बुधवार तथा गुरुवार की रात को दिल्ली पुलिस ने बड़ा एनकाउंटर किया है। दिल्ली में सबसे बड़ा एनकाउटर माने जा रहे इस एनकाउंटर में बिहार का कुख्यात सरगना रंजन पाठक (Ranjan Pathak) मारा गया। इतनी खबर आपने पढ़ी होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिहार में इस रंजन पाठक का इतिहास क्या है ? आपको बता दे कि रंजन पाठक बिहार में आतंक का दूसरा नाम बन चुका था। रंजन पाठक “सिग्मा एंड कंपनी” (Sigma & Company) के नाम से गैंग चलाता था।
बिहार की आपराधिक दुनिया में रंजन पाठक (Ranjan Pathak) एक ऐसा नाम था जिसने वर्षों तक दहशत फैलाई है। राजनीति, ठेकेदारी और अपराध की तिकड़ी पर टिका उसका साम्राज्य आज भी चर्चा का विषय है। रंजन पाठक (Ranjan Pathak) सिर्फ एक गैंगस्टर नहीं था, बल्कि उसने अपने अपराधों को वैधता का जामा पहनाने के लिए “सिग्मा एंड कंपनी” (Sigma & Company) नामक फर्म की स्थापना की थी। इस कंपनी के जरिए वह ठेकों, प्रोजेक्ट्स और अवैध वसूली का खेल खेलता रहा।
शुरुआत एक छोटे ठेकेदार के रूप में, लेकिन इरादे बड़े थे
रंजन पाठक (Ranjan Pathak) ने अपना सफर पटना और आसपास के जिलों में एक छोटे ठेकेदार के रूप में शुरू किया। सरकारी निर्माण कार्यों में बोली लगाकर उसने स्थानीय नेताओं और अफसरों से संबंध बनाए। धीरे-धीरे उसने सरकारी ठेकों में धांधली और माफियागिरी का रास्ता अख्तियार कर लिया। उसके गिरोह ने कई बार प्रतिद्वंद्वियों को धमकाया, मारा-पीटा और जमीन कब्जाई।
सिग्मा एंड कंपनी — अपराध का कॉरपोरेट चेहरा
रंजन पाठक (Ranjan Pathak) की कंपनी सिग्मा एंड कंपनी (Sigma & Company) सिर्फ नाम में वैध थी, लेकिन असल में यह अपराध की कमाई का जरिया बन चुकी थी। ठेके हासिल करने के लिए रिश्वत, धमकी और राजनीतिक दबाव जैसे हथकंडे अपनाए जाते थे। सूत्रों के मुताबिक, कंपनी के नाम पर करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट पास कराए गए, जिनमें काम या तो अधूरा रहा या कागजों पर ही पूरा दिखा दिया गया।
राजनीतिक संरक्षण बना ढाल
रंजन पाठक (Ranjan Pathak) के रिश्ते कई प्रभावशाली नेताओं से रहे। सत्ता में चाहे कोई भी दल रहा हो, उसका असर हर सरकार में दिखाई देता था। उसके खिलाफ कई बार एफआईआर दर्ज हुईं, लेकिन या तो गवाह पलट गए या जांच ठंडे बस्ते में चली गई। इसी राजनीतिक संरक्षण ने उसे “बिहार का अघोषित डॉन” बना दिया।
गिरफ्तारी और साम्राज्य का पतन
लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बचते रहे रंजन पाठक (Ranjan Pathak) पर आखिरकार शिकंजा कसा। विशेष जांच दल (एसआईटी) ने उस पर दर्ज मामलों को दोबारा खोला और ठोस सबूत जुटाए। गिरफ्तारी के बाद उसके कई राज खुले — सिग्मा एंड कंपनी (Sigma & Company) के जरिए सरकारी खजाने से करोड़ों की हेराफेरी की बात सामने आई।
लोगों में आज भी कायम है खौफ और चर्चा
बता दे कि रंजन पाठक (Ranjan Pathak) के नाम से आज भी बिहार के कई जिलों में लोग सिहर उठते हैं। उसके गिरोह के बचे हुए सदस्य अब भी कुछ क्षेत्रों में सक्रिय बताए जाते हैं। हालांकि, पुलिस ने बीते कुछ वर्षों में उसके नेटवर्क को काफी हद तक तोड़ दिया है।