देश में युवाओं की राजनीति में भागीदारी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी और केंद्रीय राज्य मंत्री तथा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) प्रमुख जयंत चौधरी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष करने की मांग का समर्थन किया है।

Delhi News : देश में युवाओं की राजनीति में भागीदारी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी और केंद्रीय राज्य मंत्री तथा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) प्रमुख जयंत चौधरी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष करने की मांग का समर्थन किया है। दोनों नेताओं का मानना है कि यदि 18 वर्ष की आयु में मतदान का अधिकार मिल सकता है, तो 21 वर्ष की आयु में चुनाव लड़ने का अवसर भी मिलना चाहिए। यह मांग हाल के छात्र और Gen-Z केंद्रित आंदोलनों के बाद और तेज हुई है।
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मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने घोषणा की है कि तेलंगाना सरकार अगस्त के पहले सप्ताह में विधानसभा और विधान परिषद का विशेष सत्र बुलाकर एक प्रस्ताव पारित करेगी। इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष से घटाकर 21 वर्ष करने की मांग की जाएगी। प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।
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रेवंत रेड्डी ने कहा कि जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में युवाओं को कम उम्र में चुनाव लड़ने का अवसर मिलता है। उन्होंने सिंगापुर का भी उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 21 वर्ष की आयु में भी शीर्ष राजनीतिक पदों तक पहुंचने की पात्रता है। उनका तर्क है कि भारत की युवा आबादी को नीति निर्माण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
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राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी भी लंबे समय से इस मांग का समर्थन करते रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने पहले भी चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करने की वकालत की थी और इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था। उनका कहना है कि बड़ी संख्या में युवा देश की राजनीति और नीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें अवसर मिलना चाहिए।
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वर्तमान संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था के अनुसार:
यदि चुनाव लड़ने की आयु 21 वर्ष करनी है, तो इसके लिए संवैधानिक और कानूनी संशोधन आवश्यक होगा।
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इस प्रस्ताव ने देश में युवा नेतृत्व, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समर्थकों का तर्क है कि आज के युवा शिक्षा, तकनीक और प्रशासनिक समझ के मामले में पहले की तुलना में अधिक सक्षम हैं, इसलिए उन्हें कम उम्र में चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति और संसदीय चर्चा आवश्यक होगी, क्योंकि यह संविधान और चुनावी व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
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