
दिवाली की खुशियां खत्म होते ही दिल्ली-एनसीआर पर एक बार फिर जहर भरी धुंध का पहरा लौट आया है। राजधानी दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद समेत कई इलाकों की हवा दमघोंटू हो गई है। दिल्ली के कई हिस्सों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) खतरनाक स्तर 500 के पार पहुंच गया, जबकि नोएडा में यह 350 से ऊपर दर्ज किया गया। हालात ऐसे हैं कि सुबह-सुबह सड़कों पर धुंध की मोटी परत और आंखों में चुभन महसूस की जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी प्रदूषण पर काबू पाने के लिए प्रशासन ने पानी के छिड़काव और एंटी स्मॉग गन का सहारा लिया है। Delhi NCR News
ये वही मशीनें हैं जो हवा में मौजूद धूलकणों और जहरीले कणों को नीचे गिराने के लिए बारीक पानी की फुहार छोड़ती हैं। दिल्ली सरकार ने 2017 में पहली बार एंटी स्मॉग गन (ASG) का प्रयोग किया था। तब से इसे कई प्रमुख इलाकों—जैसे कनॉट प्लेस, आनंद विहार और आईटीओ—में लगाया जा चुका है। इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है — स्प्रे गन, मिस्ट गन या वाटर कैनन। लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है — क्या ये तकनीक वाकई प्रदूषण से राहत दिला रही है, या सिर्फ दिखावे की कवायद बनकर रह गई है? Delhi NCR News
एंटी-स्मॉग गन दरअसल एक ऐसी मशीन है जो हवा में मौजूद सूक्ष्म धूल और जहरीले कणों को नीचे गिराने के लिए बारीक पानी की फुहार छोड़ती है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह हाई-प्रेशर मोटर की मदद से पानी को 50 से 100 माइक्रॉन आकार की बेहद महीन बूंदों में बदल देती है। जब ये नमीभरी बूंदें हवा में फैलती हैं, तो PM 2.5 और PM 10 जैसे प्रदूषक कण उनसे चिपककर नीचे गिर जाते हैं। इस प्रक्रिया से हवा में धूल की मात्रा अस्थायी रूप से घट जाती है और वातावरण कुछ समय के लिए साफ महसूस होता है ठीक वैसे ही जैसे बरसात के बाद हवा अचानक ताजी और ठंडी लगती है।
इसका वाटर स्प्रे 150 फीट तक ऊपर तक जा सकता है और यह प्रति मिनट 30 से 100 लीटर पानी तक का छिड़काव करने में सक्षम होता है। यही वजह है कि इसे सिर्फ शहरों के प्रदूषण नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि खनन, कोयला परिवहन और निर्माण कार्यों के दौरान उड़ने वाली औद्योगिक धूल को नियंत्रित करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
दिल्ली सरकार ने पहली बार 2017 में आनंद विहार इलाके में एंटी-स्मॉग गन का परीक्षण किया था, जब प्रदूषण अपने चरम पर था और हवा में धूल के गुबार से सांस लेना मुश्किल हो गया था। ट्रायल के शुरुआती नतीजे कुछ हद तक उत्साहजनक रहे, जिसके बाद सरकार ने राजधानी के कई अहम इलाकों—जैसे कनॉट प्लेस, आईटीओ और सिविक सेंटर में इन मशीनों की तैनाती बढ़ा दी। समय के साथ नगर निगमों ने भी इस तकनीक को अपनाया और शहर के प्रदूषण नियंत्रण अभियानों में इसे शामिल कर लिया। अब ये मशीनें अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं — कहीं इन्हें “स्प्रे गन” कहा जाता है, कहीं “मिस्ट गन” या “वाटर कैनन” कहा जाता है। Delhi NCR News
हर साल जब दिल्ली-एनसीआर की हवा ‘जहर’ बन जाती है, तो प्रशासन एंटी स्मॉग गन का सहारा लेता है — लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है, क्या यह मशीन वाकई प्रदूषण पर असर डालती है या सिर्फ आंखों को सुकून देने वाला एक दिखावटी उपाय है? पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि एंटी स्मॉग गन का असर सीमित और अल्पकालिक होता है। यह हवा में तैरते धूल और प्रदूषक कणों को कुछ देर के लिए नीचे बैठा तो देती है, लेकिन कुछ घंटों बाद हालात फिर वैसे ही हो जाते हैं। Delhi NCR News