भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद, फरीदाबाद) देश के सबसे विकसित और आधुनिक क्षेत्रों में गिने जाते हैं। यहाँ की चमक-दमक, ऊँची इमारतें और आधुनिक अस्पताल देखने में तो विश्वस्तरीय लगते हैं, परंतु इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है, “महंगे स्वास्थ्य का फैलता जाल”, जो धीरे-धीरे आम नागरिक को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। स्वास्थ्य, जो संविधान के अनुसार हर नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए, अब एक “व्यापार” बनता जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में यह व्यापार इतना विशाल हो चुका है कि आज इलाज का खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक रीढ़ तोड़ रहा है। Delhi NCR Healthcare Crisis
बढ़ते खर्च की डरावनी रफ्तार
बढ़ती लागत, घटती राहत-हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाता (एनएचए) रिपोर्ट 2024 में बताया गया कि भारत में एक व्यक्ति का औसतन वार्षिक स्वास्थ्य व्यय पिछले दस वर्षों में तीन गुना बढ़ गया है। दिल्ली-एनसीआर में यह वृद्धि देश के औसत से भी कहीं अधिक है। यहाँ प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च प्रति दिन 15,000 रुपये से 60,000 रुपये तक पहुँच चुका है, जबकि सरकारी अस्पतालों की क्षमता सीमित है। एक साधारण डेंगू या वायरल बुखार का निजी अस्पताल में इलाज 70,000 से एक लाख रुपये तक में होता है। हार्ट स्टेंट सर्जरी, जो कुछ वर्ष पहले 1.5 लाख में हो जाती थी, अब 3-5 लाख रुपये तक पहुँच गई है। आईसीयू का एक दिन का खर्च कई अस्पतालों में 25,000 रुपये से अधिक है। Delhi NCR Healthcare Crisis
स्वास्थ्य का कॉरपोरेटकरण
स्वास्थ्य का कॉरपोरेटकरण-दिल्ली-एनसीआर में स्वास्थ्य सेवाएँ अब “कॉरपोरेट हेल्थ सेक्टर” के नियंत्रण में हैं। फोर्टिस, अपोलो, मणिपाल, मैक्स, मेट्रो, यशोदा, पारस, ब्लडचेन जैसी श्रृंखलाएँ अब एक “हेल्थ इंडस्ट्री” बना चुकी हैं। आरोप है कि इनकी कार्यप्रणाली में सेवा भावना से अधिक व्यवसायिक रणनीति देखने को मिलती है। रोगी अब “पेशेंट” नहीं बल्कि “कस्टमर” कहलाने लगा है। Delhi NCR Healthcare Crisis
अस्पतालों में “ट्रीटमेंट पैकेज” और “रूम अपग्रेड” योजनाएँ ऐसे प्रस्तुत की जाती हैं जैसे यह कोई पर्यटन सेवा हो। 2025 के एक सर्वे के अनुसार, एनसीआर के 10 प्रमुख निजी अस्पतालों में 78 प्रतिशत मरीजों को “अनावश्यक जांच” या “अतिरिक्त दवाओं” की सिफारिश की गई थी। इसका उद्देश्य अक्सर बिलिंग बढ़ाना होता है, न कि रोगी के उपचार में वास्तविक सुधार। Delhi NCR Healthcare Crisis
मध्यमवर्ग पर गहराता आर्थिक संकट
मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब स्वास्थ्य संकट आर्थिक आपदा बन गया है। इंश्योरेंस होने के बावजूद अस्पतालों के “कैशलेस क्लेम” जटिल प्रक्रिया में फँस जाते हैं और मरीज के परिवार को तत्काल भुगतान करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के ग़ाज़ियाबाद निवासी अमित तिवारी के पिता की एक सामान्य हृदय सर्जरी का बिल 4.8 लाख रुपये आया, जिसमें से बीमा कंपनी ने मात्र 2.3 लाख रुपये का भुगतान किया। शेष 2.5 लाख नकद देने पड़े। यह एक सामान्य परिवार के लिए विनाशकारी बोझ है। ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि बीमा और अस्पताल के बीच के जाल में आम आदमी सबसे कमजोर कड़ी बन गया है।
सरकारी अस्पतालों की सीमाएँ-दिल्ली में एम्स, सफदरजंग, आरएमएल जैसे बड़े सरकारी संस्थान हैं, परंतु इनकी क्षमता कुल मरीजों की माँग के मुकाबले बहुत सीमित है। एम्स में एक गंभीर मरीज को बिस्तर मिलने में औसतन 7 से 10 दिन लग जाते हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ और संसाधनों की कमी के कारण आम जनता को मजबूर होकर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। एनसीआर के ज़िला अस्पतालों (जैसे ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम) की रिपोर्ट बताती है कि 70 प्रतिशत तक सुविधाएँ या तो पुरानी हैं या कम स्टाफ के कारण उपयोग में नहीं हैं।
दवाइयों और जांचों का मुनाफ़ा खेल-महंगे इलाज का एक बड़ा हिस्सा डायग्नोस्टिक टेस्ट और फार्मेसी बिल से आता है। एनसीआर के कई अस्पतालों में 30-40 प्रतिशत तक कमीशन की व्यवस्था जांच केंद्रों और दवा कंपनियों के बीच होती है। डॉक्टरों को “टारगेट” पूरा करने के लिए कहा जाता है। यानी हर माह इतनी जांचें या दवाइयाँ लिखनी ही होंगी। इससे स्वास्थ्य सेवा “उपचार” से अधिक “व्यवसाय मॉडल” में बदल रही है। कानूनी व नियामक ढिलाई-भारत में निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 है, परंतु दिल्ली और कई एनसीआर राज्यों में इसका पालन आधा-अधूरा है।
राज्य स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरणों के पास पर्याप्त निरीक्षण क्षमता नहीं है, और अस्पतालों की लॉबी इतनी शक्तिशाली है कि शिकायतें अक्सर लंबित रह जाती हैं। महंगे इलाज के मामलों में अदालतें भी कई बार हस्तक्षेप करती हैं। जैसे मणिपाल हॉस्पिटल और फोर्टिस गुरुग्राम पर अधिक बिलिंग के मामले सामने आए, परंतु दंडात्मक कार्रवाई दुर्लभ है।
क्या है समाधान?
स्वास्थ्य नीति में संतुलन-सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाएँ “सेवा” और “व्यापार” के बीच संतुलन बनाए रखें। बीमा प्रणाली का पारदर्शी ढाँचा-हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों के बीच पारदर्शी दरें तय की जाएँ। बीमा क्लेम में मरीज को कभी नुकसान न हो। नियामक सख्ती-क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट को पूरे एनसीआर में पूर्ण रूप से लागू किया जाए। बिलिंग, जांच और दवा मूल्य निर्धारण पर नियमित निरीक्षण हो। सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण-एम्स जैसे मॉडल को जिला स्तर तक विस्तार दिया जाए। डॉक्टरों की संख्या, बिस्तरों और सुविधाओं में भारी वृद्धि आवश्यक है। जनजागरूकता और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म-नागरिकों को अपने अधिकारों और मान्य शुल्क संरचना की जानकारी हो। “राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल” पर हर अस्पताल की फीस और शिकायत व्यवस्था सार्वजनिक की जाए। Delhi NCR Healthcare Crisis
दिल्ली-एनसीआर का स्वास्थ्य परिदृश्य दो चेहरों वाला है। एक तरफ अत्याधुनिक सुविधाएँ, विश्वस्तरीय अस्पताल और उन्नत तकनीक है; दूसरी तरफ, इन सुविधाओं तक पहुँचने की कीमत इतनी अधिक है कि आम नागरिक बीमार होने से भी डरने लगा है। यदि सरकार, चिकित्सा संस्थान और समाज मिलकर स्वास्थ्य को “मानव अधिकार” की तरह देखें, न कि “मुनाफ़े के साधन” की तरह, तो दिल्ली-एनसीआर न केवल देश बल्कि पूरे एशिया में “स्वास्थ्य राजधानी” बन सकता है। “इलाज का उद्देश्य जीवन बचाना होना चाहिए, न कि बिल बढ़ाना। Delhi NCR Healthcare Crisis
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)