दिल्ली की सियासत में होगा बड़ा फेरबदल, सीटों की संख्या में बढ़ोतरी के संकेत

देश में प्रस्तावित परिसीमन के बाद संसद और विधानसभा क्षेत्रों की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। नई व्यवस्था लागू होने पर लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 816 तक पहुंचने की संभावना है।इनमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने का अनुमान है।

दिल्ली की राजनीति
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locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar25 Mar 2026 10:40 AM
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Delhi News : देश में प्रस्तावित परिसीमन के बाद संसद और विधानसभा क्षेत्रों की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। नई व्यवस्था लागू होने पर लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 816 तक पहुंचने की संभावना है। इनमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने का अनुमान है। इस व्यापक पुनर्गठन का असर राज्यों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पर भी साफ दिखाई दे सकता है, जहां सांसदों और विधायकों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है।

परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी तेज

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी इस बदलाव से अछूती नहीं रहेगी। अभी दिल्ली में लोकसभा की 7 सीटें और विधानसभा की 70 सीटें हैं, लेकिन परिसीमन के बाद इन दोनों आंकड़ों में बड़ा इजाफा संभव माना जा रहा है। अनुमान है कि दिल्ली में लोकसभा सीटों की संख्या 10 से आगे निकलकर 11 तक पहुंच सकती है, जबकि विधानसभा सीटें बढ़कर 100 के पार यानी करीब 105 हो सकती हैं। अगर महिला आरक्षण कानून लागू होता है, तो दिल्ली की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी भी पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकती है। 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के अनुसार, लोकसभा की कम से कम 4 सीटों पर महिला प्रतिनिधि चुनी जा सकती हैं। वहीं, विधानसभा में लगभग 35 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले महिला आरक्षण कानून को लागू करने का रास्ता तैयार कर रही है। इसी दिशा में संसद के मौजूदा बजट सत्र में दो अहम विधेयक लाने की तैयारी की चर्चा है। उल्लेखनीय है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान संविधान संशोधन के जरिए किया गया था, लेकिन इसके क्रियान्वयन को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है।

देश की चुनावी संरचना में बड़े बदलाव की पटकथा तैयार

राज्य विधानसभाओं में भी सीटों का आरक्षण इसी तर्ज पर आबादी और प्रतिनिधित्व के अनुपात में तय किया जाएगा। बताया जा रहा है कि प्रस्तावित विधायी प्रक्रिया के तहत एक विधेयक महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में आवश्यक संशोधन करेगा, जबकि दूसरा विधेयक परिसीमन कानून में बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगा। गौरतलब है कि सितंबर 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नारी शक्ति वंदन विधेयक को मंजूरी दी थी। यही विधेयक बाद में संविधान के 106वें संशोधन अधिनियम के रूप में लागू हुआ। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि परिसीमन और आरक्षण की यह पूरी प्रक्रिया किस तरह देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नया ढांचा तैयार करती है। Delhi News

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अदालत का बड़ा फैसला, कश्मीरी अलगाववादी आसिया अंद्राबी को उम्रकैद

नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह सजा उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी अन्लाफुल एक्टीविटीज (प्रीवेंशन) एक्ट के तहत दर्ज एक गंभीर मामले में दी गई है।

asiya andrabi
कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar24 Mar 2026 06:01 PM
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New Delhi News : नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण फैसले में अदालत ने कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह सजा उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी अन्लाफुल एक्टीविटीज (प्रीवेंशन) एक्ट के तहत दर्ज एक गंभीर मामले में दी गई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था मामला

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं। सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर उन्हें दोषी पाया गया। यह मामला लंबे समय से जांच एजेंसियों के लिए अहम बना हुआ था। जांच एजेंसियों, खासकर नेशनल इन्वेटिगेशन एजेंसी के अनुसार, आसिया अंद्राबी पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे:

* भड़काऊ और विभाजनकारी भाषण देना

* अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देना

* देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की साजिश

* प्रतिबंधित संगठनों से संपर्क बनाए रखना

इन आरोपों के आधार पर अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया।

2018 में दर्ज हुआ था केस

यह मामला साल 2018 में दर्ज किया गया था, जब सुरक्षा एजेंसियों ने उनके खिलाफ विस्तृत जांच शुरू की थी। जांच के दौरान कई ऐसे सबूत सामने आए, जिनके आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई। आसिया अंद्राबी का नाम दुख्तरान ए मिल्लत से भी जुड़ा रहा है, जो पहले से ही प्रतिबंधित संगठन है। एजेंसियों का दावा है कि इस संगठन के जरिए अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता रहा।

अदालत के फैसले का महत्व

इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देश विरोधी गतिविधियों में शामिल तत्वों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। सजा सुनाए जाने के बाद अब आसिया अंद्राबी को अपना शेष जीवन जेल में बिताना होगा। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के तहत वे उच्च अदालत में अपील कर सकती हैं। यह फैसला देश की एकता और अखंडता से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के सख्त रुख को दर्शाता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कानून का पालन सर्वोपरि है।


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सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले हरीश राणा का निधन, 13 साल से थे कोमा में

दिल्ली से एक बेहद संवेदनशील और अहम खबर सामने आई है। भारत में इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति पाने वाले मामलों में शामिल हरीश राणा का निधन हो गया है। वे पिछले करीब 13 साल से कोमा की स्थिति में थे और उनका इलाज दिल्ली के प्रतिष्ठित एम्स में चल रहा था।

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हरीश राणा का निधन
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar24 Mar 2026 05:32 PM
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Delhi News : दिल्ली से एक बेहद संवेदनशील और अहम खबर सामने आई है। भारत में इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति पाने वाले मामलों में शामिल हरीश राणा का निधन हो गया है। वे पिछले करीब 13 साल से कोमा की स्थिति में थे और उनका इलाज दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स में चल रहा था। सूत्रों के मुताबिक, हरीश राणा लंबे समय से कोमा में थे और उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था। वर्षों तक चले इलाज के बावजूद जब उनकी हालत स्थिर बनी रही, तब परिवार ने कानूनी रास्ता अपनाया।

सुप्रीम कोर्ट से मिली थी इच्छामृत्यु की अनुमति

हरीश राणा का मामला उस समय चर्चा में आया जब उनके परिवार ने सुप्रीम कोर्ट आॅफ इंडिया में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की। अदालत ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद उन्हें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी। यह फैसला देश में इच्छामृत्यु को लेकर चल रही बहस के बीच बेहद महत्वपूर्ण माना गया।

क्या होती है पैसिव यूथेनेशिया

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है ऐसे मरीजों के जीवनरक्षक उपकरण हटाना या इलाज रोकना, जिनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होती। भारत में इसे कड़े दिशा-निर्देशों के तहत ही अनुमति दी जाती है, ताकि किसी तरह का दुरुपयोग न हो। हरीश राणा का मामला इसलिए भी खास माना गया क्योंकि यह उन चुनिंदा मामलों में शामिल था, जहां अदालत ने इच्छामृत्यु को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए। इससे पहले भी इस विषय पर कई कानूनी बहसें हो चुकी हैं, लेकिन हर मामला अपने आप में अलग महत्व रखता है।

परिवार और डॉक्टरों के लिए कठिन फैसला

लंबे समय तक कोमा में रहने वाले मरीज के लिए इस तरह का फैसला लेना परिवार और डॉक्टरों दोनों के लिए बेहद कठिन होता है। हरीश राणा के मामले में भी यह निर्णय काफी सोच-समझकर और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया था। हरीश राणा का निधन न केवल एक परिवार के लिए गहरा दुख है, बल्कि यह देश में इच्छामृत्यु से जुड़े संवेदनशील मुद्दे को भी फिर से चर्चा में ले आया है। यह मामला मेडिकल, कानूनी और मानवीय पहलुओं के बीच संतुलन की चुनौती को दशार्ता है।


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