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Delhi News: दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी सोशल मीडिया पर बड़ा मुद्दा बन गया है। कोई इसे सीएम की फिजूलखर्ची करार दे रहा है तो कई सीएम के समर्थन में बोल रहा है।

Delhi News: दिल्ली की मुख्यमंत्री की एक तस्वीर वायरल है। या कहें कि उनकी कुर्सी वायरल है क्योंकि फोटो में वह अपने कार्यालय में जिस कुर्सी पर बैठी है वह चेयर सोशल मीडिया पर एक बड़ा मुद्दा बन गया है। एक्स पर इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी का दौर जारी है।
डिजिटल युग में एक साधारण फोटो या वीडियो का वायरल होना किसी बड़े घोटाले या नीतिगत फैसले से ज्यादा सुर्खियां बटोर लेता है। कोई सीएम रेखा गुप्ता की कुर्सी की कीमत के बारे में पोस्ट लिख रहा है तो कोई इसमें लगी आधुनिक सुविधाओं की लिस्ट गिना रहा है। कुछ इसे फिजुलखर्ची बता रहे हैं तो कुछ कार्यालय को अपनी तरह बनाने का सीएम का अधिकार याद दिला रहे हैं। कोई बता रहा है कि कुर्सी में डीप जीरो ग्रेविटी रिक्लाइनिंग क्षमता है जिसकी मदद से चेयर एक लग्जरी लाउन्ज में कन्वर्ट हो जाती है। कोई इस रहस्य से पर्दा उठा रहा है कि इसमें ऑटोमेटिक फुटरेस्ट है। यह फीचर पैरों को आराम देने का काम करता है।
डिजिटल दौर में “दिखना” ही सबसे बड़ा हथियार
सवाल यह है कि क्या यह वाकई इतना बड़ा मुद्दा है? दिल्ली जैसे महानगर में पानी की किल्लत, ट्रैफिक, प्रदूषण, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे मौजूद हैं। फिर एक कुर्सी पर इतनी बहस क्यों? क्योंकि डिजिटल दौर में “दिखना” ही सबसे बड़ा हथियार बन गया है। यह डिजिटल पॉलिटिक्स का दौर है। सोशल मीडिया पर एक पैरोडी अकाउंट या कोई इन्फ्लुएंसर कुछ क्लिप या मीम शेयर कर देता है और पूरा विमर्श उसी पर केंद्रित हो जाता है।
कॉकरोच पार्टी बन गई नई क्रांति का चेहरा
कुछ दिन पहले एक विवादित बयान (चीफ जस्टिस द्वारा बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” कहे जाने) के बाद अचानक “Cockroach Janta Party” (CJP) नाम का एक सैटिरिकल मूवमेंट जन्म लेता है। संस्थापक अभिजीत दीपके एक बड़ा नाम बन जाते हैं। एक पैरोडी अकाउंट को युवाओं की नाराजगी को ब्रांड बनाकर रातोंरात “नई क्रांति” का चेहरा बन दिया जाता है। एक ऐसी पार्टी जो जमीन पर शून्य है - कोई संगठन, कोई बूथ, कोई स्थानीय कार्यकर्ता नहीं, सिर्फ स्क्रीन, मीम और वायरल पोस्ट।
कुर्सी या कॉकरोच नहीं, बल्कि प्राथमिकताएं अहम
असल मुद्दा कुर्सी या कॉकरोच नहीं, बल्कि प्राथमिकताएं हैं। अगर सरकारें विकास, सुशासन और जनसमस्याओं पर फोकस रखेंगी तो ऐसी छोटी-छोटी (या वायरल) बातें खुद-ब-खुद फीकी पड़ जाएंगी। लेकिन अगर डिजिटल दिखावे, मीम्स और पल-पल की वायरल प्रतिक्रियाओं पर राजनीति चलेगी, तो विकास पृष्ठभूमि में चला जाएगा।
गलत सिर्फ नेताओं की या सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर की ही नहीं है आम लोग भी विश्लेषण कम, भावनाओं में बहना ज्यादा पसंद करते हैं। तथ्यों की जांच करने से पहले शेयर बटन दबा देते हैं। गुस्सा वायरल होता है, लेकिन समाधान की मांग या जमीनी बदलाव पीछे रह जाता है। यही कारण है कि असली मुद्दों की जगह कुर्सी-कॉकरोच जैसे वायरल टॉपिक्स दिन-रात ट्रेंड करते रहते हैं। हम खुद अपनी प्राथमिकताओं को सेट नहीं करते, एल्गोरिदम हमें सेट करता है।
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