोड़फोड़ गतिविधियों पर रोक सहित कई एहतियाती कदम तय किए गए। दिल्ली के निजी कार्यालयों में कम से कम 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम देने का निर्देश भी जारी किया गया। लेकिन सवाल यह है कि आदेश जारी होने से हवा साफ हो जाएगी या उनका पालन भी कराना पड़ेगा ? 30 सितंबर तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश अपने वार्षिक प्रदूषण नियंत्रण एक्शन प्लान के केवल 40 से 60 प्रतिशत उपाय ही पूरे कर पाए थे। जब तैयारी ही अधूरी है, तो प्रदूषण पर नियंत्रण के दावे कितने प्रभावी होंगे?
प्रदूषण को केवल आंखों में जलन या खांसी की समस्या समझना बड़ी भूल होगी। हवा में मौजूद PM2.5 जैसे बेहद महीन कण सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं।
लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से इन बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है:
सबसे ज्यादा खतरा बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को रहता है। यानी प्रदूषण केवल कुछ दिनों की परेशानी नहीं है। इसका असर लंबे समय तक शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। सवाल यह है कि जिस हवा में लोग सांस ले रहे हैं, उसे साफ रखने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा?
वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर असर कितना गंभीर हो सकता है, इसका अंदाजा इस तुलना से लगाया जा सकता है कि कुछ वैज्ञानिक अनुमानों में हवा में मौजूद PM2.5 के हर 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के स्तर को एक सिगरेट के बराबर प्रदूषण संपर्क के रूप में समझाया गया है। इस गणना के आधार पर यदि PM2.5 का स्तर लगभग 330-440 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो, तो एक दिन का प्रदूषण संपर्क करीब 15-20 सिगरेट के बराबर बैठ सकता है। इसका सीधा असर फेफड़ों और हृदय की सेहत पर पड़ सकता है।
भारत में स्वच्छ हवा में सांस लेना केवल लोगों की जरूरत नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि जीवन का अधिकार तभी सार्थक है, जब नागरिकों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिले। संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत पर्यावरण की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब स्वच्छ हवा नागरिकों का मौलिक अधिकार है, तो नोएडा और दिल्ली-NCR के लोगों को हर साल जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है ? क्या सरकारी एजेंसियां नागरिकों के इस संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा रही हैं ?
अगर प्रदूषण के मूल कारणों पर अभी से सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो हर साल सर्दियों में यही संकट और गंभीर रूप ले सकता है। सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का बोझ बढ़ेगा, अस्पतालों पर दबाव बढ़ेगा और बच्चों के स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है। सबसे ज्यादा मुश्किल उन लोगों के सामने होगी, जिन्हें रोजी-रोटी के लिए सड़कों पर काम करना पड़ता है। ट्रैफिक पुलिसकर्मी, डिलीवरी कर्मचारी, निर्माण मजदूर और सड़क किनारे काम करने वाले लोग घंटों प्रदूषित हवा के संपर्क में रहते हैं। उनके पास घर के अंदर रहने का विकल्प भी नहीं होता।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लोगों को हर साल जहरीली हवा में सांस लेने और बीमार पड़ने के बाद सरकारी कार्रवाई का इंतजार करना पड़ेगा? स्वच्छ हवा कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि नागरिकों का बुनियादी अधिकार है। अब केवल बैठकें, आदेश और दावे नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहिए।
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