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दिल्ली में बिहार बीजेपी की कोर कमेटी की प्रस्तावित बैठक आखिरी क्षणों में रद्द होने के बाद राज्य की राजनीति में अचानक हलचल तेज हो गई है। इस बैठक को लेकर पहले से ही काफी उत्सुकता थी, क्योंकि माना जा रहा था कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और नए मुख्यमंत्री के नाम पर अहम चर्चा हो सकती है।

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Delhi News : दिल्ली में बिहार बीजेपी की कोर कमेटी की प्रस्तावित बैठक आखिरी क्षणों में रद्द होने के बाद राज्य की राजनीति में अचानक हलचल तेज हो गई है। इस बैठक को लेकर पहले से ही काफी उत्सुकता थी, क्योंकि माना जा रहा था कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और नए मुख्यमंत्री के नाम पर अहम चर्चा हो सकती है। यही वजह थी कि बिहार बीजेपी के कई बड़े नेता खास तौर पर दिल्ली पहुंचे थे। लेकिन जब तय समय से ठीक पहले बैठक नहीं हो सकी, तो राजनीतिक गलियारों में कई तरह के सवाल उठने लगे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी अब भी बिहार के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर पूरी तरह एकमत नहीं हो सकी है।
इस बैठक को लेकर गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा रहा था कि बिहार के दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा के साथ प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष भी दिल्ली पहुंचे थे। राजनीतिक माहौल ऐसा बन गया था कि अब नए नेतृत्व पर कोई ठोस संकेत सामने आ सकता है। इसी बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी दिल्ली में होना इस पूरे घटनाक्रम को और अहम बना रहा था। ऐसे में जब बैठक टल गई, तो इसे केवल सामान्य प्रशासनिक बदलाव या कार्यक्रम में फेरबदल मानना आसान नहीं रह गया। पार्टी के भीतर क्या चल रहा है, इसे लेकर कयासों का बाजार गर्म हो गया। खबरों में यह भी सामने आया कि बिहार बीजेपी के नेता दिल्ली पहुंचे थे, लेकिन बाद में बैठक रद्द होने के बाद वापस लौटने लगे।
राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में यह बात है कि बिहार बीजेपी के भीतर भावी मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर पूरी सहमति बनती नहीं दिख रही। जिस नाम की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, उस पर भी पार्टी के सभी प्रभावशाली नेताओं की एक जैसी राय नहीं बताई जा रही। यही वजह मानी जा रही है कि बैठक को आगे बढ़ाने के बजाय फिलहाल टाल देना बेहतर समझा गया।
किसी भी बड़े राजनीतिक फैसले में अगर शीर्ष स्तर पर मतभेद की स्थिति बनती है, तो पार्टी अक्सर अंतिम घोषणा से पहले और विचार-विमर्श करती है। बिहार के मामले में भी अब यही तस्वीर उभरती नजर आ रही है। बैठक रद्द होने से यह संदेश गया है कि फैसला जितना आसान माना जा रहा था, उतना है नहीं।
बैठक का रद्द होना सिर्फ संगठनात्मक मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बीजेपी की रणनीतिक सतर्कता और अंदरूनी समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। एक तरफ पार्टी यह नहीं चाहती कि नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई ऐसा संदेश जाए, जिससे सहयोगी दलों में असहजता पैदा हो। दूसरी तरफ वह यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि जो नाम सामने आए, उसके पीछे संगठन और विधायक दल दोनों का पर्याप्त समर्थन हो। यही कारण है कि अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पार्टी भीतर से पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। राजनीतिक रूप से देखें तो ऐसे मौके पर बैठक रद्द होना इस बात का संकेत हो सकता है कि बातचीत अभी अधूरी है और अंतिम फैसला कुछ और दौर की मशक्कत के बाद ही लिया जाएगा।
बिहार की मौजूदा राजनीति में नीतीश कुमार का नाम और उनकी भूमिका अब भी बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में बीजेपी के लिए यह केवल अपना नेता चुनने का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सत्ता-संतुलन को साधने की चुनौती भी है। अगर नेतृत्व परिवर्तन का संदेश गलत ढंग से गया, तो इसका असर गठबंधन की धारणा पर भी पड़ सकता है। पार्टी इस बात को लेकर भी सावधान दिख रही है कि कहीं ऐसा माहौल न बने कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार को किनारे कर दिया गया। यही वजह है कि बीजेपी कदम-दर-कदम बेहद सोच-समझकर आगे बढ़ना चाहती है। इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक संवेदनशीलता उतनी ही बड़ी है, जितनी संगठनात्मक चुनौती।
दिल्ली में जारी राजनीतिक गतिविधियों के बीच शुरुआत में संकेत यही थे कि मामला तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन बाद की परिस्थितियों ने तस्वीर बदल दी। दिन भर बने माहौल के बाद जब अंतिम समय पर बैठक स्थगित हुई, तो यह साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ ऐसी बात जरूर है, जिस पर अब भी अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। राजनीति में कई बार कार्यक्रम तय हो जाने के बाद भी फैसले इसलिए रोके जाते हैं, क्योंकि नेतृत्व यह मानता है कि अधूरी सहमति के साथ आगे बढ़ना नुकसानदेह हो सकता है। बिहार बीजेपी के मामले में फिलहाल यही स्थिति दिखाई दे रही है।
अब यह संभावना मजबूत मानी जा रही है कि पार्टी नेतृत्व इस पूरे मसले को सुलझाने के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक की भूमिका तय कर सकता है। जब किसी राज्य में विधायक दल या प्रमुख नेताओं के बीच नाम को लेकर स्पष्ट सहमति नहीं बनती, तब अक्सर केंद्रीय पर्यवेक्षक की नियुक्ति की जाती है, जो स्थानीय नेताओं से बातचीत कर नेतृत्व को अपनी राय देता है। ऐसी स्थिति में अगला चरण यह हो सकता है कि पार्टी पहले अंदरूनी स्तर पर सभी पक्षों से बात करे, फिर पटना में विधायक दल की बैठक बुलाकर औपचारिक प्रक्रिया पूरी करे। Delhi News
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