आईआईटीएम ने आईसीएसएसआर के सहयोग से मीडिया, प्रबंधन और तकनीक के संगम पर आधारित दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस का सफल आयोजन किया। देशभर के शोधार्थियों, प्रोफेसरों और विशेषज्ञों ने विकसित भारत 2047, नवाचार, स्टार्टअप, शिक्षा नीति, सतत विकास और सामाजिक परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए।

भारत 2047 के सपनों की दिशा में देश लगातार आगे बढ़ रहा है। इसी सोच को आगे ले जाते हुए इंस्टीट्यूट ऑफ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट (IITM) ने इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) के सहयोग से 13–14 नवंबर 2025 को एक शानदार दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इस कॉन्फ्रेंस का विषय था, “Synergizing Media, Management and Technology: Driving Integrity, Innovation and Entrepreneurship for Viksit Bharat @ 2047”। दो दिनों तक चले इस ज्ञान–उत्सव में देशभर से आए शोधकर्ताओं, प्रोफेसरों और विषय विशेषज्ञों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और नई सोच, नए विचार तथा विकसित भारत के भविष्य पर सार्थक चर्चा की।
कॉन्फ्रेंस की शुरुआत IITM के सभागार में दीप प्रज्वलन के साथ हुई। निदेशक प्रो. (डॉ.) रचिता राणा, मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश, प्रो. (डॉ.) बंदना झा, प्रो. (डॉ.) ए.के. सैनी, और कॉन्फ्रेंस संयोजक प्रो. (डॉ.) विकास भरारा एवं प्रो. (डॉ.) गोपाल सिंह लटवाल ने मंच की शोभा बढ़ाई। निदेशक प्रो. रचिता राणा ने अपने संबोधन में भारत के लोकतंत्र के चार स्तंभों पर बात करते हुए मीडिया की अहम भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लिए तकनीक, समावेशी सोच और सतत विकास को अपनाना जरूरी है।
कॉन्फ्रेंस संयोजक प्रो. (डॉ.) विकास भरारा ने गांधी जी के प्रसिद्ध वाक्य “आप खुद वो बदलाव बनो जो दुनिया में देखना चाहते हैं” से अपनी बात शुरू की। उन्होंने बताया कि स्टार्टअप्स, नवाचार और नई पीढ़ी की ऊर्जा भारत के विकास की रीढ़ हैं। प्रो. बंदना झा ने कहा कि विकसित भारत के लिए हर नागरिक, हर क्षेत्र और हर समुदाय की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने उत्तर-पूर्व और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण पर भी विशेष बल दिया।
प्रो. (डॉ.) के.जी. सुरेश ने कहा कि विकसित भारत सिर्फ उद्योगों में तरक्की नहीं बल्कि सर्वांगीण विकास का प्रतीक है। उन्होंने सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा नीति और समाज में आए सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की। प्रो. (डॉ.) ए.के. सैनी ने अखंडता और मूल्य-आधारित समाज को विकसित भारत की असली आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि मशीनें सब कुछ नहीं दे सकतीं लेकिन मानवीय गुण समाज को बेहतर बनाते हैं।
कॉन्फ्रेंस में कुल चार तकनीकी सत्र आयोजित हुए जिनमें देशभर से आए शोधार्थियों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन तरीके से अपने शोध प्रस्तुत किए।
पहले दिन दो और दूसरे दिन दो सत्र हुए जहां मीडिया, तकनीक, प्रबंधन, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक बदलाव जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) दुर्गेश त्रिपाठी ने मीडिया, मैनेजमेंट और टेक्नोलॉजी के बीच “कोलैबोरेटिव इंटेलिजेंस” की जरूरत पर बात की। उन्होंने कहा कि जेन Z और जेन अल्फा को सही दिशा देना समय की मांग है। ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी से आए प्रो. (डॉ.) सचिन कुमार मंगला ने सतत विकास, नवाचार और पर्यावरण-अनुकूल प्रगति को देश के भविष्य के लिए आवश्यक बताया।
प्रो. (डॉ.) के. श्रीनिवास ने विकसित भारत के दस प्रमुख स्तंभों, सत्यनिष्ठा, रणनीतिक प्रबंधन, सुशासन, भविष्य-उन्मुख स्किल्स, नैतिक तकनीक और नवाचार संस्कृति पर अपने विचार रखे। इन विचारों ने युवाओं और शोधार्थियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। कॉन्फ्रेंस के अंत में बेस्ट पेपर प्रेजेंटर को सम्मानित किया गया। आयोजन समितियों के सभी सदस्यों और स्टूडेंट वॉलंटियर्स को ‘टोकन ऑफ एप्रिसिएशन’ और सर्टिफिकेट देकर प्रोत्साहित किया गया। ICSSR के पूर्व निदेशक मि. आर.के. गुप्ता ने देश के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डाला और शोध संस्कृति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
इस कॉन्फ्रेंस की सफलता के पीछे कई टीमों की मेहनत थी फाइनेंस, पब्लिकेशन, मैनेजमेंट, रिसेप्शन, टेक्निकल, मीडिया कवरेज, हॉस्पिटैलिटी, ट्रांसपोर्ट, डेकोरेशन, सर्टिफिकेट, सोशल मीडिया और फोटोग्राफी सभी ने अपनी–अपनी जिम्मेदारियां बेहतरीन ढंग से निभाईं। IITM के विद्यार्थियों ने भी पूरे इवेंट को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।